{"_id":"5dd84ba88ebc3e54a75cbbb3","slug":"1857-wall-sturggle-for-freedom-jhansi-news-jhs153182678","type":"story","status":"publish","title_hn":"अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही 1857 के गदर की ढाल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही 1857 के गदर की ढाल
विज्ञापन
बड़ागांव गेट स्थित परकोटा जर्जर हालत में।
झांसी। हर साल की तरह इस बार भी विश्व धरोहर सप्ताह मनाया जा रहा है, जिसमें पुरा धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के बड़े-बड़े दावे और वादे किए जा रहे हैं। लेकिन, धरातल पर हकीकत इससे इतर है। इसका अंदाजा किले के प्राचीन परकोटे को देखकर लगाया जा सकता है, जो अनदेखी के चलते अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करता नजर आ रहा है। बावजूद, किसी भी सरकारी महकमे का ध्यान इस ओर नहीं है।
झांसी के ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण सन 1613 में किया गया था। जबकि, इससे जुड़ा हुआ परकोटा सत्रहवीं शताब्दी में बनाया गया। यह परकोटा पुराने शहर को चारों ओर से घेरे हुए है। शहर से बाहर आवागमन के लिए इसमें एक दर्जन से अधिक दरवाजे हैं। यही वो दीवार है, जो 1857 के संग्राम में महारानी लक्ष्मीबाई की ढाल बनकर खड़ी रही थी। ये अपने में अनूठी पुरातात्विक धरोहर है। बावजूद, अनदेखी की शिकार है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इतिहास की इस धरोहर को अब तक न तो राज्य पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में लिया और न ही केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने। नगर निगम और झांसी विकास प्राधिकरण जैसे सरकारी महकमे भी इससे कन्नी काटे हुए हैं।
इसी का नतीजा है कि इसके अस्तित्व पर लगातार संकट मंडरा रहा है। परकोटे को तोड़कर जगह-जगह कब्जे कर दुकानें व मकान बना लिए गए हैं। ये क्रम लगातार जारी है। दीवारें भी धसकने लगी हैं। दरवाजों के पत्थर लगातार झड़ रहे हैं। किसी भी दिन ये किसी बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं।
विज्ञापन
नगर निगम ने भी पहुंचाया नुकसान
भांडेरी गेट के पास नाला निकासी के लिए इसी साल नगर निगम ने परकोटे के एक हिस्से को ढहा दिया था। अमर उजाला ने इसके खिलाफ मुहिम चलाई थी। इस पर नगर निगम के अफसरों द्वारा दुबारा दीवार खड़ी करने का वादा किया गया था। बावजूद, अब तक धरातल पर कोई काम नहीं हुआ है।
जल्द ही नगर निगम टाउन प्लानर की तैनाती करने जा रहा है। इसके बाद किले के परकोटे को लेकर बड़ी योजना तैयार की जाएगी। इसे अमली जामा पहनाने के लिए जेडीए व पुरातत्व विभाग का भी सहयोग लिया जाएगा।
- रामतीर्थ सिंघल, महापौर
परकोटे पर भारी पैमाने पर अतिक्रमण होने की वजह से इसे पुरातत्व विभाग संरक्षण में नहीं ले सकता है। इसके अलावा विभाग के पास संसाधनों का भी अभाव है। नगर विकास के महकमों को इसका विकास करना चाहिए।
- डॉ. एस के दुबे, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी
विकास के नए काम तो हो रहे हैं, जो ठीक है। लेकिन, इसी रफ्तार के साथ पुरा धरोहरों के संरक्षण का इंतजाम भी किया जाना चाहिए। इनकी उपेक्षा का मतलब इतिहास को उपेक्षित करना है।
- राजीव शर्मा, सेवानिवृत्त जिला प्रोबेशन अधिकारी
आगरा हो या खजुराहो, यहां देसी-विदेशी पर्यटक पुरातात्विक धरोहर ही देखने आते हैं। झांसी का परकोटा इतिहास की अनूठी विरासत है। इसे संरक्षित कर हम आसानी से पर्यटन बढ़ा सकते हैं।
- प्रदीप तिवारी, पर्यटन विशेषज्ञ
