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67 वर्ष, 60 रायफल, फायर सिर्फ चार

Thu, 12 Nov 2015 12:29 AM IST
ब्यूरो
ब्यूरो Updated Thu, 12 Nov 2015 12:29 AM IST
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67 years, 60 rifles, fired only four
झांसी। आजादी के बाद गठित हुए प्रांतीय रक्षक दल (पीआरडी) को अभी तक कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई है। यही वजह है कि पीआरडी जवानों की स्थिति काफी दयनीय है। पीआरडी के कार्य का आलम यह है कि छह दशक से अधिक समय होने के बाद भी जवान छह फायर भी नहीं कर पाए हैं।
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जिले में पीआरडी के 856 जवान हैं, लेकिन नियमित तौर पर करीब तीन सौ जवान ही ड्यूटी पर रहते हैं। ड्यूटी लगवाने के लिए भी जवानों को ड्यूटी प्रभारियों को चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। चढ़ावे के अतिरिक्त कार्यालय के चक्कर काटने पड़ते हैं, तब जाकर उन्हें ड्यूटी मिलती है। ड्यूटी भी अफसरों के घरों के बाहर पहरा देने के अतिरिक्त ज्यादा जिम्मेदारी वाली नहीं मिलती है।
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प्रांतीय रक्षक दल के जिला मुख्यालय में 60 रायफल हैं, जिसमें दस रायफल भरतुल वाली व एक रिवाल्वर है। रिवाल्वर कमांडेंट के पास रहती है, जबकि रायफल ड्यूटी पर लगे जवानों को दी जाती हैं। भरतुल रायफल चलन से बाहर होने के कारण गोदाम में रखी रहती है। पीआरडी के गोदाम में मात्र चार खोखे राइफल के कारतूसों के रखे हैं, जबकि रिवाल्वर का एक भी खोखा नहीं है, जो यह दर्शाता है कि 1948 से अब तक पीआरडी जवानों को चार राउंड फायर करने का ही मौका मिला है।
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प्रतिदिन ड्यूटी के मिलते हैं त्र 185
पीआरडी के जवानों को एक दिन ड्यूटी करने के 185 रुपये मिलते हैं, जबकि होमगार्ड के जवानों को एक दिन की ड्यूटी के 220 रुपये मिलते हैं। मनरेगा के मजदूरों को एक दिन की मजदूरी के 161 रुपये मिलते हैं। उनको साल में सौ दिन मजदूरी की गारंटी रहती है, लेकिन पीआरडी जवानों को साल में एक दिन की भी ड्यूटी की गारंटी नहीं है। इतना ही नहीं ड्यूटी करने के बाद उन्हें समय पर पैसा भी नहीं मिलता है।

यह है पीआरडी का इतिहास
देश की आजादी के बाद ब्रिटिश पुलिस का अस्तित्व समाप्त हो गया था, तब 1948 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पीआरडी में शामिल कर पुलिस व्यवस्था की कमान सौंपी गई थी। पुलिस का गठन होने तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के हाथ ही पुलिस व्यवस्था रही। प्रदेश में पुलिस व्यवस्था सुव्यवस्थित होते ही पीआरडी के जवान दरकिनार कर दिए गए। हालांकि उनका अस्तित्व तो बचा रहा, लेकिन सिर्फ नाम के लिए। वर्तमान में पीआरडी जवानों की स्थिति बेहद दयनीय हैं।


जवानों को बंदूकें चलाने के लिए नहीं, सुरक्षा के लिए दी जाती हैं। पीआरडी जवानों की जहां ड्यूटी लगी रहती है, दैव योग से वहां ऐसी कोई वारदात नहीं होती कि बंदूकें चलानी पड़ें। पीआरडी के जवानों को शासन की योजना के हिसाब से काम दिया जाता है।
धर्मेंद्र कुमार, कमांडेंट, प्रांतीय रक्षक दल, झांसी
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