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बिना ट्रैफिक नियमों के बन रहा हादसों का शहर
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उरई। प्रदेश सरकार ने भले ही यातायात नियमों के पालन के लिए जुर्माने की राशि बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि सड़कों हादसों की संख्या में कमी आ सके लेकिन यहां तो मामला ही कुछ और है। हेलमेट और सीट बेल्ट के चालान की कौन कहे आटो हो या ई-रिक्शा या फिर ट्रक या टेंपो सभी ओवरलोड चलते है। चालान के लिए भी पुलिस और प्रशासन का पूरा जोर सिर्फ ओवरलोड मौरंग तक ही सीमित रह गया है।
जिले में हेलमेट और सीट बेल्ट का हाल तो यह है कि पुलिस के सिपाही हो या किसी अधिकारी की गाड़ी के चालक हेलमेट और सीट बेल्ट को किनारे ही रखकर चलते हैं। आलम यह है कि मानो दीवारों पर लिखा हो कि हेलमेट लगाना मना है। इन सबके पीछे कहीं न कहीं पुलिस की भी कमी है क्योंकि हेलमेट और सीट बेल्ट के चालान काफी कम होते है। जिस कारण किसी भी चौराहे, बाजार अथवा हाईवे पर बाइक पर दो-तीन नहीं कहीं कहीं तो चार और पांच लोग तक सवार दिख जाएंगे।
कोई कान में ईयर फोन लगाए तो कोई बाइक चलाते वक्त ही मोबाइल देखने में मशगूल दिखता है। यही वजह है कि सड़क हादसों में होने वाली नब्बे फीसदी मौतों का कारण हेलमेट न लगाना ही होता है। लोगों का मानना है कि आज के दौर में कोई नियम मानने को तैयार नहीं है, नियम मनवाने के लिए पुलिस को ही सड़क पर उतरकर अभियान चलाना पड़ेगा और वाहन सवारों को बताना पड़ेगा कि सुरक्षा उनकी ही जिंदगी के लिए जरूरी है।
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शिक्षिका सरोज अग्रवाल का कहना है कि पुलिस को चाहिए कि जगह-जगह कैंप लगाकर लोगों को यातायात के नियम बताए और चालान के अभियान पर सख्ती की जाए, किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश भी न सुनी जाए। जावेद अख्तर के मुताबिक पिछले दस सालों में शहर की आबादी के हिसाब से वाहन भी बढ़े हैं, लिहाजा पालिका को अच्छी और सुरक्षित यातायात व्यवस्था के लिए संसाधनों सिग्नल, स्पीड ब्रेकर, डिवाइडर बढ़ाने के साथ अतिक्रमण भी हटाना होगा।
सीओ सिटी संतोष कुमार ने कहा कि समय समय पर हेलमेट चेकिंग का अभियान चलता है। जल्द ही इसे और भी सख्ती से चलाया जाएगा, इस बार बढ़ा जुर्माना भी वसूला जाएगा, जिससे नियमों के प्रति जागरुकता जरूर बढ़ेगी। नगर पालिका के ईओ संजय कुमार ने कहा कि शहर में स्पीड ब्रेकर और डिवाइडर के अलावा यातायात से संबंधित अन्य संसाधनों की आवश्यकता है। इसके लिए जल्द ही पुलिस और पालिका अधिकारियों के साथ बैठक कर रणनीति बनाई जाएगी।
36 दिन में हुए 184 सड़क हादसे
यूपी 100 प्रभारी सौरभ सिंह की मानें तो 1 मई से लेकर 7 जून के मध्य ही पूरे जनपद में करीब 184 सड़क हादसे हुए हैं। जिनमें 100 से अधिक गंभीर थे। जिसमें 40 फीसदी से अधिक लोगों ने जान भी गंवाई। जान गंवाने वालों में हेलमेट न होना ही प्रमुख कारण रहा है।
