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चुनावी रण में ‘हाथी’ दौड़ाने को ‘महावत’ की तलाश
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उरई। जातिगत आंकड़ों पर स्थापित जालौन (भोगनीपुर जालौन गरौठा) की सुरक्षित संसदीय सीट पर चुनावी मैदान में इस बार हाथी दौड़ाने की कवायद तेज हो गई है। सपा गठबंधन से यह सीट बसपा के खाते में गई है। लिहाजा बसपाइयों को एक बार फिर उम्मीद जगी है कि 20 साल बाद ही सही साइकिल का साथ उसे जीत दिलाकर ही रहेगा। हालांकि अभी भी हाथी को जीत के दरवाजे तक ले जाने वाले महावत की तलाश होना बाकी रह गया है।
बता दें कि 2019 लोकसभा घमासान में फतेह पाने के लिए सपा और बसपा ने गठबंधन किया है। जिसके चलते जालौन की सीट बसपा को मिली है। अब प्रत्याशी तो बसपा का चुनावी मैदान में होगा लेकिन वोट सपा भी जुटाएगी। ऐसे में सीट के बाद अब दूसरा महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु बसपा का प्रत्याशी ही रह गया है, जाहिर है गठबंधन का चुनाव है तो प्रत्याशी चयन में भी अकेले बसपा की नहीं चलेगी।
यही वजह है कि हर बार करीब साल छह महीने पहले से ही प्रत्याशी घोषित करने वाली बसपा इस बार अभी तक ऊहापोह की स्थिति में है। जिस कारण दावेदारों की सूची भी बढ़ती जा रही है। हाल ही में बसपा ने अपना जिलाध्यक्ष भी बदला है, ऐसे में प्रत्याशी चयन की कठिनाई और बढ़ना तय है। हालांकि प्रत्याशियों की दौड़ में 2009 में सपा से सांसद चुने गए घनश्याम अनुरागी, जिन्होंने पिछले ही साल साइकिल से उतरकर हाथी की सवारी की है, भी शामिल है।
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इसी तरह 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस से लड़ने वाले पूर्व पालिकाध्यक्ष विजय चौधरी ने भी बसपा में वापसी कर अब पूरी ताकत टिकट के लिए लगा रखी है। कालपी पालिकाध्यक्ष बैकुंठी देवी के बेटे जगजीवन अहिरवार भी दौड़ में शामिल है। वहीं पूर्व एमएलसी तिलकचंद्र अहिरवार, पूर्व विधायक अजय उर्फ पंकज अहिरवार, पूर्व विधायक एवं कोआर्डिनेटर रहे गयाचरण दिनकर भी टिकट पाने की जोड़तोड़ में नजर आ रहे हैं। जबकि पूर्व सांसद के करीबी रिश्तेदार एवं पूर्व ब्लाक प्रमुख पति श्रीपाल भी टिकट की लाइन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। अब देखना यह होगा कि इनमें से किसे 2019 के चुनावी रण में हाथी का महावत बनाया जाएगा।
1999 में आखिरी बार चिंघाड़ा था हाथी
पिछले चुनावी आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो आखिरी बार बसपा 1999 में जालौन की सुरक्षित सीट से चुनाव जीती थी। उस वक्त बसपा के प्रत्याशी रहे बृजलाल खाबरी (वर्तमान में कांग्रेस में) 1,97,705 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के भानुप्रताप वर्मा (वर्तमान सांसद) को 1,84,353 वोट मिले थे। खाबरी 13,352 वोटों से चुनाव जीते थे तो जिले में हाथी की चिंघाड़ गूंज उठी थी।
2014 में सब पर भारी थी भाजपा
भले ही 2019 का चुनाव सपा-बसपा गठबंधन से लड़े लेकिन यदि 2014 के परिणामों पर नजर दौड़ाई जाए तो सपा बसपा के वोट मिलाकर भी भाजपा के आसपास नहीं थे। भाजपा को 2014 में 5,48,631, सपा को 1,80,921 और बसपा को 2,61,429 वोट मिले थे। मतलब भाजपा के 5,48,631 के आगे सपा-बसपा के कुल वोट 4,42,350 ही थे। लिहाजा इस बार प्रत्याशी का अपना खुद का जादू ही असर कर सकता है।
हाईकमान देगा हरी झंडी
बसपा जिलाध्यक्ष परशुराम पाल का कहना है कि प्रत्याशी चयन की स्वतंत्रता बसपा को ही है, लिहाजा हाईकमान जिसे भी हरी झंडी देगा, वहीं चुनाव मैदान में दिखेगा और सपा के साथ मिलकर उसे जिताया जाएगा।
जिताकर दिल्ली पहुंचाना है
सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल दादी का कहना है कि चुनाव बसपा को लड़ना है तो जाहिर सी बात है कि प्रत्याशी भी उनकी ही पसंद का होगा। सपा का काम तो यह होगा कि जो भी गठबंधन से आए उसे जिताकर दिल्ली पहुंचाया जाए।
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बता दें कि 2019 लोकसभा घमासान में फतेह पाने के लिए सपा और बसपा ने गठबंधन किया है। जिसके चलते जालौन की सीट बसपा को मिली है। अब प्रत्याशी तो बसपा का चुनावी मैदान में होगा लेकिन वोट सपा भी जुटाएगी। ऐसे में सीट के बाद अब दूसरा महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु बसपा का प्रत्याशी ही रह गया है, जाहिर है गठबंधन का चुनाव है तो प्रत्याशी चयन में भी अकेले बसपा की नहीं चलेगी।
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यही वजह है कि हर बार करीब साल छह महीने पहले से ही प्रत्याशी घोषित करने वाली बसपा इस बार अभी तक ऊहापोह की स्थिति में है। जिस कारण दावेदारों की सूची भी बढ़ती जा रही है। हाल ही में बसपा ने अपना जिलाध्यक्ष भी बदला है, ऐसे में प्रत्याशी चयन की कठिनाई और बढ़ना तय है। हालांकि प्रत्याशियों की दौड़ में 2009 में सपा से सांसद चुने गए घनश्याम अनुरागी, जिन्होंने पिछले ही साल साइकिल से उतरकर हाथी की सवारी की है, भी शामिल है।
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इसी तरह 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस से लड़ने वाले पूर्व पालिकाध्यक्ष विजय चौधरी ने भी बसपा में वापसी कर अब पूरी ताकत टिकट के लिए लगा रखी है। कालपी पालिकाध्यक्ष बैकुंठी देवी के बेटे जगजीवन अहिरवार भी दौड़ में शामिल है। वहीं पूर्व एमएलसी तिलकचंद्र अहिरवार, पूर्व विधायक अजय उर्फ पंकज अहिरवार, पूर्व विधायक एवं कोआर्डिनेटर रहे गयाचरण दिनकर भी टिकट पाने की जोड़तोड़ में नजर आ रहे हैं। जबकि पूर्व सांसद के करीबी रिश्तेदार एवं पूर्व ब्लाक प्रमुख पति श्रीपाल भी टिकट की लाइन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। अब देखना यह होगा कि इनमें से किसे 2019 के चुनावी रण में हाथी का महावत बनाया जाएगा।
1999 में आखिरी बार चिंघाड़ा था हाथी
पिछले चुनावी आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो आखिरी बार बसपा 1999 में जालौन की सुरक्षित सीट से चुनाव जीती थी। उस वक्त बसपा के प्रत्याशी रहे बृजलाल खाबरी (वर्तमान में कांग्रेस में) 1,97,705 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के भानुप्रताप वर्मा (वर्तमान सांसद) को 1,84,353 वोट मिले थे। खाबरी 13,352 वोटों से चुनाव जीते थे तो जिले में हाथी की चिंघाड़ गूंज उठी थी।
2014 में सब पर भारी थी भाजपा
भले ही 2019 का चुनाव सपा-बसपा गठबंधन से लड़े लेकिन यदि 2014 के परिणामों पर नजर दौड़ाई जाए तो सपा बसपा के वोट मिलाकर भी भाजपा के आसपास नहीं थे। भाजपा को 2014 में 5,48,631, सपा को 1,80,921 और बसपा को 2,61,429 वोट मिले थे। मतलब भाजपा के 5,48,631 के आगे सपा-बसपा के कुल वोट 4,42,350 ही थे। लिहाजा इस बार प्रत्याशी का अपना खुद का जादू ही असर कर सकता है।
हाईकमान देगा हरी झंडी
बसपा जिलाध्यक्ष परशुराम पाल का कहना है कि प्रत्याशी चयन की स्वतंत्रता बसपा को ही है, लिहाजा हाईकमान जिसे भी हरी झंडी देगा, वहीं चुनाव मैदान में दिखेगा और सपा के साथ मिलकर उसे जिताया जाएगा।
जिताकर दिल्ली पहुंचाना है
सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल दादी का कहना है कि चुनाव बसपा को लड़ना है तो जाहिर सी बात है कि प्रत्याशी भी उनकी ही पसंद का होगा। सपा का काम तो यह होगा कि जो भी गठबंधन से आए उसे जिताकर दिल्ली पहुंचाया जाए।