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कुछ भी कर लेंगे, लौटकर मुंबई नहीं जाएंगे
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कौशल राठौर
- फोटो : ORAI
मुहम्मदाबाद। सालों से जिस शहर को अपना समझकर रहते हुए, परिवार का पेट पाल रहे थे, मुसीबत पड़ी तो उसी शहर को छोड़कर एक तरह से भागना पड़ा। यह कहना है मुंबई से लौटे उन प्रवासी श्रमिकों का जो कुछ माह पहले तक मुंबई जैसे शहर में अपने परिवार का पेट पाल रहे थे। लॉकडाउन हुआ तो काम धंधा बंद हुआ, किसी को कुछ मदद मिली तो किसी की ओर से उनके मालिकों ने मुंह फेर लिया। फिर महामारी का खौफ ऐसा कि जान बचाने के लिए अपने गांव घर के लिए लौटना पड़ा। फिलहाल सभी प्रवासी गांव के ही एक स्कूल में क्वारंटीन है और अपनों के बीच पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन सभी का कहना है कि यहीं पर रहकर कुछ भी कर लेंगे लेकिन अब लौटकर मुंबई नहीं जाएंगे।
बेकरी में ताला पड़ा तो लौटना पड़ा
रसिक राठौर नासिक की एक बेकरी में काम करते थे। बताते हैं कि बेकरी से निकलने वाला माल उनके जैसे और कर्मचारियों के कारण शहर में हाथों हाथ लिया जाता था। लॉकडाउन में बेकरी पर ताला पड़ा तो पेट पालना भी मुश्किल हो गया। रोज खाने कमाने वाले थे, खर्च नहीं चल पा रहा था तो लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। अब वापस जाना बस की बात नहीं है।
वर्क टू होम से खत्म हुआ काम
मुंबई से ही लौटे कौशल राठौर बताते हैं कि वे एक कंपनी में चतुर्थ श्रेणी कर्मी थे। लॉकडाउन में वर्क टू होम हो गया तो उनका काम ही खत्म हो गया। जितने रुपये पैसे थे, जब तक चले वहां टिके रहे, फिर किसी ने साथ भी नहीं दिया तो बचे हुए रुपयों से घर लौटना ही मुनासिब समझा। अब पता नहीं कब कंपनी खुलेगी, काम मिलेगा भी कि नहीं। इसलिए अब लौटना ठीक भी नहीं होगा।
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दोबारा धंधा जमाना आसान नहीं है
गांव निवासी मुद्दीन ने बताया कि वह मुंबई में बड़ा पाव बेचते थे। रोज इतनी कमाई हो जाती थी कि परिवार का पेट पल जाता था। कुछ पैसे गांव भेजते थे। लॉकडाउन से ठेला भी हट गया। कमरे का किराया बढ़ रहा था और हाथ खाली थे। इसलिए घर वापसी का फैसला किया। अब दोबारा जाकर फिर से मुंबई जैसे शहर में धंधा जमाना आसान नहीं है। इसलिए यहीं कुछ करने की सोचेंगे।
देखेंगे किस्मत आगे कहां ले जाती है
मुंबई की ही एक फैक्टरी में काम करने वाले चांद बाबू का कहना है कि उनके जैसे न जाने कितने परदेसी साथ में काम करते थे। काम बंद होने के बाद भी कोई रकम हाथ नहीं आई। ऐसे में एक दूसरे की मदद से ही वे लोग बस, ट्रक, डीसीएम जो मिला, उसी से लौटने लगे। इतने साल मुंबई में रहने का क्या फायदा हुआ। बीमार पड़ जाते तो कोई देखने वाला भी नहीं होता, सो वापसी करना ही ठीक समझा। देखेंगे किस्मत आगे कहां ले जाती है।
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बेकरी में ताला पड़ा तो लौटना पड़ा
रसिक राठौर नासिक की एक बेकरी में काम करते थे। बताते हैं कि बेकरी से निकलने वाला माल उनके जैसे और कर्मचारियों के कारण शहर में हाथों हाथ लिया जाता था। लॉकडाउन में बेकरी पर ताला पड़ा तो पेट पालना भी मुश्किल हो गया। रोज खाने कमाने वाले थे, खर्च नहीं चल पा रहा था तो लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। अब वापस जाना बस की बात नहीं है।
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वर्क टू होम से खत्म हुआ काम
मुंबई से ही लौटे कौशल राठौर बताते हैं कि वे एक कंपनी में चतुर्थ श्रेणी कर्मी थे। लॉकडाउन में वर्क टू होम हो गया तो उनका काम ही खत्म हो गया। जितने रुपये पैसे थे, जब तक चले वहां टिके रहे, फिर किसी ने साथ भी नहीं दिया तो बचे हुए रुपयों से घर लौटना ही मुनासिब समझा। अब पता नहीं कब कंपनी खुलेगी, काम मिलेगा भी कि नहीं। इसलिए अब लौटना ठीक भी नहीं होगा।
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दोबारा धंधा जमाना आसान नहीं है
गांव निवासी मुद्दीन ने बताया कि वह मुंबई में बड़ा पाव बेचते थे। रोज इतनी कमाई हो जाती थी कि परिवार का पेट पल जाता था। कुछ पैसे गांव भेजते थे। लॉकडाउन से ठेला भी हट गया। कमरे का किराया बढ़ रहा था और हाथ खाली थे। इसलिए घर वापसी का फैसला किया। अब दोबारा जाकर फिर से मुंबई जैसे शहर में धंधा जमाना आसान नहीं है। इसलिए यहीं कुछ करने की सोचेंगे।
देखेंगे किस्मत आगे कहां ले जाती है
मुंबई की ही एक फैक्टरी में काम करने वाले चांद बाबू का कहना है कि उनके जैसे न जाने कितने परदेसी साथ में काम करते थे। काम बंद होने के बाद भी कोई रकम हाथ नहीं आई। ऐसे में एक दूसरे की मदद से ही वे लोग बस, ट्रक, डीसीएम जो मिला, उसी से लौटने लगे। इतने साल मुंबई में रहने का क्या फायदा हुआ। बीमार पड़ जाते तो कोई देखने वाला भी नहीं होता, सो वापसी करना ही ठीक समझा। देखेंगे किस्मत आगे कहां ले जाती है।

चांद बाबू- फोटो : ORAI

रसिक राठौर- फोटो : ORAI

मुद्दीन- फोटो : ORAI