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अल्लाह की इबादत दिलाती है जहन्नुम से आजादी
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जालौन। मुकद्दस रमजान माह का तीसरा अशरा शुरू हो चुका है। इस महीने के तीसरे अशरे में अल्लाह की इबादत करने से जहन्नुम से आजादी मिलती है। यह असरा जो ईद का चांद दिखाई देने तक जारी रहेगा। यह बात सुब्हानी जामा मस्जिद के इमाम मौलाना शहाबुद्दीन और मौलाना साकिब ने संयुक्त रूप से कही।
सुब्हानी जामा मस्जिद के इमाम मौलाना शहाबुद्दीन ने बताया कि मुकद्दस रमजान माह को 10-10 दिनों के तीन अशरों में बांटा गया है। प्रत्येक अशरे में अल्लाह की इबादत करने का महत्व है। 20वें रोजे में मगरिब के बाद से ईद का चांद दिखाई देने तक तीसरा असरा रहता है।
तीसरे असरे में खासतौर पर एतकाफ (एकांत में रहकर अल्लाह की इबादत करना) का महत्व है। अल्लाह ने फरमाया है कि एतकाफ में बैठने वाले मोमिन बंदे के तमाम गुनाह बख्श दिए जाएंगे। कहा कि जिस बस्ती की मस्जिद में कोई शख्स एतकाफ में बैठकर अल्लाह की इबादत करे तो उस बस्ती के लोगों के गुनाहों को भी माफ कर दिया जाता है और पूरी बस्ती में अल्लाह की रहमत बरसती है।
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हालांकि इस समय कोरोना कर्फ्यू चल रहा है। ऐसे में मस्जिदों में एतकाफ में बैठना मुश्किल है। लेकिन यह फर्ज नहीं है इसलिए इसे आगे भी किया जा सकता है। जब तक हालात सही न हों तब तक घरों पर ही रहकर इबादत करें।
मौलाना साकिब ने बताया कि रमजान माह के आखिरी अशरे में शब-ए-कद्र (रहमतों वाली रात) भी आती है। उन्होंने बताया कि रमजान माह के आखिरी अशरे में पांच ताक रातों 21, 23, 25, 27 या 29वीं रात में किसी एक रात को शब ए कद्र आती हैं। शब ए कद्र अल्लाह से सीधा नाता जोड़ने का जरिया है। इन रातों की कद्र करते हुए रात भर इबादत करनी चाहिए।
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सुब्हानी जामा मस्जिद के इमाम मौलाना शहाबुद्दीन ने बताया कि मुकद्दस रमजान माह को 10-10 दिनों के तीन अशरों में बांटा गया है। प्रत्येक अशरे में अल्लाह की इबादत करने का महत्व है। 20वें रोजे में मगरिब के बाद से ईद का चांद दिखाई देने तक तीसरा असरा रहता है।
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तीसरे असरे में खासतौर पर एतकाफ (एकांत में रहकर अल्लाह की इबादत करना) का महत्व है। अल्लाह ने फरमाया है कि एतकाफ में बैठने वाले मोमिन बंदे के तमाम गुनाह बख्श दिए जाएंगे। कहा कि जिस बस्ती की मस्जिद में कोई शख्स एतकाफ में बैठकर अल्लाह की इबादत करे तो उस बस्ती के लोगों के गुनाहों को भी माफ कर दिया जाता है और पूरी बस्ती में अल्लाह की रहमत बरसती है।
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हालांकि इस समय कोरोना कर्फ्यू चल रहा है। ऐसे में मस्जिदों में एतकाफ में बैठना मुश्किल है। लेकिन यह फर्ज नहीं है इसलिए इसे आगे भी किया जा सकता है। जब तक हालात सही न हों तब तक घरों पर ही रहकर इबादत करें।
मौलाना साकिब ने बताया कि रमजान माह के आखिरी अशरे में शब-ए-कद्र (रहमतों वाली रात) भी आती है। उन्होंने बताया कि रमजान माह के आखिरी अशरे में पांच ताक रातों 21, 23, 25, 27 या 29वीं रात में किसी एक रात को शब ए कद्र आती हैं। शब ए कद्र अल्लाह से सीधा नाता जोड़ने का जरिया है। इन रातों की कद्र करते हुए रात भर इबादत करनी चाहिए।