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गायों की सेवा में हो गए 18 करोड़ के कर्जदार
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झांसी। जिले के गोआश्रय स्थलों में रखी गईं गाय और अन्य गोवंश को चारे की व्यवस्था करने में बुंदेले करीब 18 करोड़ रुपये के कर्जदार हो गए हैं, लेकिन शासन इसकी भरपाई नहीं कर रहा है। इस माह महज 2.95 करोड़ रुपये ही जारी हुए हैं, जबकि गोशालाओं पर भारी - भरकम बकाया हो गया है।
अन्ना जानवरों से निपटने को अस्थाई गोशालाएं आरंभ हुईं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जनपद की 196 अस्थाई गोशालाओं में 25,333 गोवंश हैं। इनकी देखरेख की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की है, जबकि भूसे की व्यवस्था शासन को करनी पड़ती है। भूसे पर सालाना 26 करोड़ रुपये का खर्च है लेकिन, शासन नियमित पैसा नहीं दे रहा है। ऐसे में निवर्तमान प्रधान एवं ग्राम समिति के सदस्य किसी तरह भूसे का इंतजाम कर रहे हैं। प्रत्येक अस्थाई गोशाला पर बकाया हो गया है।
जनवरी में दो किस्तों के जरिये 2.95 करोड़ रुपये मिले थे। अफसरों का कहना है दस माह में करीब आठ करोड़ रुपये मिले, जबकि गायों को खिलाने में हर माह करीब सवा दो करोड़ रुपये का खर्च है। नियमित पैसा नहीं मिलने से गोशाला संचालन की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान पर आ गई। रबी की फसल तैयार होनेे वाली है। पंचायत चुनाव कुछ महीने बाद होने हैं, ऐसे में निवर्तमान ग्राम प्रधान इनके संचालन से पल्ला भी नहीं झाड़ पा रहे हैं। ग्राम ध्वानी, खिसनी बुजुर्ग, दरबटयाऊ जैसी ग्राम पंचायतें गोशालाओं पर तीस लाख रुपये से अधिक खर्च कर चुकीं हैं। पैसा नहीं मिलने से कई गोशालाओं में बदइंतजामी की शिकायत सामने आ रही है। गोशालाओं में बंद गोवंशों को नियमित खाना नहीं मिल रहा है। इस कारण कई जगहों पर जानवर चोरी - छिपे बाहर हांक दिए जा रहे हैं।
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अपर निदेशक डा. वाईएस तोमर का कहना है जनवरी में दो किस्त में धन आवंटन हुआ है। इसे ब्लॉकवार वितरित कर दिया गया है। अब शेष धनराशि के लिए भी शासन को पत्र लिखा गया है।
प्रति गोवंश मिलती है तीस रुपये की खुराक
गोशालाएं तो बनवाई गईं, लेकिन उनके रखरखाव को लेकर शासन ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। गोशाला बनते ही ग्राम पंचायतों को इसका जिम्मा दे दिया गया। जानवरों की खुराक एक गोवंश पर प्रतिदिन तीस रुपये तय की गई है, जबकि पशु चिकित्सकों का मानना है कि एक जानवर पर न्यूनतम 100-125 रुपये खर्च आता है। शासन तीस रुपये का भी नियमित भुगतान नहीं कर रहा है।
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अन्ना जानवरों से निपटने को अस्थाई गोशालाएं आरंभ हुईं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जनपद की 196 अस्थाई गोशालाओं में 25,333 गोवंश हैं। इनकी देखरेख की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की है, जबकि भूसे की व्यवस्था शासन को करनी पड़ती है। भूसे पर सालाना 26 करोड़ रुपये का खर्च है लेकिन, शासन नियमित पैसा नहीं दे रहा है। ऐसे में निवर्तमान प्रधान एवं ग्राम समिति के सदस्य किसी तरह भूसे का इंतजाम कर रहे हैं। प्रत्येक अस्थाई गोशाला पर बकाया हो गया है।
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जनवरी में दो किस्तों के जरिये 2.95 करोड़ रुपये मिले थे। अफसरों का कहना है दस माह में करीब आठ करोड़ रुपये मिले, जबकि गायों को खिलाने में हर माह करीब सवा दो करोड़ रुपये का खर्च है। नियमित पैसा नहीं मिलने से गोशाला संचालन की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान पर आ गई। रबी की फसल तैयार होनेे वाली है। पंचायत चुनाव कुछ महीने बाद होने हैं, ऐसे में निवर्तमान ग्राम प्रधान इनके संचालन से पल्ला भी नहीं झाड़ पा रहे हैं। ग्राम ध्वानी, खिसनी बुजुर्ग, दरबटयाऊ जैसी ग्राम पंचायतें गोशालाओं पर तीस लाख रुपये से अधिक खर्च कर चुकीं हैं। पैसा नहीं मिलने से कई गोशालाओं में बदइंतजामी की शिकायत सामने आ रही है। गोशालाओं में बंद गोवंशों को नियमित खाना नहीं मिल रहा है। इस कारण कई जगहों पर जानवर चोरी - छिपे बाहर हांक दिए जा रहे हैं।
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अपर निदेशक डा. वाईएस तोमर का कहना है जनवरी में दो किस्त में धन आवंटन हुआ है। इसे ब्लॉकवार वितरित कर दिया गया है। अब शेष धनराशि के लिए भी शासन को पत्र लिखा गया है।
प्रति गोवंश मिलती है तीस रुपये की खुराक
गोशालाएं तो बनवाई गईं, लेकिन उनके रखरखाव को लेकर शासन ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। गोशाला बनते ही ग्राम पंचायतों को इसका जिम्मा दे दिया गया। जानवरों की खुराक एक गोवंश पर प्रतिदिन तीस रुपये तय की गई है, जबकि पशु चिकित्सकों का मानना है कि एक जानवर पर न्यूनतम 100-125 रुपये खर्च आता है। शासन तीस रुपये का भी नियमित भुगतान नहीं कर रहा है।