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नहीं संभलती तो बेटे का क्या होता
Updated Thu, 26 Jul 2018 12:00 AM IST
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जौनपुर। 21 सितंबर 2000 का वह काला दिन याद कर आज भी सिहर जाती हूं जब पति शकील अहमद के शहीद होने की खबर आई थी। उस वक्त बेटा शादाब ढाई वर्ष का था और बेटे को लेकर मायके में थी। अभी कोई छह माह पहले वह छुट्टी से वापस ड्यूटी पर गए थे और वापस आने पर मकान बनवाने का वादा किया था। आपरेशन रक्षक के दौरान दुश्मन देश से लड़ाई के दौरान शहीद हुए शकील अहद खान की विधवा नरगिस बेगम पति की तस्वीर को सीने से लगाकर फफक पड़ीं। कुछ देर तक उनका गला रूंधा रहा। नरगिस कहती हैं कि शौहर की शहादत के बाद से तो जैसे उनकी दुनिया ही उजड़ गई लेकिन बेटा का चेहरा निहारती हूं। उसके भविष्य को संवारने के लिए खुद को संभालना जरूरी था। अब खुद जीने की इच्छा नहीं पर बेटे के लिए जी रही हूं।
उस वक्त बेटा शादाब दो साल का था जब वह अंतिम बार छुट्टी पर घर आए थे। उनकी ख्वाहिश थी की बेटे को खूब पढ़ा लिखाकर अफसर बनाएंगे। लेकिन छुट्टी खत्म होने के बाद ड्यूटी पर गए तो ठीक छह महीने बाद दुश्मन देश से लड़ाई के दौरान शहादत का जाम पी गए। नरगिस अपने फूल से बेटे को उदास नहीं देखना चाहती थी। इसलिए गमों के पहाड़ तले दबे होने के बाद भी गमों को सीने में दफ्न कर लीं। होंठों पर मुस्कान ले आई। उनकी हंसी बेटे की संजीवनी है। बेटा शादाब इंटर तक की पढ़ाई वाराणसी के आर्मी स्कूल में पूरी करने के बाद इस साल पतरही में स्थित डिग्री कालेज में बीएससी में दाखिला लिया है। नरगिश कहती हैं कि वह 19 सितंबर 2000 को शहीद हुए लेकिन उन्हें इसकी जानकारी 21 को उस दिन मिली जिस दिन उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा। खबर मिलते ही वह मायका चंदौली से घर पहुंची तो यहां दरवाजे पर ताबूत में पति का पार्थिव शरीर रखा था। बाद में कुछ नेता भी घर पर आए थे। जमीन का पट्टा और पेट्रोल पंप दिलाने का भरोसा दिया गया था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका। राशन कार्ड तक नहीं बना है। पेंशन के पैसे से किसी तरह बेटे को पढ़ा लिखा रही हैं।
शहीद की विधवा को पुलिस से भी नहीं मिल रही मदद
जौनपुर। शहीद की विधवा नरगिस बेगम अपने बेटे शादाब के साथ नरकटा गांव में दो कमरों के एक छोटे से मकान में रहती है। टीनशेड से बने मकान के ऊपर से पड़ोसियों ने जबरन बिजली की केबल खींच ली है। केबल को हटवाने के लिए वह थाने में प्रार्थना पत्र दीं तो रविवार को पतरही चौकी से सिपाही एखलाक अहमद मौका देखने पहुंचा। बकौल नरगिश सिपाही उन पर ही भड़क गया, जिससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंची। सिपाही इस बात से तमतमाया था कि वह चौकी पर न जाकर सीधे थाने चली गईं। जबकि नरगिश को यही पता था कि पुलिस से किसी प्रकार की मदद के लिए थाने ही जाना पड़ता है।
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शहीद शकील अहमद खान
