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अपनों से दूर फिर भी मरीजों की सेवा भरपूर

Fri, 10 Apr 2020 10:51 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 10 Apr 2020 10:51 PM IST
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Still serving the patients far from their loved ones
अशोक - फोटो : ORAI
कदौरा। जमाती शब्द सुनकर ही आजकल लोग सहम जाते हैं, फिर एक पल सोचें कि वे जमाती जिन्हें क्वारंटीन किया जा रहा है, उनके बीच जाकर इलाज करना कितना कठिन होगा। इस कठिन काम को अंजाम देने वाले डॉक्टरों को ही कोरोना योद्धा कहा जा रहा है। अपनी जान को भी खतरे में डालकर गुलौली मस्जिद में क्वारंटीन 14 जमाती समेत क्षेत्र के 40 क्वारंटीन सेंटरों में लोगों का इलाज करने वाले इन डॉक्टरों की मानें तो घंटों ड्यूटी के बाद भी करीब 20 दिन से अपनों को देखा नहीं है। सिर्फ मोबाइल ही उन्हें देखने और उनसे बातें करने का सहारा है। ड्यूटी के वक्त डर भी लगता है और गर्व भी होता है कि इस कठिन समय में वे उस शपथ को बखूबी पूरा कर रहे हैं, जो उन्होंने डिग्री हासिल करते वक्त ली थी। प्रस्तुत है, उन्हीं डॉक्टरों से बातचीत पर आधारित खबर-
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बेटा, पूछता है डैडी घर क्यों नहीं आ रहे हो
सीएचसी के चिकित्साधिकारी डॉ अशोक कुमार ने बताया कि परिवार कानपुर में रहता है। घर पर पत्नी साधना और पांच साल का बेटा अर्नव व डेढ़ माह की बच्ची है। सबसे फोन पर बात और वीडियो कालिंग हो रही है। बच्चों को गोद में लेने का मन तो बहुत करता है पर ड्यूटी का ख्याल आते ही फिर से सिर्फ मरीज और मरीज ही आंखों के सामने घूमने लगते हैं। पत्नी लगातार सावधानी के साथ काम करने की प्रेरणा बनी हुई है। बेटा जरूर पूछता है कि डैडी घर क्यों नहीं आ रहे हो तो एक पल को सब ठहर जाता है और फिर उसे समझाता हूं कि बस डैडी का थोड़ा काम और बचा है, जल्द ही आपके लिए ढेर सारी चाकलेट लेकर लौटूंगा। मासूम तो बहल जाता है लेकिन पत्नी की आंखों का इंतजार साफ दिखाई देता है।
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अस्पताल ही बना घर, परिजनों से मिलता हौसला
सीएचसी में कार्यरत डॉक्टर रश्मि त्रिपाठी ने बताया कि परिवार बांदा में रहता है पर जब से लॉकडाउन हुआ है, तब से वह घर नहीं गई है। आधे से ज्यादा दिन अस्पताल, क्वारंटीन सेंटरों में लोगों की देखभाल में निकल जाता है, फिर थककर अस्पताल के पास बने क्वार्टर में जाती हैं। कमरे में पहुंचते ही अपनों की याद सताने लगती है। घर पर पापा-मम्मी के अलावा एक भाई और बहन है, जो दिल्ली में हैं। सभी को उसकी हर पल फिक्र लगी रहती है। फिर भी सब उसका हौसला बढ़ाते हैं। पापा मम्मी कहते हैं कि बेटी तू देश के लिए बीमारी से लड़ रही है, हारना नहीं बल्कि साबित कर देना कि डॉक्टर को धरती का भगवान यूं ही नहीं कहा जाता है। बस, इन्हीं बातों से इस जंग को जीतने का हौसला कायम है।
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डर तो लगता है, पर सेवा से अधिक कुछ नहीं
क्वारंटीन सेंटरों में लोगों की देखभाल के लिए बनी रैपिड रेस्पांस टीम के सदस्य डॉ अजय शर्मा बताते हैं कि कई बार इन सेंटरों में जाने पर डर तो लगता है क्योंकि स्वास्थ्य परीक्षण के वक्त लोगों के काफी करीब जाना पड़ता है, पर ड्यूटी से ज्यादा तो कुछ और हो नहीं सकता है, यही सोचकर सावधानी बरतते हुए इलाज में जुटे रहते हैं। परिवार उरई में ही रहता है। ज्यादा याद आती है तो घर के बाहर गेट से ही पत्नी अंजना और बच्चों आरुषी (7) और अंजय (4) से बात कर लौट आता हूं। यह तो अच्छा है कि पत्नी भी डॉक्टर है, वह सब समझती है और बच्चों को भी अच्छे से समझा देती है। फोन पर कहती है कि यही वक्त है अपनी ड्यूटी पूरी करें, परिवार को वह पूरी जिम्मेदारी से संभाल रही हैं।

रश्मि

रश्मि- फोटो : ORAI

अजय

अजय- फोटो : ORAI

कदौरा के गुलौली गां वे मजरा बगिया में स्थित मस्जिद के अंदर बने क्वॉरेंटाइन सेंटर बैठे लोग

कदौरा के गुलौली गां वे मजरा बगिया में स्थित मस्जिद के अंदर बने क्वॉरेंटाइन सेंटर बैठे लोग- फोटो : ORAI

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