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धरोहरों के वजूद पर मंडरा रहा संकट
संजय शर्मा, जौनपुर
Updated Sun, 27 Sep 2015 12:45 AM IST
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पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों के वजूद पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इतिहास को संजोए इन इमारतों को संरक्षण की दरकार है। शाही किला, अटाला मस्जिद, बड़ी मस्जिद, हमाम दरवाजा, चार अंगुल की मस्जिद, शाह फिरोज का मकबरा, लाल दरवाजा समेत कई अन्य ऐतिहासिक इमारतों के इर्द-गिर्द अट्टालिकाएं बन गई हैं।
जिले में राष्ट्रीय महत्व के केंद्रीय संरक्षित प्राचीन स्मारकों की संख्या दर्जन भर से अधिक है। कानूनन किसी भी पुरास्थल के 300 मीटर की परिधि में कोई निर्माण, खनन नहीं कराया जा सकता। जबकि जौनपुर में सभी स्मारकों के आसपास घनी आबादी बस गई है।
एक भी ऐसा स्मारक नहीं हैस जिसके आसपास निर्धारित मानक के हिसाब से आबादी बसी हो। तीन सौ मीटर की परिधि में आने वाले मकान स्वामियों को पूर्व में नोटिस जरूर दिया गया था लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। शाही किले के उत्तर, पश्चिम, पूरब में घनी आबादी है जबकि दक्षिण में गोमती नदी है। अटाला मस्जिद, बड़ी मस्जिद, झझरी मस्जिद, शाह फिरोज का मकबरा सहित अन्य स्मारकों के आसपास आबादी बस गई है।
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क्या है नियम
प्राचीन स्मारक, पुरास्थल एवं अवशेष अधिनियम 2010 के द्वारा संरक्षित सीमा (स्मारक) से 100 मीटर क्षेत्र को प्रतिनिषिद्ध क्षेत्र एवं इससे परे 200 मीटर के क्षेत्र को विनियमित क्षेत्र घोषित किया गया है। प्रतिनिषिद्ध क्षेत्र में निर्माण, खनन आदि पूर्णत: वर्जित है। जबकि विनियमित क्षेत्र में सक्षम अधिकारी द्वारा जारी अनापत्ति प्रमाणपत्र के आधार पर ही निर्माण, पुननिर्माण, मरम्मत, खनन आदि कार्य किए जा सकते हैं। धारा 30 (क) एवं (ख) के तहत दोषी व्यक्तियों को दो साल की कैद या एक लाख रुपये जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है।
जिले में हैं पर्यटन की असीम संभावनाएं
जौनपुर। प्राचीन शहर जौनपुर में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। दर्जन भर से अधिक ऐतिहासिक इमारतों के होने के बावजूद यह शहर पर्यटन के मानचित्र पर नहीं आ सका। जिले को पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए राजनीतिक पहल की दरकार है। वाराणसी की कुछ एजेंसियां यहां पर्यटकों का भ्रमण भी करवाती हैं लेकिन बाहर से आने वाले गाइडों को यहां के बारे में अधिक जानकारी न होने की वजह से पर्यटक जौनपुर के पूरे इतिहास को नहीं समझ पाते।
कोट:
जौनपुर अकेला शहर नहीं है, जहां ऐतिहासिक धरोहरों के आसपास आबादी बस गई है। दिल्ली की कुतुबमिनार समेत तमाम स्मारकों के इर्द गिर्द भी आबादी बस गई है। वैसे इस मामले में यहां कई लोगों को नोटिस दिया गया है।
- एके श्रीवास्तव, अधीक्षण पुरातत्व विभाग
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जिले में राष्ट्रीय महत्व के केंद्रीय संरक्षित प्राचीन स्मारकों की संख्या दर्जन भर से अधिक है। कानूनन किसी भी पुरास्थल के 300 मीटर की परिधि में कोई निर्माण, खनन नहीं कराया जा सकता। जबकि जौनपुर में सभी स्मारकों के आसपास घनी आबादी बस गई है।
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एक भी ऐसा स्मारक नहीं हैस जिसके आसपास निर्धारित मानक के हिसाब से आबादी बसी हो। तीन सौ मीटर की परिधि में आने वाले मकान स्वामियों को पूर्व में नोटिस जरूर दिया गया था लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। शाही किले के उत्तर, पश्चिम, पूरब में घनी आबादी है जबकि दक्षिण में गोमती नदी है। अटाला मस्जिद, बड़ी मस्जिद, झझरी मस्जिद, शाह फिरोज का मकबरा सहित अन्य स्मारकों के आसपास आबादी बस गई है।
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क्या है नियम
प्राचीन स्मारक, पुरास्थल एवं अवशेष अधिनियम 2010 के द्वारा संरक्षित सीमा (स्मारक) से 100 मीटर क्षेत्र को प्रतिनिषिद्ध क्षेत्र एवं इससे परे 200 मीटर के क्षेत्र को विनियमित क्षेत्र घोषित किया गया है। प्रतिनिषिद्ध क्षेत्र में निर्माण, खनन आदि पूर्णत: वर्जित है। जबकि विनियमित क्षेत्र में सक्षम अधिकारी द्वारा जारी अनापत्ति प्रमाणपत्र के आधार पर ही निर्माण, पुननिर्माण, मरम्मत, खनन आदि कार्य किए जा सकते हैं। धारा 30 (क) एवं (ख) के तहत दोषी व्यक्तियों को दो साल की कैद या एक लाख रुपये जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है।
जिले में हैं पर्यटन की असीम संभावनाएं
जौनपुर। प्राचीन शहर जौनपुर में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। दर्जन भर से अधिक ऐतिहासिक इमारतों के होने के बावजूद यह शहर पर्यटन के मानचित्र पर नहीं आ सका। जिले को पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए राजनीतिक पहल की दरकार है। वाराणसी की कुछ एजेंसियां यहां पर्यटकों का भ्रमण भी करवाती हैं लेकिन बाहर से आने वाले गाइडों को यहां के बारे में अधिक जानकारी न होने की वजह से पर्यटक जौनपुर के पूरे इतिहास को नहीं समझ पाते।
कोट:
जौनपुर अकेला शहर नहीं है, जहां ऐतिहासिक धरोहरों के आसपास आबादी बस गई है। दिल्ली की कुतुबमिनार समेत तमाम स्मारकों के इर्द गिर्द भी आबादी बस गई है। वैसे इस मामले में यहां कई लोगों को नोटिस दिया गया है।
- एके श्रीवास्तव, अधीक्षण पुरातत्व विभाग