{"_id":"5c560995bdec2253a33c50cf","slug":"81549142421-jhansi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"घोटाले में अधिकारियों व कर्मचारियों का जेल जाना तय","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
घोटाले में अधिकारियों व कर्मचारियों का जेल जाना तय
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
घोटाले में अधिकारियों व कर्मचारियों का जेल जाना तय
कानपुर/ झांसी। सन् 2003 में झांसी में स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना में हुए 11 लाख रुपये के घोटाले में तत्कालीन सीडीओ समेत 17 लोग फंस गए हैं। इसमें जिला परियोजना निदेशक और फर्म मालिक भी शामिल हैं। इसमें कागजों में स्टेशनरी की आपूर्ति दिखाकर रकम हड़पने का आरोप है। उधर, एफआईआर की खबर आने पर विकास भवन स्थित कार्यालय में कर्मचारी एक-दूसरे पर शक जताते रहे और स्वयं का बचाव करते रहे। इस मामले में अफसरों की कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है।
प्रदेश में एक अप्रैल-1999 में तत्कालीन सरकार ने स्वर्ण जयंती ग्रामीण योजना प्रारंभ की थी। इस योजना के तहत ग्रामीणों को स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। इसके लिए स्टेशनरी की जरूरत होती थी। वर्ष 2003 में स्टेशनरी के लिए 11 लाख रुपये का बिल पास किया गया था, लेकिन स्टेशनरी की आपूर्ति नहीं हुई थी। इसका भुगतान जौनपुर के अरुण एजूकेशनल एंड जनरल सप्लायर के खाते में ट्रांसफर किया गया था। इस घोटाले की शिकायत एक शख्स ने शासन में की थी।
शासन के आदेश पर ईओडब्ल्यू की लखनऊ शाखा जांच कर रही है। कंपनी के मालिक अरुण कुमार ने पूछताछ में बताया कि इस घोटाले में उसकी कंपनी का बिल लगाया गया था। उसने किसी तरह के सामान की आपूर्ति नहीं की थी। सीतापुर के अभय सिंह ने उसे पांच फीसदी कमीशन का लालच देकर बिल का भुगतान उसके खाते में ट्रांसफर कराया था। खाते में भुगतान आने के बाद अभय ने उसे कमीशन देकर बाकी रकम ले ली थी। जांच में सामने आया कि यह बिल लिपिक से लेकर अकाउंटेंट, परियोजना निदेशक और सीडीओ के हस्ताक्षर से पास हुआ था। जांच के दौरान घोटाले में इन आरोपियों की संलिप्तता पाई गई है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ईओडब्ल्यू थाने में रिपोर्ट दर्ज हुई है।
विज्ञापन
ईओडब्ल्यू (आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा) की जांच में घोटाला सही पाया गया है। इसके आधार पर रेल बाजार स्थित ईओडब्ल्यू थाने में धोखाधड़ी, कूट रचित दस्तावेज तैयार करने, इस्तेमाल करने समेत अन्य धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई। विवेचना ईओडब्ल्यू की लखनऊ शाखा करेगी। सूत्रों के मुताबिक आरोपियों की कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है।
यह हैं नामजद
तत्कालीन झांसी के सीडीओ संजय कृष्ण, परियोजना निदेशक अमर सिंह, परियोजना अर्थशास्त्री महेश चंद्र साहू, संख्या सहायक राजकुमार खरे, आंकिक ग्राम विकास अधिकारी अधिकरण राजेश कुमार शर्मा, डीआरडीए (डिस्ट्रिक्ट रूरल डेवलेपमेंट एजेंसी) के लिपिक धनीराम, शाखा प्रबंधक यूपीएसएस (फर्म) अनिल कुमार जायसवाल, फर्म मालिक अरुण कुमार, उसकी पत्नी मधु राय, ठेकेदार अभय सिंह, बीडीओ गजेंद्र प्रताप सिंह, लिपिक कैलाश बहादुर, एडीओ मनु प्यारे, लिपिक राजकुमार कोरी और बीडीओ अखिलेश कुमार वैश्य।
