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बालू स्टोरी: मजदूरी के पड़े लाले-City
Updated Thu, 13 Jul 2017 07:42 PM IST
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मजदूरी को बेकरार, 100 रुपये में बेलदार तैयार
सब हेड: पांच हजार से अधिक मजदूरों के हाथों में काम नहीं
क्रासर
महंगी बालू मिलने से बंद पड़े सरकारी और निजी कामों के कारण बनी यह स्थिति
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
बाजार में महंगी बालू मिलने से सरकारी और गैर सरकारी निर्माण कार्य बंद पड़ गए हैं। इसका सबसे ज्यादा असर रोज कमाने वाले मजदूरों पर पड़ा है। मजदूरी न मिल पाने के कारण उनके समक्ष खाने के लाले पड़ने लगे हैं। स्थिति यह है कि वह सौ रुपये में भी बेलदारी करने तैयार हैं।
शासन ने एक जुलाई से 30 सितंबर तक बालू के खनन पर रोक लगा दी है। इससे सभी सरकारी और गैर सरकारी निर्माण कार्य बंद पड़ गए हैं। मध्य प्रदेश के घाटों से आ रही बालू बेहद महंगी मिल रही है, इससे अधिकांश लोगों ने अपने छोटे-बड़े निर्माण बंद कर दिए हैं। हालांकि, इसका सबसे ज्यादा असर रोज कमाने वाले मजदूरों पर पड़ा है। महानगर में बड़ा बाजार, सीपरी बाजार, शिवाजी नगर, खातीबाबा और सदर बाजार की पुलिया पर प्रतिदिन करीब पांच हजार मजदूर काम के लिए आते हैं, लेकिन इनमें सौ से दो सौ मजदूरों को ही काम मिल पा रहा है। बाकी मजदूरों को निराश होकर घर वापस लौटना पड़ रहा है। कई मजदूर तो 100 रुपये में बेलदारी करने को तैयार है। मजदूरी न मिल पाने के कारण उनके समक्ष खाने के लाले पड़ने लगे हैं। जो मजदूर शहर में रहकर मजदूरी कर रहे थे, उनको मजबूरन परिवार समेत अपने गांव लौटना पड़ रहा है।
इसके अलावा शटरिंग मजदूर, बालू और ईंट ढोने वाले मजदूर, पुटीन और पेंटिंग करने वाले कारीगर, छोटे सीमेंट कारोबारी, बिल्डिंग मैटेरियल एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले ट्रैक्टर चालकों के भी हाथ खाली हैं।
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फोटो
सबका मालिक एक से भर रहा पेट
मैं मध्यप्रदेश के दिनारा से मजदूरी करने आता हूं। आने-जाने का किराया 60 रुपये लग जाता है। पिछले 10 दिन से काम न मिलने के कारण घर नहीं जा रहा हूं। स्टेशन पर सो जाता हूं और सबका मालिक एक पर खाना खाकर पेट भर रहा हूं। मजबूरन एक दिन तो 100 में भी बेलदारी की।
बृजेश, बेलदार
फोटो
कर्ज भी नहीं मिल रहा
तीन महीने बालू न मिलने से मुझे बहुत कम काम मिला। मैंने वे दिन किसी तरह कर्ज लेकर गुजारे। अब तो न काम मिल रहा और न ही कोई कर्ज देने को तैयार है। बच्चों को किताबें तक नहीं दिला पा रहा हूं। आगे के दिन कैसे कटेंगे, समझ नहीं आ रहा है।
संतोष कुमार, राजमिस्त्री।
फोटो
किराया देने को भी रुपये नहीं
मैं, पत्नी और दो बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता हूं। नियमित मजदूरी न मिल पाने के कारण पिछले तीन माह से किराया नहीं दे पा रहा हूं। अब तो बिलकुल काम नहीं मिल रहा। ऐसे में तो खाने के भी लाले पड़ने वाले है।
शकील, बेलदार।
फोटो
घर जाकर क्या करेंगे
मैं अपने पति राकेश के साथ मजदूरी करती हूं। हर दिन इसी उम्मीद से पुलिया पर आते हैं कि काम मिलेगा, लेकिन पिछले दस दिन में एक भी जगह काम नहीं मिला। रात में हम चित्रा चौराहे के पास ही सो जाते हैं। घर गुरसराय में है, लेकिन वहां जाकर भी क्या करेंगे?
मानवती, बेलदार।
फोटो
इलाज कराने के लिए भी रुपये नहीं
मुझे पांच दिन से काम नहीं मिल रहा। मजदूरी न मिलने से घर में झगड़ा तक हो रहा है। बच्चे बीमार हो जाए तो उसके लिए भी रुपये नहीं है। एक-एक दिन काटना मुश्किल हो रहा है।
मुन्नालाल, राजमिस्त्री।
फोटो
मनरेगा की तरह हो रोजगार की व्यवस्था
शहर में पांच हजार के करीब लोग निर्माण कार्यों की मजदूरी पर निर्भर है। ऐसी स्थिति में प्रशासन को मनरेगा की तरह शहर में भी मजदूरों के लिए रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि वे दो वक्त की रोटी की व्यवस्था तो कर सकें।
दुलीचंद अहिरवार, अध्यक्ष जनशक्ति निर्माण श्रमिक यूनियन।
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सब हेड: पांच हजार से अधिक मजदूरों के हाथों में काम नहीं
क्रासर
महंगी बालू मिलने से बंद पड़े सरकारी और निजी कामों के कारण बनी यह स्थिति
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
बाजार में महंगी बालू मिलने से सरकारी और गैर सरकारी निर्माण कार्य बंद पड़ गए हैं। इसका सबसे ज्यादा असर रोज कमाने वाले मजदूरों पर पड़ा है। मजदूरी न मिल पाने के कारण उनके समक्ष खाने के लाले पड़ने लगे हैं। स्थिति यह है कि वह सौ रुपये में भी बेलदारी करने तैयार हैं।
शासन ने एक जुलाई से 30 सितंबर तक बालू के खनन पर रोक लगा दी है। इससे सभी सरकारी और गैर सरकारी निर्माण कार्य बंद पड़ गए हैं। मध्य प्रदेश के घाटों से आ रही बालू बेहद महंगी मिल रही है, इससे अधिकांश लोगों ने अपने छोटे-बड़े निर्माण बंद कर दिए हैं। हालांकि, इसका सबसे ज्यादा असर रोज कमाने वाले मजदूरों पर पड़ा है। महानगर में बड़ा बाजार, सीपरी बाजार, शिवाजी नगर, खातीबाबा और सदर बाजार की पुलिया पर प्रतिदिन करीब पांच हजार मजदूर काम के लिए आते हैं, लेकिन इनमें सौ से दो सौ मजदूरों को ही काम मिल पा रहा है। बाकी मजदूरों को निराश होकर घर वापस लौटना पड़ रहा है। कई मजदूर तो 100 रुपये में बेलदारी करने को तैयार है। मजदूरी न मिल पाने के कारण उनके समक्ष खाने के लाले पड़ने लगे हैं। जो मजदूर शहर में रहकर मजदूरी कर रहे थे, उनको मजबूरन परिवार समेत अपने गांव लौटना पड़ रहा है।
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इसके अलावा शटरिंग मजदूर, बालू और ईंट ढोने वाले मजदूर, पुटीन और पेंटिंग करने वाले कारीगर, छोटे सीमेंट कारोबारी, बिल्डिंग मैटेरियल एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले ट्रैक्टर चालकों के भी हाथ खाली हैं।
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सबका मालिक एक से भर रहा पेट
मैं मध्यप्रदेश के दिनारा से मजदूरी करने आता हूं। आने-जाने का किराया 60 रुपये लग जाता है। पिछले 10 दिन से काम न मिलने के कारण घर नहीं जा रहा हूं। स्टेशन पर सो जाता हूं और सबका मालिक एक पर खाना खाकर पेट भर रहा हूं। मजबूरन एक दिन तो 100 में भी बेलदारी की।
बृजेश, बेलदार
फोटो
कर्ज भी नहीं मिल रहा
तीन महीने बालू न मिलने से मुझे बहुत कम काम मिला। मैंने वे दिन किसी तरह कर्ज लेकर गुजारे। अब तो न काम मिल रहा और न ही कोई कर्ज देने को तैयार है। बच्चों को किताबें तक नहीं दिला पा रहा हूं। आगे के दिन कैसे कटेंगे, समझ नहीं आ रहा है।
संतोष कुमार, राजमिस्त्री।
फोटो
किराया देने को भी रुपये नहीं
मैं, पत्नी और दो बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता हूं। नियमित मजदूरी न मिल पाने के कारण पिछले तीन माह से किराया नहीं दे पा रहा हूं। अब तो बिलकुल काम नहीं मिल रहा। ऐसे में तो खाने के भी लाले पड़ने वाले है।
शकील, बेलदार।
फोटो
घर जाकर क्या करेंगे
मैं अपने पति राकेश के साथ मजदूरी करती हूं। हर दिन इसी उम्मीद से पुलिया पर आते हैं कि काम मिलेगा, लेकिन पिछले दस दिन में एक भी जगह काम नहीं मिला। रात में हम चित्रा चौराहे के पास ही सो जाते हैं। घर गुरसराय में है, लेकिन वहां जाकर भी क्या करेंगे?
मानवती, बेलदार।
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इलाज कराने के लिए भी रुपये नहीं
मुझे पांच दिन से काम नहीं मिल रहा। मजदूरी न मिलने से घर में झगड़ा तक हो रहा है। बच्चे बीमार हो जाए तो उसके लिए भी रुपये नहीं है। एक-एक दिन काटना मुश्किल हो रहा है।
मुन्नालाल, राजमिस्त्री।
फोटो
मनरेगा की तरह हो रोजगार की व्यवस्था
शहर में पांच हजार के करीब लोग निर्माण कार्यों की मजदूरी पर निर्भर है। ऐसी स्थिति में प्रशासन को मनरेगा की तरह शहर में भी मजदूरों के लिए रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि वे दो वक्त की रोटी की व्यवस्था तो कर सकें।
दुलीचंद अहिरवार, अध्यक्ष जनशक्ति निर्माण श्रमिक यूनियन।