आटा। दीपावली में पटाखों और प्लास्टर आप पेरिस से तैयार मूर्तियां की वजह से प्रदूषण बढ़ता है। इसको देखते हुए दीपावली पर्व को इको फ्रेंडली बनाने के लिए समूह की महिलाओं ने तैयारी शुरू कर दी हैं। हर बार की तरह इस बार भी समूह की महिलाओं के हाथों से बने गोबर के गणेश-लक्ष्मी जल्द ही बाजरों में दिखाई देंगे। सिर्फ गणेश लक्ष्मी ही नहीं बल्कि दीपावली की रात को जगमगाने के लिए दिए भी तैयार किए जा रहे हैं। समूह से जुड़ी विनीता पांडे ने बताया कि गोबर के गणेश-लक्ष्मी की विशेषता यह भी है कि पूजा के बाद उन्हें घर के किसी गमले में विसर्जित किया जा सकता है। इसके बाद गमले में तुलसी व गिलोय का पौधा भी निकलेगा।
बता दें कि गाय के गोबर से गणेश-लक्ष्मी की छोटी बड़ी मूर्तियां बनाकर दीपावली में उनकी पूजा अर्चना के बढ़ते रुझान को देखते हुए ही समूह की महिलाओं ने इसे अपना हुनर बनाया है। जिसके चलते दीपोत्सव पर गोबर से बनी मूर्तियां बाजारों में उपलब्ध होगी। गोबर से बनी मूर्तियों पर इतने आकर्षक रंग चढ़ाए जाते है, जिससे देखने में वे कीमती मूर्तियां सी लगती हैं। माना जाता है कि गोबर की मूर्तियों से प्रदूषण भी नहीं होता है, आमतौर पर मिट्टी व प्लास्टर आप पेरिस से तैयार मूर्तियां नदियों में विसर्जित किए जाने से प्रदूषण बढ़ता है। विनीता ने बताया कि गोबर के गणेश लक्ष्मी तैयार करने से गांव की महिलाओं को रोजगार का अवसर भी मिला है। महिलाओं को बाकायदा मूर्तियां बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। गोशाला में ही मशीन लगाकर गोबर से मूर्तियां बनाने का काम शुरू किया गया है। करीब 200 महिलाओं को मूर्तियां बनाने का रोजगार दिया जा रहा है। यहां से तैयार मूर्तियां दिल्ली, नोएडा, इंदौर, सागर व लखनऊ तक आर्डर पर जाएगी। समूह की महिलाओं सुनीता सुमन, रंजना, मांडवी आदि ने बताया कि वे लोग मूर्तियां बनाकर लगभग सात-आठ हजार तक रुपये कमा लेती हैं।