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Jalaun News: टूरिस्ट बस के परमिट पर ले जा रहे फुटकर सवारियां
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फोटो - 14 कोंच बस स्टैंड पर खड़ी स्लीपर बसें। संवाद
उरई। ग्रेटर नोएडा में स्लीपर बस में आग लगने से नौ यात्रियों की मौत के बाद देशभर में निजी बसों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं। जिले में भी स्लीपर बसों के संचालन को लेकर बड़ा सवाल यह है कि जिनके पास टूरिस्ट या रिजर्व पार्टी परमिट है, वे आखिर किस अनुमति के तहत शहर से फुटकर सवारियां लेकर दूसरे राज्यों तक जा रही हैं।
जिले में 37 स्लीपर बसें पंजीकृत हैं और सभी टूरिस्ट परमिट पर हैं। इसके अलावा 50 से अधिक टूरिस्ट परमिट वाली बसें भी जिले से होकर गुजरती हैं। नियमों के अनुसार ऐसे परमिट पर फुटकर सवारियां ढोने की अनुमति नहीं है, फिर भी शहर के बीचों-बीच से इन बसों में सवारियां भरकर दिल्ली, आगरा, जयपुर, इंदौर समेत दूसरे शहरों के लिए भेजी जा रही हैं।
कोंच बस स्टैंड के सामने ट्रैवल एजेंटों ने कार्यालय खोल रखे हैं। यहीं से यात्रियों की बुकिंग की जाती है और बसों में फुटकर सवारियां बैठाई जाती हैं।
दरअसल, टूरिस्ट या रिजर्व पार्टी परमिट का उद्देश्य किसी निश्चित समूह को यात्रा पर ले जाना है। इसमें रास्ते से अलग-अलग जगहों से फुटकर सवारियां उठाकर ले जाने की अनुमति नहीं होती। नियमानुसार जिस स्थान से यात्रा शुरू होनी है, वहीं से सूची में शामिल यात्रियों को बस में बैठाया जाना चाहिए। इसके बावजूद जिले में टूरिस्ट परमिट वाली बसों में अलग-अलग स्थानों से यात्रियों को बैठाने और उन्हें टिकट के आधार पर दूसरे शहरों तक ले जाने के आरोप हैं। कागजों में यात्रियों की सूची तैयार कर लेने से बस संचालक जांच के समय नियमों का पालन दिखा देते हैं।
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फुटकर सवारी के लिए अलग व्यवस्था का दावा
जिन बसों के लिए निर्धारित अतिरिक्त भुगतान किया जाता है, उन्हें नियमों के तहत निर्धारित क्षमता के अनुसार सवारियां लेने की अनुमति मिलती है। इसके लिए करीब 90 हजार रुपये प्रतिमाह अतिरिक्त भुगतान करना होता है। सवाल यह है कि जिन बस संचालकों ने यह व्यवस्था नहीं अपनाई है, वे किस आधार पर फुटकर सवारियां भरकर ले जा रहे हैं।
क्षमता से अधिक सवारी, पार्सल भी चिंता का विषय
स्लीपर बसों में यात्रियों की क्षमता पहले से निर्धारित रहती है। बर्थ की संख्या, गलियारे की चौड़ाई, इमरजेंसी गेट और अग्निशमन व्यवस्था भी फिटनेस के दौरान देखी जाती है। इसके बावजूद क्षमता से अधिक सवारियां बैठाने और यात्रियों के साथ भारी पार्सल लादकर ले जाने के आरोप लगते रहे हैं। बस के अंदर बर्थ के नीचे, पीछे और अन्य स्थानों पर पार्सल रखे जाते हैं। यदि इनमें ज्वलनशील सामग्री या अन्य प्रतिबंधित सामान हो तो दुर्घटना की स्थिति में खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
जीएसटी को लेकर भी उठ रहे सवाल
टूरिस्ट परमिट वाली बसों में फुटकर टिकट और पार्सल कारोबार के आरोपों के बीच जीएसटी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि नियमित यात्री सेवा की तरह यात्रियों से किराया लिया जा रहा है और अलग-अलग स्थानों से बुकिंग हो रही है तो इस पूरे कारोबार की वित्तीय जांच भी जरूरी हो जाती है। जिले से इतने बड़े पैमाने पर बसों के संचालन के बावजूद जीएसटी विभाग की ओर से कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई है।
रात में बढ़ जाती है बसों की आवाजाही
इन बसों का बड़ा संचालन रात में होता है। रात के समय परिवहन विभाग की सड़क पर जांच अपेक्षाकृत कम होने का फायदा उठाकर बसों के संचालकों पर नियमों की अनदेखी करने के आरोप लगते रहे हैं। बसें शहर से निकलकर दूसरे प्रदेशों की ओर रवाना हो जाती हैं। रास्ते में सवारियां बैठाने से लेकर पार्सल चढ़ाने तक की शिकायतें भी सामने आती हैं।
चौकी-थानों के सामने से गुजरती हैं, फिर भी कार्रवाई नहीं
सबसे गंभीर सवाल यह है कि ये बसें किसी सुनसान रास्ते से नहीं, बल्कि शहर के प्रमुख मार्गों और बस स्टैंड के आसपास से होकर गुजरती हैं। कोंच बस स्टैंड के सामने से ही यात्रियों को बैठाकर बसें रवाना होती हैं। ऐसे में स्थानीय पुलिस और परिवहन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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वर्जन
