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हादसे और बारिश में ही प्रशासन को याद आती है जर्जर भवनों की याद

Tue, 17 May 2022 11:39 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 17 May 2022 11:39 PM IST
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The administration remembers the dilapidated buildings only in the accident and rain
नवाब युसूफ रोड पर जर्जर बिल्डिंग दुर्घटना को दे रही दावत। संवाद - फोटो : JAUNPUR
जौनपुर। जर्जर भवन के चलते हादसे होने का हमेशा खतरा मंडराता रहता है लेकिन जिम्मेदारों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है। बात अगर अकेले शहर की करें तो यहां करीब 300 से अधिक जर्जर मकान होंगे। जिम्मेदार कागजी कार्रवाई करके मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिए हैं, जबकि एक साल के अंदर देखा जाए तो कई भवन गिर चुके हैं। इसमें दो बड़े हादसे भी हुए हैं, जो आज भी जर्जर भवनों को लेकर होने वाले चर्चा में सबसे पहले लिए जाते हैं।
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शहर क्षेत्र में ओलंदगंज, रूहट्टा, बांसफोड़ वाली गली, अहमद खां मंडी, बजरंग घाट आदि स्थानों पर जर्जर मकान हैं, जो कभी भी गिर सकते हैं। उनके गिरने से बड़ा हादसा होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। कई मकान तो प्रमुख बाजारों के बीच सड़कों पर मौजूद हैं, जिनके गिरने से कई लोगों की जाने जा सकती हैं। लगभग ऐसे ही हालत ग्रामीण क्षेत्रों में भी है। मकान जर्जर हो गया है, लेकिन उसमें लोग रहने को विवश हैं। बारिश के समय हर साल ऐसे मकानों को जिम्मेदारों की ओर से चयन किया जाता है, लेकिन जैसे ही बारिश समाप्त हो जाती है तो वे भी इसको गिरवाने को भूल जाते हैं, जिससे कई भवनों की हालत ऐसी है कि तेज आंधी व बारिश होने पर जमींदोज हो सकते हैं। बावजूद इसके, ऐसे भवनों को गिरवाने का कोई कार्य नहीं किया जाता है। वहीं, जर्जर भवनों की बड़ी घटनाओं का जिक्र करें तो एक सप्ताह पहले ही नगर में जर्जर भवन का बारजा ढह गया था, जिसमें एक युवक की मौत हो गई थी, जबकि पिछले साल अक्तूबर माह में एक मकान ढह गया था, इस घटना में कई लोगों की जान चली गई थी। हालांकि इसके बाद जिम्मेदार इसे लेकर गंभीर हुए। मगर, कुछ ही दिन बाद कागजी घोड़ा दौड़ाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल किया है।
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समय-समय पर जर्जर भवन के स्वामियों को नोटिस दिया जाता है लेकिन उनके द्वारा गिराने का कार्य नहीं किया जाता है। इसकी जानकारी उच्चाधिकारियों को दी जाती है। - संतोष कुमार मिश्रा, अधिशासी अधिकारी
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