किले और महल तो हर जगह मिल जाएंगे, परंतु परकोटे जैसी प्राचीन धरोहर देखने को नहीं मिलती है। ये झांसी के गौरवमयी इतिहास का प्रतिबिंब है। सरकार को इसके संरक्षण को प्रभावी उपाय करने चाहिए।
- रीतेश अग्रवाल, अधिवक्ता
हम अपने पूर्वजों की विरासत का संरक्षण भी नहीं कर पा रहे हैं। ये दुखद है। अगर जल्द ही परकोटे के संरक्षण को लेकर कोई गंभीर कदम नहीं उठाए गए तो वो दिन दूर नहीं, जब इसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।
- नीलेश मोदी, कारोबारी
विज्ञापन
झांसी के ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण सन 1613 में किया गया था। जबकि, इससे जुड़ा हुआ परकोटा सत्रहवीं शताब्दी में बनाया गया। यह परकोटा पुराने शहर को चारों ओर से घेरे हुए है। शहर से बाहर आवागमन के लिए इसमें एक दर्जन से अधिक दरवाजे हैं। यही वो दीवार है, जो 1857 के संग्राम में महारानी लक्ष्मीबाई की ढाल बनकर खड़ी रही थी। ये अपने में अनूठी पुरातात्विक धरोहर है। बावजूद, अनदेखी की शिकार है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इतिहास की इस धरोहर को अब तक न तो राज्य पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में लिया और न ही केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने। नगर निगम और झांसी विकास प्राधिकरण जैसे सरकारी महकमे भी इससे कन्नी काटे हुए हैं।
विज्ञापन
इसी का नतीजा है कि इसके अस्तित्व पर लगातार संकट मंडरा रहा है। परकोटे को तोड़कर जगह-जगह कब्जे कर दुकानें व मकान बना लिए गए हैं। ये क्रम लगातार जारी है। दीवारें भी धसकने लगी हैं। दरवाजों के पत्थर लगातार झड़ रहे हैं। किसी भी दिन ये किसी बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं।
विज्ञापन
नगर निगम ने भी पहुंचाया नुकसान
भांडेरी गेट के पास नाला निकासी के लिए इसी साल नगर निगम ने परकोटे के एक हिस्से को ढहा दिया था। अमर उजाला ने इसके खिलाफ मुहिम चलाई थी। इस पर नगर निगम के अफसरों द्वारा दुबारा दीवार खड़ी करने का वादा किया गया था। बावजूद, अब तक धरातल पर कोई काम नहीं हुआ है।
जल्द ही नगर निगम टाउन प्लानर की तैनाती करने जा रहा है। इसके बाद किले के परकोटे को लेकर बड़ी योजना तैयार की जाएगी। इसे अमली जामा पहनाने के लिए जेडीए व पुरातत्व विभाग का भी सहयोग लिया जाएगा।
- रामतीर्थ सिंघल, महापौर
परकोटे पर भारी पैमाने पर अतिक्रमण होने की वजह से इसे पुरातत्व विभाग संरक्षण में नहीं ले सकता है। इसके अलावा विभाग के पास संसाधनों का भी अभाव है। नगर विकास के महकमों को इसका विकास करना चाहिए।
- डॉ. एस के दुबे, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी
विकास के नए काम तो हो रहे हैं, जो ठीक है। लेकिन, इसी रफ्तार के साथ पुरा धरोहरों के संरक्षण का इंतजाम भी किया जाना चाहिए। इनकी उपेक्षा का मतलब इतिहास को उपेक्षित करना है।
- राजीव शर्मा, सेवानिवृत्त जिला प्रोबेशन अधिकारी
आगरा हो या खजुराहो, यहां देसी-विदेशी पर्यटक पुरातात्विक धरोहर ही देखने आते हैं। झांसी का परकोटा इतिहास की अनूठी विरासत है। इसे संरक्षित कर हम आसानी से पर्यटन बढ़ा सकते हैं।
- प्रदीप तिवारी, पर्यटन विशेषज्ञ
किले और महल तो हर जगह मिल जाएंगे, परंतु परकोटे जैसी प्राचीन धरोहर देखने को नहीं मिलती है। ये झांसी के गौरवमयी इतिहास का प्रतिबिंब है। सरकार को इसके संरक्षण को प्रभावी उपाय करने चाहिए।
- रीतेश अग्रवाल, अधिवक्ता
हम अपने पूर्वजों की विरासत का संरक्षण भी नहीं कर पा रहे हैं। ये दुखद है। अगर जल्द ही परकोटे के संरक्षण को लेकर कोई गंभीर कदम नहीं उठाए गए तो वो दिन दूर नहीं, जब इसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।
- नीलेश मोदी, कारोबारी