विज्ञापन
कानपुर/ झांसी। सन् 2003 में झांसी में स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना में हुए 11 लाख रुपये के घोटाले में तत्कालीन सीडीओ समेत 17 लोग फंस गए हैं। इसमें जिला परियोजना निदेशक और फर्म मालिक भी शामिल हैं। इसमें कागजों में स्टेशनरी की आपूर्ति दिखाकर रकम हड़पने का आरोप है। उधर, एफआईआर की खबर आने पर विकास भवन स्थित कार्यालय में कर्मचारी एक-दूसरे पर शक जताते रहे और स्वयं का बचाव करते रहे। इस मामले में अफसरों की कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है।
प्रदेश में एक अप्रैल-1999 में तत्कालीन सरकार ने स्वर्ण जयंती ग्रामीण योजना प्रारंभ की थी। इस योजना के तहत ग्रामीणों को स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। इसके लिए स्टेशनरी की जरूरत होती थी। वर्ष 2003 में स्टेशनरी के लिए 11 लाख रुपये का बिल पास किया गया था, लेकिन स्टेशनरी की आपूर्ति नहीं हुई थी। इसका भुगतान जौनपुर के अरुण एजूकेशनल एंड जनरल सप्लायर के खाते में ट्रांसफर किया गया था। इस घोटाले की शिकायत एक शख्स ने शासन में की थी।
विज्ञापन
शासन के आदेश पर ईओडब्ल्यू की लखनऊ शाखा जांच कर रही है। कंपनी के मालिक अरुण कुमार ने पूछताछ में बताया कि इस घोटाले में उसकी कंपनी का बिल लगाया गया था। उसने किसी तरह के सामान की आपूर्ति नहीं की थी। सीतापुर के अभय सिंह ने उसे पांच फीसदी कमीशन का लालच देकर बिल का भुगतान उसके खाते में ट्रांसफर कराया था। खाते में भुगतान आने के बाद अभय ने उसे कमीशन देकर बाकी रकम ले ली थी। जांच में सामने आया कि यह बिल लिपिक से लेकर अकाउंटेंट, परियोजना निदेशक और सीडीओ के हस्ताक्षर से पास हुआ था। जांच के दौरान घोटाले में इन आरोपियों की संलिप्तता पाई गई है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ईओडब्ल्यू थाने में रिपोर्ट दर्ज हुई है।
विज्ञापन
ईओडब्ल्यू (आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा) की जांच में घोटाला सही पाया गया है। इसके आधार पर रेल बाजार स्थित ईओडब्ल्यू थाने में धोखाधड़ी, कूट रचित दस्तावेज तैयार करने, इस्तेमाल करने समेत अन्य धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई। विवेचना ईओडब्ल्यू की लखनऊ शाखा करेगी। सूत्रों के मुताबिक आरोपियों की कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है।
यह हैं नामजद
तत्कालीन झांसी के सीडीओ संजय कृष्ण, परियोजना निदेशक अमर सिंह, परियोजना अर्थशास्त्री महेश चंद्र साहू, संख्या सहायक राजकुमार खरे, आंकिक ग्राम विकास अधिकारी अधिकरण राजेश कुमार शर्मा, डीआरडीए (डिस्ट्रिक्ट रूरल डेवलेपमेंट एजेंसी) के लिपिक धनीराम, शाखा प्रबंधक यूपीएसएस (फर्म) अनिल कुमार जायसवाल, फर्म मालिक अरुण कुमार, उसकी पत्नी मधु राय, ठेकेदार अभय सिंह, बीडीओ गजेंद्र प्रताप सिंह, लिपिक कैलाश बहादुर, एडीओ मनु प्यारे, लिपिक राजकुमार कोरी और बीडीओ अखिलेश कुमार वैश्य।