डेढ़ साल पहले चला था अभियान
प्रदेश सरकार बनने के बाद डेढ़ साल पूर्व पहली बार जिले में हेलमेट का अभियान जोरों पर चला था। पुलिस ने चौराहों और हाईवे पर जबरदस्त चेकिंग अभियान चलाया था। इतना ही नहीं शहर के पेट्रोल पंपों को भी निर्देश दिए गए थे कि बिना हेलमेट और सीट बेल्ट के किसी भी दोपहिया और चौपहिया वाहन सवार को ईंधन उपलब्ध न कराए लेकिन कुछ समय बाद ही अभियान ठंडा पड़ गया और जिन्होंने हेलमेट उठाया भी था तो उसे किनारे रख दिया।
न डिवाइडर और न स्पीड ब्रेकर
सिर्फ शहर की ही बात की जाए तो एक माहिल तालाब के पास ही बात छोड़ दें तो कहीं पर न डिवाइडर ही नजर आते हैं और न ही स्पीड ब्रेकर। माहिल तालाब के डिवाइडर काफी पुराने हो गए हैं और किनारे की सड़कें अतिक्रमण के चलते इतनी सिकुड़ गई है कि डिवाइडर सुविधा कम असुविधा अधिक दे रहे हैं। रही बात ट्रैफिक सिग्नल की तो एक मात्र भगत सिंह चौराहे को छोड़ दे तो कहीं पर ट्रैफिक बूथ भी नहीं नजर आता है। इस कारण भी वाहन सवारों की रफ्तार निरंकुश होती जा रही है।
हेलमेट न होने से सिपाही ने गंवाई थी जान
हेलमेट जिले में कितना प्रभावशाली है, इसकी बानगी अभी 21 मई को उरई कोतवाली क्षेत्र में ही हाईवे मोड़ पर तब देखने को मिली जब किसी अज्ञात वाहन की टक्कर से बाइक सवार बांदा निवासी सिपाही उमाशंकर तिवारी की मौत हो गई थी। उमाशंकर होटल पर खाना खाने जा रहा था। वह भी हेलमेट नहीं लगाए थे। इसी तरह 31 मई को कालपी में देर शाम रामगंज निवासी बाइक सवार दीपक (30) और गुड्डू दोनों को खानकाह के पास ट्रक ने टक्कर मारी और दोनों की मौत हो गई। दोनों ही हेलमेट नहीं लगाए थे।
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जिले में हेलमेट और सीट बेल्ट का हाल तो यह है कि पुलिस के सिपाही हो या किसी अधिकारी की गाड़ी के चालक हेलमेट और सीट बेल्ट को किनारे ही रखकर चलते हैं। आलम यह है कि मानो दीवारों पर लिखा हो कि हेलमेट लगाना मना है। इन सबके पीछे कहीं न कहीं पुलिस की भी कमी है क्योंकि हेलमेट और सीट बेल्ट के चालान काफी कम होते है। जिस कारण किसी भी चौराहे, बाजार अथवा हाईवे पर बाइक पर दो-तीन नहीं कहीं कहीं तो चार और पांच लोग तक सवार दिख जाएंगे।
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कोई कान में ईयर फोन लगाए तो कोई बाइक चलाते वक्त ही मोबाइल देखने में मशगूल दिखता है। यही वजह है कि सड़क हादसों में होने वाली नब्बे फीसदी मौतों का कारण हेलमेट न लगाना ही होता है। लोगों का मानना है कि आज के दौर में कोई नियम मानने को तैयार नहीं है, नियम मनवाने के लिए पुलिस को ही सड़क पर उतरकर अभियान चलाना पड़ेगा और वाहन सवारों को बताना पड़ेगा कि सुरक्षा उनकी ही जिंदगी के लिए जरूरी है।
