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Jalaun News: गांव से शहर आते ही पंद्रह से बीस रुपये महंगा हो जाता दूध

Mon, 05 May 2025 12:36 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन
संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन Updated Mon, 05 May 2025 12:36 AM IST
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Milk becomes costlier by fifteen to twenty rupees as soon as one comes to the city from the village
उरई/कोंच। दुग्ध सहकारी संघ का झांसी में विलय होने के बाद जिले में दूध की कीमतों में इजाफा हुआ है। हालत यह है कि गांव से शहर आते ही दूध की कीमत में पंद्रह से लेकर बीस रुपये लीटर तक इजाफा हो जाता है। अमूल की कीमतों में भी दो रुपये इजाफा होने से कीमत 70 रुपये लीटर तक पहुंच गई है।
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लोगों का कहना है कि इतना रुपये खर्च करने के बाद भी शुद्धता की कोई गारंटी नहीं है। दूध की बड़ी कीमतों ने लोगों का बजट बिगाड़ दिया है। गांव में दूध की कीमत 45 से 55 रुपये प्रति लीटर है। जबकि दूध शहर आते ही 65 से 70 रुपये प्रति लीटर हो जाता है। गांव में भैंस का दूध 45 से 55 रुपये तक बिक रहा है। जबकि शहर में 65 से 70 रुपये तक बिक रहा है। जबकि गाय का दूध गांव में 35 से 40 रुपये और शहर में 50 से 60 रुपये तक बिक रहा है।
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शहर में खड़े होकर दोहनी कराने पर भैंस का दूध 70 से 80 रुपये बिक रहा है। जबकि गाय का दूध 55 से 60 रुपये प्रतिलीटर बिक रहा है। लगातार दूध के दामों में बढ़ रही कीमतों के चलते काफी लोग आसपास के गांव में खुद दूध लेने जाते हैं। अपने नजर के सामने दोहनी कराने के साथ साथ दामों में भी बदलाव देखने को मिलता है। लोगों का कहना है कि गांव से लेने पर उन्हें शुद्धता की गारंटी बनी रहती है।
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पराग का विलय होने से दामों में अचानक बढ़ोतरी
उरई। शहर के चुर्खी रोड पर बने जालौन दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड की शुरूआत 1973 में हुई थी। तब यहां करीब एक हजार लीटर दूध आता था। लेकिन जब विभागीय अधिकारियों कर्मचारियों ने गांव गांव जाकर सोसाइटियों की स्थापना करवाई तो यह आंकड़ा बढ़कर बीस हजार लीटर तक पहुंच गया। वर्ष 1995 से लेकर 2010 तक यहां करीब साठ कर्मचारी काम करते थे, जबकि डेढ़ सौ सोसाइटी थीं। जिसमें किसानों का दूध एकत्रित होकर यहां पहुंचता था। यहां पर दूध के अलावा, पनीर, धी, सहित अन्य उत्पाद बनाए जाते थें, जिनकी उस समय खासी डिमांड थी। लोगों का कहना है कि स्थानीय दूध की खपत जिले में ही होने से यहां दामों में बढ़ोत्तरी नहीं होती थी। लेकिन अचानक झांसी में विलय होने से व्यापारी वर्ग ने इसको अपने हाथों में ले लिया और प्राइवेट लोगों ने इस को अपना व्यवसाय बना लिया। वह दूधियों के माध्यम दूध को एकत्रित करके उसे कम दामों में खरीद कर शहर व अन्य जगहों पर भेजकर मोटा मुनाफा कमाते हैं।



किसानों का घाटा, व्यापारी कमा रहे मुनाफा
राजकुमार पटेल का कहना है कि पहले किसान इससे फायदा कमा लेते थे। लेकिन अब इसका पूरा लाभ व्यापारी ले रहे हैं। वह गांवों से दूध को एकत्रित कर बाहर भेजकर हजारों रुपये कमां रहे हैं। पूरी तरह से से व्यापारियों ने अपना लिया है।




महंगाई के चलते ज्यादा जानवर भी नहीं पालते किसान
आनंद सेठ का कहना है कि दुधारू जानवरों में भी मंहगाई हो रही है। जो भैंस पहले तीस हजार की आती थी। वह अब 80 हजार तक आती है। इसके साथ भी भूसा चोकर आदि में मंहगाई होेने के चलते अब किसानों को उतना फायदा नहीं हो पाता है। इससे अब जानवर भी कम ही पाले जा रहे हैं।
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