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लंबा रहा है बसपा में खाबरी का सफर
अमर उजाला ब्यूरो, उरई
Updated Mon, 10 Oct 2016 11:28 PM IST
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ब्रजलाल खाबरी
- फोटो : अमर उजाला
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एक समय बसपा के बुंदेलखंड में कर्ताधर्ता रहे ब्रजलाल खाबरी के कांग्रेस में जाने से बसपा को तगड़ा झटका लगा है। उनका इस पार्टी में राजनीतिक सफर करीब 20 साल का रहा।
बताते चलें कि 1996 में मायावती ने पार्टी की सारी कार्यकारी शक्तियां कांशीराम से अपने हाथों में लेनी शुरू कर दी। इसके बाद उन्होंने कांशीराम के सहयोगी रहे डॉ. रामाधीन को बाहर
का रास्ता दिखा दिया व उनके सहयोगी रहे बृजलाल खाबरी को जालौन में संगठन का जिलाध्यक्ष बना दिया। इस तरह बृजलाल खाबरी उस वक्त जिले में बसपा के प्रमुख कर्ताधर्ता बन गए। खाबरी ने अपनी मेहनत से धीरे धीरे पूरे बुंदेलखंड में धाक जमा ली और यहां के कोआर्डिनेटर बने। उनके कहने से पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीराम पाल, अकबर अली जैसे दिग्गजों को
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पार्टी से बाहर कर रास्ता दिखा दिया गया। मिशनरी दलित नेता व चुनाव में पार्टी की पहली बोहनी कराने वाले चैनसुख भारती का भी टिकट काट दिया गया। इसके बाद खाबरी का कद बढ़ता गया ओर उनकी बदौलत 1999 के लोकसभा चुनाव में मायावती को जालौन संसदीय सीट पहली बार मिल सकी। मायावती ने उन्हें दूसरे कई राज्यों में पार्टी का प्रभारी बनाया।
उन्हें पार्टी में दूसरे नंबर का नेता माना जाने लगा। 2007 में मायावती और उनके बीच थोड़ी खटास पैदा हो गई। इसके बाद मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर ही नही कर दिया बल्कि यह तक घोषणा कर दी कि अगर वे नाक भी रगड़ेंगे तो उन्हें दोबारा पार्टी में शामिल नही किया जाएगा। 2009 के लोकसभा चुनाव में उनके विकल्प के रूप में लाए गए तिलक चंद्र
अहिरवार की असफलता के बाद मायावती ने एक बार फिर उन्हें अपना लिया। यही नहीं उन्हें पूरे 6 वर्ष के लिए राज्यसभा सांसद भी बनवाया। 2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की सत्ता से बेदखली के बाद भी खाबरी की जालौन जिले के मामले में पार्टी के अंदर चलती रही लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में वे भी पराजित हो गए।
इसके बाद से मायावती के यहां उनकी उल्टी गिनती शुरू हो गई। इसके बाद उन्हें बसपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर झारखंड भेज दिया गया। वहां ये पार्टी संगठन की गतिविधियां चला रहे थे।
कांग्रेस को मिलेगी नई जान
कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी ने कहा कि दलित वोट शुरू से ही कांग्रेस का रहा है। जगजीवन राम के बाद यह थोड़ा कमजोर हुआ। पर अब बृजलाल खाबरी जैसे कद्दावर नेता के पार्टी में आने से एक बार फिर पिछड़े लोगाें की कांग्रेस में वापसी हो सकेगी। यह पार्टी के लिए अच्छा होगा।
अब पुरानी बसपा नहीं रही- खाबरी
अमर उजाला को खाबरी ने बताया कि बसपा अब पुरानी बसपा नहीं रह गई है। एक समय था जब पार्टी में बाबा साहब अंबेडकर व कांशीराम जी का मिशन चरम पर था। कांशीराम जी के समय संगठन को मजबूत किया गया। अब पार्टी मिशन से भटक गई है। कांशीराम चाहते थे कि दलित लोगों को समानता का दर्जा मिले। वर्तमान में उन्हें यह दर्जा नहीं मिल
पा रहा था। वे लोग जो कल तक बीएसपी को गाली देते थे वे अब पहली लाइन में बैठे हैं। ऐसे में जिन वोटरों के आधार पर चार बार सरकार बनाए हैं वो मतदाता अब दुविधा में हैं। बाकी सब जानते हैं। सीट वही लड़ पाएगा जिसके पास व्यवस्थाएं हों। ऐसे में कई बार प्रयास किया लेकिन स्थिति नहीं सुधर पाई। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों में एक घुटन सी
महसूस हो रही थी जिससे निजात पाने के लिए आखिरकार पार्टी को छोड़ना ही बेहतर समझा। यह पूछे जाने पर कि कांग्रेस में आप क्या जिम्मेदारी उठाएंगे, उन्हाेंने कहा कि बसपा में मैने संगठन को मजबूत करने का काम किया, पिछड़ों को आगे लाने का काम किया, कांग्रेस में भी यही करूंगा। उन्होंने पिछड़े वर्ग के अधिकार के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही।