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शिक्षिका सरोज अग्रवाल का कहना है कि पुलिस को चाहिए कि जगह-जगह कैंप लगाकर लोगों को यातायात के नियम बताए और चालान के अभियान पर सख्ती की जाए, किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश भी न सुनी जाए। जावेद अख्तर के मुताबिक पिछले दस सालों में शहर की आबादी के हिसाब से वाहन भी बढ़े हैं, लिहाजा पालिका को अच्छी और सुरक्षित यातायात व्यवस्था के लिए संसाधनों सिग्नल, स्पीड ब्रेकर, डिवाइडर बढ़ाने के साथ अतिक्रमण भी हटाना होगा।
सीओ सिटी संतोष कुमार ने कहा कि समय समय पर हेलमेट चेकिंग का अभियान चलता है। जल्द ही इसे और भी सख्ती से चलाया जाएगा, इस बार बढ़ा जुर्माना भी वसूला जाएगा, जिससे नियमों के प्रति जागरुकता जरूर बढ़ेगी। नगर पालिका के ईओ संजय कुमार ने कहा कि शहर में स्पीड ब्रेकर और डिवाइडर के अलावा यातायात से संबंधित अन्य संसाधनों की आवश्यकता है। इसके लिए जल्द ही पुलिस और पालिका अधिकारियों के साथ बैठक कर रणनीति बनाई जाएगी।
36 दिन में हुए 184 सड़क हादसे
यूपी 100 प्रभारी सौरभ सिंह की मानें तो 1 मई से लेकर 7 जून के मध्य ही पूरे जनपद में करीब 184 सड़क हादसे हुए हैं। जिनमें 100 से अधिक गंभीर थे। जिसमें 40 फीसदी से अधिक लोगों ने जान भी गंवाई। जान गंवाने वालों में हेलमेट न होना ही प्रमुख कारण रहा है।
डेढ़ साल पहले चला था अभियान
प्रदेश सरकार बनने के बाद डेढ़ साल पूर्व पहली बार जिले में हेलमेट का अभियान जोरों पर चला था। पुलिस ने चौराहों और हाईवे पर जबरदस्त चेकिंग अभियान चलाया था। इतना ही नहीं शहर के पेट्रोल पंपों को भी निर्देश दिए गए थे कि बिना हेलमेट और सीट बेल्ट के किसी भी दोपहिया और चौपहिया वाहन सवार को ईंधन उपलब्ध न कराए लेकिन कुछ समय बाद ही अभियान ठंडा पड़ गया और जिन्होंने हेलमेट उठाया भी था तो उसे किनारे रख दिया।
न डिवाइडर और न स्पीड ब्रेकर
सिर्फ शहर की ही बात की जाए तो एक माहिल तालाब के पास ही बात छोड़ दें तो कहीं पर न डिवाइडर ही नजर आते हैं और न ही स्पीड ब्रेकर। माहिल तालाब के डिवाइडर काफी पुराने हो गए हैं और किनारे की सड़कें अतिक्रमण के चलते इतनी सिकुड़ गई है कि डिवाइडर सुविधा कम असुविधा अधिक दे रहे हैं। रही बात ट्रैफिक सिग्नल की तो एक मात्र भगत सिंह चौराहे को छोड़ दे तो कहीं पर ट्रैफिक बूथ भी नहीं नजर आता है। इस कारण भी वाहन सवारों की रफ्तार निरंकुश होती जा रही है।
हेलमेट न होने से सिपाही ने गंवाई थी जान
हेलमेट जिले में कितना प्रभावशाली है, इसकी बानगी अभी 21 मई को उरई कोतवाली क्षेत्र में ही हाईवे मोड़ पर तब देखने को मिली जब किसी अज्ञात वाहन की टक्कर से बाइक सवार बांदा निवासी सिपाही उमाशंकर तिवारी की मौत हो गई थी। उमाशंकर होटल पर खाना खाने जा रहा था। वह भी हेलमेट नहीं लगाए थे। इसी तरह 31 मई को कालपी में देर शाम रामगंज निवासी बाइक सवार दीपक (30) और गुड्डू दोनों को खानकाह के पास ट्रक ने टक्कर मारी और दोनों की मौत हो गई। दोनों ही हेलमेट नहीं लगाए थे।