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रेलवे आरक्षण कार्यालय में टोकन प्रणाली समेटा-City
Updated Sun, 23 Sep 2018 12:54 AM IST
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आरक्षण कार्यालय से हटा टोकन सिस्टम
- रेल प्रशासन ने बार-बार की किरकिरी से बचने के लिए ने उठाया कदम
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
यात्रियों की सुविधा के लिए आरक्षण कार्यालय में लगाई गई टोकन प्रणाली को चलाने में रेलवे सफल नहीं हो सका। रेल प्रशासन ने बार-बार की किरकिरी से बचने के लिए कार्यालय में बंद पड़े उपकरणों को हटा लिया है। इससे रेलवे को लाखों रुपये की हानि हुई है।
2010 में उत्तर मध्य रेल प्रशासन ने झांसी व ग्वालियर स्टेशन के आरक्षण कार्यालय में संचालित टोकन प्रणाली का ठेका वाराणसी की एनालॉक सिस्टम कंपनी को दिया था। कंपनी ने झांसी स्टेशन पर टोकन प्रणाली की शुरुआत अक्तूबर 2010 में की थी। रेल प्रशासन का कंपनी से पांच साल का एग्रीमेंट था। पहले साल में रेल प्रशासन ने 14 लाख का ठेका दिया था, जिसमें कंपनी ने दोनों स्टेशनों पर उपकरणों को लगाया। शर्त के मुताबिक पहले साल कंपनी को फ्री सर्विस देनी थी। इसके बाद अगले चार साल तक रेलवे को केवल उपकरणों की मरम्मत का पैसा देना था। एक साल बाद कंपनी ने तय मरम्मत राशि से फायदा होता न देख रेल प्रशासन से राशि बढ़ाने की मांग की थी। मगर, रेल प्रशासन ने मरम्मत शुल्क नहीं बढ़ाया था। इस पर कंपनी ने सर्विस देने से मना कर दिया था। इससे व्यवस्था आगे नहीं चल सकी।
2017 में दोबारा टोकन प्रणाली चलाने का ठेका भोपाल की फर्म को दिया गया। मगर, कंपनी द्वारा रखरखाव वक्त पर न करने के कारण मशीन बंद और चालू होती रही। अभी पिछले कई महीनों से यह व्यवस्था ध्वस्त चल रही थी। किरकिरी से बचने के लिए रेल प्रशासन ने अब आरक्षण कार्यालय से उपकरण ही हटा लिए हैं।
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‘टोकन प्रणाली के अभी आरक्षण कार्यालय से उपकरण हटा लिए गए हैं। आगे इस व्यवस्था को कैसे चलाना है? इस पर रेल प्रशासन विचार कर रहा है।’ - मनोज कुमार सिंह, जनसंपर्क अधिकारी।
टोकन प्रणाली से यह होता है लाभ
आरक्षण कार्यालय पर संचालित होने वाली टोकन प्रणाली से यात्रियों को खासी सहूलियत थी। टोकन नंबर लेने के बाद यात्री आराम से बेंच पर बैठकर अपने नंबर के आने का इंतजार कर लेता था, उसे लंबी कतारों में नहीं लगना पड़ता था। खासतौर पर वृद्ध यात्रियों को बहुत आराम था। इसके अलावा जान पहचान व रुतबा रखने वाले लोग कर्मचारियों पर दबाव बनाकर अंदर से आरक्षण नहीं करा पाते थे। इससे विवाद की स्थिति नहीं बनती थी। प्रणाली के बंद होने के कारण लोग लाइन में लग कर आरक्षण कराने को मजबूर हैं।
- रेल प्रशासन ने बार-बार की किरकिरी से बचने के लिए ने उठाया कदम
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
यात्रियों की सुविधा के लिए आरक्षण कार्यालय में लगाई गई टोकन प्रणाली को चलाने में रेलवे सफल नहीं हो सका। रेल प्रशासन ने बार-बार की किरकिरी से बचने के लिए कार्यालय में बंद पड़े उपकरणों को हटा लिया है। इससे रेलवे को लाखों रुपये की हानि हुई है।
2010 में उत्तर मध्य रेल प्रशासन ने झांसी व ग्वालियर स्टेशन के आरक्षण कार्यालय में संचालित टोकन प्रणाली का ठेका वाराणसी की एनालॉक सिस्टम कंपनी को दिया था। कंपनी ने झांसी स्टेशन पर टोकन प्रणाली की शुरुआत अक्तूबर 2010 में की थी। रेल प्रशासन का कंपनी से पांच साल का एग्रीमेंट था। पहले साल में रेल प्रशासन ने 14 लाख का ठेका दिया था, जिसमें कंपनी ने दोनों स्टेशनों पर उपकरणों को लगाया। शर्त के मुताबिक पहले साल कंपनी को फ्री सर्विस देनी थी। इसके बाद अगले चार साल तक रेलवे को केवल उपकरणों की मरम्मत का पैसा देना था। एक साल बाद कंपनी ने तय मरम्मत राशि से फायदा होता न देख रेल प्रशासन से राशि बढ़ाने की मांग की थी। मगर, रेल प्रशासन ने मरम्मत शुल्क नहीं बढ़ाया था। इस पर कंपनी ने सर्विस देने से मना कर दिया था। इससे व्यवस्था आगे नहीं चल सकी।
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2017 में दोबारा टोकन प्रणाली चलाने का ठेका भोपाल की फर्म को दिया गया। मगर, कंपनी द्वारा रखरखाव वक्त पर न करने के कारण मशीन बंद और चालू होती रही। अभी पिछले कई महीनों से यह व्यवस्था ध्वस्त चल रही थी। किरकिरी से बचने के लिए रेल प्रशासन ने अब आरक्षण कार्यालय से उपकरण ही हटा लिए हैं।
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‘टोकन प्रणाली के अभी आरक्षण कार्यालय से उपकरण हटा लिए गए हैं। आगे इस व्यवस्था को कैसे चलाना है? इस पर रेल प्रशासन विचार कर रहा है।’ - मनोज कुमार सिंह, जनसंपर्क अधिकारी।
टोकन प्रणाली से यह होता है लाभ
आरक्षण कार्यालय पर संचालित होने वाली टोकन प्रणाली से यात्रियों को खासी सहूलियत थी। टोकन नंबर लेने के बाद यात्री आराम से बेंच पर बैठकर अपने नंबर के आने का इंतजार कर लेता था, उसे लंबी कतारों में नहीं लगना पड़ता था। खासतौर पर वृद्ध यात्रियों को बहुत आराम था। इसके अलावा जान पहचान व रुतबा रखने वाले लोग कर्मचारियों पर दबाव बनाकर अंदर से आरक्षण नहीं करा पाते थे। इससे विवाद की स्थिति नहीं बनती थी। प्रणाली के बंद होने के कारण लोग लाइन में लग कर आरक्षण कराने को मजबूर हैं।