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बताते चलें कि 1996 में मायावती ने पार्टी की सारी कार्यकारी शक्तियां कांशीराम से अपने हाथों में लेनी शुरू कर दी। इसके बाद उन्होंने कांशीराम के सहयोगी रहे डॉ. रामाधीन को बाहर
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का रास्ता दिखा दिया व उनके सहयोगी रहे बृजलाल खाबरी को जालौन में संगठन का जिलाध्यक्ष बना दिया। इस तरह बृजलाल खाबरी उस वक्त जिले में बसपा के प्रमुख कर्ताधर्ता बन गए। खाबरी ने अपनी मेहनत से धीरे धीरे पूरे बुंदेलखंड में धाक जमा ली और यहां के कोआर्डिनेटर बने। उनके कहने से पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीराम पाल, अकबर अली जैसे दिग्गजों को
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पार्टी से बाहर कर रास्ता दिखा दिया गया। मिशनरी दलित नेता व चुनाव में पार्टी की पहली बोहनी कराने वाले चैनसुख भारती का भी टिकट काट दिया गया। इसके बाद खाबरी का कद बढ़ता गया ओर उनकी बदौलत 1999 के लोकसभा चुनाव में मायावती को जालौन संसदीय सीट पहली बार मिल सकी। मायावती ने उन्हें दूसरे कई राज्यों में पार्टी का प्रभारी बनाया।
उन्हें पार्टी में दूसरे नंबर का नेता माना जाने लगा। 2007 में मायावती और उनके बीच थोड़ी खटास पैदा हो गई। इसके बाद मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर ही नही कर दिया बल्कि यह तक घोषणा कर दी कि अगर वे नाक भी रगड़ेंगे तो उन्हें दोबारा पार्टी में शामिल नही किया जाएगा। 2009 के लोकसभा चुनाव में उनके विकल्प के रूप में लाए गए तिलक चंद्र
अहिरवार की असफलता के बाद मायावती ने एक बार फिर उन्हें अपना लिया। यही नहीं उन्हें पूरे 6 वर्ष के लिए राज्यसभा सांसद भी बनवाया। 2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की सत्ता से बेदखली के बाद भी खाबरी की जालौन जिले के मामले में पार्टी के अंदर चलती रही लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में वे भी पराजित हो गए।
इसके बाद से मायावती के यहां उनकी उल्टी गिनती शुरू हो गई। इसके बाद उन्हें बसपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर झारखंड भेज दिया गया। वहां ये पार्टी संगठन की गतिविधियां चला रहे थे।
कांग्रेस को मिलेगी नई जान
कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी ने कहा कि दलित वोट शुरू से ही कांग्रेस का रहा है। जगजीवन राम के बाद यह थोड़ा कमजोर हुआ। पर अब बृजलाल खाबरी जैसे कद्दावर नेता के पार्टी में आने से एक बार फिर पिछड़े लोगाें की कांग्रेस में वापसी हो सकेगी। यह पार्टी के लिए अच्छा होगा।
अब पुरानी बसपा नहीं रही- खाबरी
अमर उजाला को खाबरी ने बताया कि बसपा अब पुरानी बसपा नहीं रह गई है। एक समय था जब पार्टी में बाबा साहब अंबेडकर व कांशीराम जी का मिशन चरम पर था। कांशीराम जी के समय संगठन को मजबूत किया गया। अब पार्टी मिशन से भटक गई है। कांशीराम चाहते थे कि दलित लोगों को समानता का दर्जा मिले। वर्तमान में उन्हें यह दर्जा नहीं मिल
पा रहा था। वे लोग जो कल तक बीएसपी को गाली देते थे वे अब पहली लाइन में बैठे हैं। ऐसे में जिन वोटरों के आधार पर चार बार सरकार बनाए हैं वो मतदाता अब दुविधा में हैं। बाकी सब जानते हैं। सीट वही लड़ पाएगा जिसके पास व्यवस्थाएं हों। ऐसे में कई बार प्रयास किया लेकिन स्थिति नहीं सुधर पाई। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों में एक घुटन सी
महसूस हो रही थी जिससे निजात पाने के लिए आखिरकार पार्टी को छोड़ना ही बेहतर समझा। यह पूछे जाने पर कि कांग्रेस में आप क्या जिम्मेदारी उठाएंगे, उन्हाेंने कहा कि बसपा में मैने संगठन को मजबूत करने का काम किया, पिछड़ों को आगे लाने का काम किया, कांग्रेस में भी यही करूंगा। उन्होंने पिछड़े वर्ग के अधिकार के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही।