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मल्हनी का अलग अंदाज, धारा के विपरीत रहा ‘राज’

Fri, 23 Oct 2020 10:50 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 23 Oct 2020 10:50 PM IST
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Malhani's different style, 'Raj' remained opposite the stream
जौनपुर। मल्हनी विधानसभा क्षेत्र के वोटरों का मिजाज बगावती रहा है। यहां के मतदाता न कभी लहर में नहीं बहते हैं बल्कि धारा के विपरीत ही ज्यादा चलते हैं। देश भर में सत्ता विरोधी लहर के बावजूद जनता पार्टी के उम्मीदवार को यहां से जीतने के लिए नाकों चने चबाने पड़े थे। राम लहर में तो भाजपा उम्मीदवार को यहां करारी शिकस्त खानी पड़ी। 2017 के प्रचंड मोदी लहर में भी यहां कमल नहीं खिल सका। इस तरह मल्हनी सियासत का वह मैदान है, जहां के वोटर को समझना आसान नहीं है। रारी (अब मल्हनी) में सर्वाधिक छह बार कांग्रेस को जीत मिली है। उसके बाद यहां के वोटर धारा के विपरीत चलने लगे। देश-प्रदेश के माहौल से उनका मिजाज अलग ही रहा है। आपात काल के बाद वर्ष 1977 में हुए चुनाव में पूरे देश में जेपी लहर चल रही थी। इस आंधी ने कांग्रेस के बड़े-बड़े किले ढहा दिए गए। ज्यादातर सीटों पर जनता पार्टी के उम्मीदवारों को एकतरफा जीत मिली। तब भी यहां कांग्रेस मजबूती से लड़ी। जनता पार्टी के राजबहादुर को 34730 वोट पाकर जीते जबकि कांग्रेस के सूर्यनाथ उपाध्याय को 33511 वोट मिले। जीत-हार का सबसे कम 1219 वोटों का अंतर इसी चुनाव में रहा है। जनता पार्टी चुनाव तो जीत गई, लेकिन कांग्रेस ने उनके दांत खट्टे कर दिए। वर्ष 1991 में राम लहर का जिले में भी व्यापक असर था और भाजपा प्रत्याशियों को जीत मिली लेकिन रारी में जनता पार्टी के मिर्जा सुल्तान जीते। उन्हें 28659 वोट मिले, जबकि दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के अरुण सिंह 19851 मत प्राप्त कर पाए थे। भाजपा के माता सेवक उपाध्याय 19526 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे। 1993 में भी राम लहर थी। तब यहां बसपा के लालजी यादव 58680 वोट पाकर विजेता बने। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के माता सेवक उपाध्याय (29670) को लगभग दोगुने अंतर से हराया था। वर्ष 2002 में जब सूबे में सपा के पक्ष में माहौल था, तब निर्दल उम्मीदवार धनंजय सिंह निर्वाचित हुए और वर्ष 2007 के चुनाव में जब बसपा को सूबे पूर्ण बहुमत मिला तो रारी से जदयू को जीत मिली। वर्ष 2017 के प्रवाहित प्रचंड मोदी-योगी लहर में भी मल्हनी के वोटरों ने सपा पर भरोसा जताया था।
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