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झाड़ू ने बनाया आत्मनिर्भर, आरी गांव के 75 फीसदी लोगों का बदला जीवन

Tue, 22 Sep 2020 01:06 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 22 Sep 2020 01:06 AM IST
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AARI village people self confidence 75 percent people life change for business
आरी गांव में घर-घर होता है झाड़ू बनाने का कार्य।
झांसी। बड़ागांव ब्लाक का आरी गांव आत्मनिर्भर भारत का एक बड़ा उदाहरण है। इस गांव के 75 फीसदी परिवार झाड़ू बनाने के धंधे से जुड़े हैं। यहां पर बनी झाड़ू मुंबई, सूरत, लखनऊ, आगरा जैसे बड़े शहरों में बिकने के लिए जाती है। यहां के लोग हर साल लाखों रुपये की झाड़ू बनाते हैं। बाहरी ठेकेदार थोक में यहां से बनी झाड़ू को खरीदने के बाद उनको दूसरे शहरों में बिकने के लिए भेजते हैं।
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महानगर से 15 किलोमीटर दूर बड़ागांव ब्लाक के उनाव बालाजी मार्ग पर स्थित आरी गांव में करीब तीन सौ परिवार निवास करते हैं। आबादी करीब ढाई हजार है। अधिकांश किसानों के पास दस बीघे से कम जमीन है। खेती के लिए पानी की भी कोई उचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में साल भर परिवार चलाना मुश्किल रहता है। गांव के लोगों ने आर्थिक संकट को कम करने के लिए साल 1970 के बाद खजूर के झाड़ों से झाड़ू बनाना शुरू किया। यह काम उनको रास आ गया। इस समय गांव के
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करीब सवा दो सौ परिवार झाड़ू बनाने के धंधे से जुड़े हैं। परिवार का एक सदस्य प्रतिदिन 40 से 50 झाड़ू बना लेता है। इस आत्मनिर्भता के कारण संबंधित परिवार के लोगों को मजदूरी के लिए शहर या अन्य दूसरे काम नहीं करने पड़ते। यहां से बाहर के ठेकेदार थोक में झाड़ू खरीद ले जाते हैं। ठेकेदार झाड़ू की आपूर्ति मुंबई, लखनऊ, आगरा, सूरत जैसे बड़े शहरों में करते हैं।
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एक झाड़ू पर मिलते हैं सवा चार रुपये
ठेकेदार एक सौ झाड़ू के 425 रुपये भुगतान करता है। इस हिसाब से प्रति झाड़ू सवा चार रुपये मिलते हैं। यही झाड़ू बाजार में दस रुपये की बिकती है। गांव के लोग 15 रुपये से 35 रुपये तक की खूबसूरत झाड़ू भी बनाते हैं, लेकिन वह स्पेशल आर्डर पर ही बनती है।

खजूर के झाड़ लाने में लगती है कड़ी मेहनत
गांव वालों को खजूर के झाड़ लाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। लोगों को मैरी, पिछोर, ग्रासलैंड आदि स्थानों पर जाकर खजूर के पेड़ के मालिकों से सौदा करना पड़ता है। तब कहीं जाकर वे झाड़ ला पाते हैं। इस काम में एक हफ्ते का वक्त लग जाता है। बाद में एक हफ्ते तक पत्तों को सुखाना पड़ता है। पत्तों को छीलने में भी कड़ी मेहनत लगती है।
मैं पिछले पचास साल से झाड़ू बना रही हूं। खुशी होती है हाथ की बनी झाड़ू बड़े- बड़े शहरों में भेजी जाती है। कमला।
मैंने 1970 में झाड़ू बनाना शुरू किया था। उस वक्त 20 पैसे में एक झाड़ू बिकती थी। आज के दर के हिसाब से 20 पैसे ज्यादा थे। हरनारायण।
मैं शादी के बाद से झाड़ू बनाने का काम कर रही हूं। 13 साल हो गए हैं। मौका लगता है तो शहर जाकर भी बेच आती हूं। अनीता।
मेरे परिवार के सभी सदस्य इसी काम में लगे हैं। सभी के सहयोग से ही आप इस धंधे को कर सकते हैं। सरोज
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