जौनपुर। चंदवक थाना क्षेत्र के नरकटा गांव निवासी नरगिस बेगम के मुताबिक उनके पति शकील अहमद 1988 में सेना में भर्ती हुए थे। शादी के बाद 10 साल तक उनका साथ रहा। 12 साल की सर्विस पूरी हो गई थी। 19 सितंबर 2000 को श्रीनगर के उड़ी सेक्टर में आपरेशन रक्षक के दौरान तोप से दागे गए गोले से शहीद हो गए। शहीद होने से पहले उन्होंने तोप से दुश्मनों पर चार गोले बरसाए थे। श्रीनगर में ढाई साल से उनकी तैनाती थी। कारगिल की लड़ाई आपरेशन विजय में भी उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे। कारगिल की लड़ाई 26 जुलाई 1999 को खत्म होने के तकरीबन 14 माह बाद आपरेशन रक्षक के दौरान शहीद हो गए।
उस वक्त बेटा शादाब दो साल का था जब वह अंतिम बार छुट्टी पर घर आए थे। उनकी ख्वाहिश थी की बेटे को खूब पढ़ा लिखाकर अफसर बनाएंगे। लेकिन छुट्टी खत्म होने के बाद ड्यूटी पर गए तो ठीक छह महीने बाद दुश्मन देश से लड़ाई के दौरान शहादत का जाम पी गए। नरगिस अपने फूल से बेटे को उदास नहीं देखना चाहती थी। इसलिए गमों के पहाड़ तले दबे होने के बाद भी गमों को सीने में दफ्न कर लीं। होंठों पर मुस्कान ले आई। उनकी हंसी बेटे की संजीवनी है। बेटा शादाब इंटर तक की पढ़ाई वाराणसी के आर्मी स्कूल में पूरी करने के बाद इस साल पतरही में स्थित डिग्री कालेज में बीएससी में दाखिला लिया है। नरगिश कहती हैं कि वह 19 सितंबर 2000 को शहीद हुए लेकिन उन्हें इसकी जानकारी 21 को उस दिन मिली जिस दिन उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा। खबर मिलते ही वह मायका चंदौली से घर पहुंची तो यहां दरवाजे पर ताबूत में पति का पार्थिव शरीर रखा था। बाद में कुछ नेता भी घर पर आए थे। जमीन का पट्टा और पेट्रोल पंप दिलाने का भरोसा दिया गया था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका। राशन कार्ड तक नहीं बना है। पेंशन के पैसे से किसी तरह बेटे को पढ़ा लिखा रही हैं।
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शहीद की विधवा को पुलिस से भी नहीं मिल रही मदद
जौनपुर। शहीद की विधवा नरगिस बेगम अपने बेटे शादाब के साथ नरकटा गांव में दो कमरों के एक छोटे से मकान में रहती है। टीनशेड से बने मकान के ऊपर से पड़ोसियों ने जबरन बिजली की केबल खींच ली है। केबल को हटवाने के लिए वह थाने में प्रार्थना पत्र दीं तो रविवार को पतरही चौकी से सिपाही एखलाक अहमद मौका देखने पहुंचा। बकौल नरगिश सिपाही उन पर ही भड़क गया, जिससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंची। सिपाही इस बात से तमतमाया था कि वह चौकी पर न जाकर सीधे थाने चली गईं। जबकि नरगिश को यही पता था कि पुलिस से किसी प्रकार की मदद के लिए थाने ही जाना पड़ता है।
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शहीद शकील अहमद खान
जौनपुर। चंदवक थाना क्षेत्र के नरकटा गांव निवासी नरगिस बेगम के मुताबिक उनके पति शकील अहमद 1988 में सेना में भर्ती हुए थे। शादी के बाद 10 साल तक उनका साथ रहा। 12 साल की सर्विस पूरी हो गई थी। 19 सितंबर 2000 को श्रीनगर के उड़ी सेक्टर में आपरेशन रक्षक के दौरान तोप से दागे गए गोले से शहीद हो गए। शहीद होने से पहले उन्होंने तोप से दुश्मनों पर चार गोले बरसाए थे। श्रीनगर में ढाई साल से उनकी तैनाती थी। कारगिल की लड़ाई आपरेशन विजय में भी उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे। कारगिल की लड़ाई 26 जुलाई 1999 को खत्म होने के तकरीबन 14 माह बाद आपरेशन रक्षक के दौरान शहीद हो गए।