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Jalaun News: पारंपरिक फाग गीत गायब, डीजे की धुन पर बज रहे फूहड़ गाने

Tue, 11 Mar 2025 12:26 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन
संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन Updated Tue, 11 Mar 2025 12:26 AM IST
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Traditional phaag songs are missing, vulgar songs are being played on the tune of DJ
मुहम्मदाबाद। फाल्गुन माह आते ही बुंदेलखंड में फाग के गीतों की धुन गांवों में सुनाई देने लगती थी। अब यह गीत विलुप्त हो गए हैं। होली में पांच दिन शेष हैं, लेकिन कहीं भी फाग के पारंपरिक गीत सुनाई नहीं दे रहे हैं। डीजे की धुन पर हिंदी फिल्मों के फूहड़ गीत जरूर बजते रहते हैं। ऐसे गीत दिल को सुकून कम, धड़कनें जरूर बढ़ा देते हैं।
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बुंदेलखंड क्षेत्र के गांवों में समय के साथ पारंपरिक फाग गीतों की आवाज विलुप्त होती जा रही है। हालांकि, जिले के गांवों में कुछ बुजुर्ग कहीं-कहीं इस परंपरा को जीवित करने की कवायद में लगे हैं। 1960-70 के दशक में फाल्गुन मास आते ही जगह-जगह फाग गीतों के सुर और ढोल-मजीरों की थाप व झंकार सुनाई देने लगती थी। लोग सुनने के लिए घरों से निकल पड़ते थे।
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बुजुर्ग बताते हैं कि एक साथ बैठकर पारंपरिक फाग गीतों का आनंद लिया जाता था। अब गांव में न वह टोली दिखती है, न वह पारंपरिक गीत गाने वाले। यह परंपरा लुप्त होने के कगार पर है। ग्रामीण हरिश्चंद्र, भानु अहिरवार भोला, नवल किशोर आदि ने बताया कि फाल्गुन माह आते ही गांवों में कई स्थानों पर फाग गीत गाने वालों की महफिलें सज जाती थीं। वक्त के साथ-साथ सब कुछ बदल गया है। अब आधुनिकता की चकाचौंध में फाग गायकी की परंपरा गायब हो गई है।
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मुहम्मदाबाद निवासी लल्लूराम चौधरी कहते हैं कि जब मेरी उम्र 20 वर्ष की थी तब गांव में सुबह से ही फाग के गीत गाने के लिए मंडली जम जाती थी। लोग देर रात तक इसका आनंद लेते थे। अब डीजे आने से यह सब खत्म हो गया है। कुसमिलिया गांव निवासी हरी सिंह राजपूत कहते हैं कि पहले युवाओं में भी बुंदेली गीतों को सीखने की ललक रहती थी। वह अपने परिजनों के साथ फाग गाने और सुनने बैठते थे और सीखने का प्रयास करते थे। अब युवा इस परंपरा से दूर चले गए हैं।
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