बसों के परमिट की नियमित चेकिंग की जाती है। सितंबर में तीन दिन का विशेष अभियान चलाकर तीस से अधिक बसों पर परमिट शर्ताें का उल्लंघन करने पर कार्रवाई की गई है।
- आनंद कुरील, यात्री कर अधिकारी
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जिले में 37 स्लीपर बसें पंजीकृत हैं और सभी टूरिस्ट परमिट पर हैं। इसके अलावा 50 से अधिक टूरिस्ट परमिट वाली बसें भी जिले से होकर गुजरती हैं। नियमों के अनुसार ऐसे परमिट पर फुटकर सवारियां ढोने की अनुमति नहीं है, फिर भी शहर के बीचों-बीच से इन बसों में सवारियां भरकर दिल्ली, आगरा, जयपुर, इंदौर समेत दूसरे शहरों के लिए भेजी जा रही हैं।
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कोंच बस स्टैंड के सामने ट्रैवल एजेंटों ने कार्यालय खोल रखे हैं। यहीं से यात्रियों की बुकिंग की जाती है और बसों में फुटकर सवारियां बैठाई जाती हैं।
दरअसल, टूरिस्ट या रिजर्व पार्टी परमिट का उद्देश्य किसी निश्चित समूह को यात्रा पर ले जाना है। इसमें रास्ते से अलग-अलग जगहों से फुटकर सवारियां उठाकर ले जाने की अनुमति नहीं होती। नियमानुसार जिस स्थान से यात्रा शुरू होनी है, वहीं से सूची में शामिल यात्रियों को बस में बैठाया जाना चाहिए। इसके बावजूद जिले में टूरिस्ट परमिट वाली बसों में अलग-अलग स्थानों से यात्रियों को बैठाने और उन्हें टिकट के आधार पर दूसरे शहरों तक ले जाने के आरोप हैं। कागजों में यात्रियों की सूची तैयार कर लेने से बस संचालक जांच के समय नियमों का पालन दिखा देते हैं।
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फुटकर सवारी के लिए अलग व्यवस्था का दावा
जिन बसों के लिए निर्धारित अतिरिक्त भुगतान किया जाता है, उन्हें नियमों के तहत निर्धारित क्षमता के अनुसार सवारियां लेने की अनुमति मिलती है। इसके लिए करीब 90 हजार रुपये प्रतिमाह अतिरिक्त भुगतान करना होता है। सवाल यह है कि जिन बस संचालकों ने यह व्यवस्था नहीं अपनाई है, वे किस आधार पर फुटकर सवारियां भरकर ले जा रहे हैं।
क्षमता से अधिक सवारी, पार्सल भी चिंता का विषय
स्लीपर बसों में यात्रियों की क्षमता पहले से निर्धारित रहती है। बर्थ की संख्या, गलियारे की चौड़ाई, इमरजेंसी गेट और अग्निशमन व्यवस्था भी फिटनेस के दौरान देखी जाती है। इसके बावजूद क्षमता से अधिक सवारियां बैठाने और यात्रियों के साथ भारी पार्सल लादकर ले जाने के आरोप लगते रहे हैं। बस के अंदर बर्थ के नीचे, पीछे और अन्य स्थानों पर पार्सल रखे जाते हैं। यदि इनमें ज्वलनशील सामग्री या अन्य प्रतिबंधित सामान हो तो दुर्घटना की स्थिति में खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
जीएसटी को लेकर भी उठ रहे सवाल
टूरिस्ट परमिट वाली बसों में फुटकर टिकट और पार्सल कारोबार के आरोपों के बीच जीएसटी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि नियमित यात्री सेवा की तरह यात्रियों से किराया लिया जा रहा है और अलग-अलग स्थानों से बुकिंग हो रही है तो इस पूरे कारोबार की वित्तीय जांच भी जरूरी हो जाती है। जिले से इतने बड़े पैमाने पर बसों के संचालन के बावजूद जीएसटी विभाग की ओर से कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई है।
रात में बढ़ जाती है बसों की आवाजाही
इन बसों का बड़ा संचालन रात में होता है। रात के समय परिवहन विभाग की सड़क पर जांच अपेक्षाकृत कम होने का फायदा उठाकर बसों के संचालकों पर नियमों की अनदेखी करने के आरोप लगते रहे हैं। बसें शहर से निकलकर दूसरे प्रदेशों की ओर रवाना हो जाती हैं। रास्ते में सवारियां बैठाने से लेकर पार्सल चढ़ाने तक की शिकायतें भी सामने आती हैं।
चौकी-थानों के सामने से गुजरती हैं, फिर भी कार्रवाई नहीं
सबसे गंभीर सवाल यह है कि ये बसें किसी सुनसान रास्ते से नहीं, बल्कि शहर के प्रमुख मार्गों और बस स्टैंड के आसपास से होकर गुजरती हैं। कोंच बस स्टैंड के सामने से ही यात्रियों को बैठाकर बसें रवाना होती हैं। ऐसे में स्थानीय पुलिस और परिवहन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
वर्जन
बसों के परमिट की नियमित चेकिंग की जाती है। सितंबर में तीन दिन का विशेष अभियान चलाकर तीस से अधिक बसों पर परमिट शर्ताें का उल्लंघन करने पर कार्रवाई की गई है।
- आनंद कुरील, यात्री कर अधिकारी