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विश्व विरासत दिवस: कब्जों का मकड़जाल, धरोहरें हो रहीं बदहाल

Mon, 17 Apr 2023 10:01 PM IST
अलीगढ़ ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस Updated Mon, 17 Apr 2023 10:01 PM IST
सार

प्राचीन स्थल को संरक्षित करने की योजनाएं बनीं। इनके सौंदर्यीकरण का काम भी शुरू हुआ, लेकिन यह काम अभी अधर में है। इतना ही नहीं किला परिसर से अवैध कब्जे भी नहीं हटाए गए। यह किला शहर की पहचान भी है।

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The web of occupations the heritages getting worse
किला राजा दयाराम व मंदिर श्री दाऊजी महाराज - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाथरस जिले के ऐतिहासिक स्थलों की विरासत को संरक्षित रखने के लिए हर साल 18 अप्रैल को ''विश्व धरोहर दिवस'' मनाया जाता है। इसके माध्यम से संदेश दिया जाता है कि हम अपनी सांस्कृतिक पहचान वाली पुरातन महत्व की धरोहरों को संजोकर रखें। जिले में भी कई पुरातन महत्व के स्थल हैं। सरकारी कागजों में तो यह स्थल पुरातन महत्व के हैं, लेकिन इनका संरक्षण नहीं हो रहा। इसमें सबसे अहम स्थल शहर का किला राजा दयाराम और मंदिर श्रीदाऊजी महाराज है।
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यह अंग्रेजों से हुए युद्ध का गवाह भी है। इस प्राचीन स्थल को संरक्षित करने की योजनाएं बनीं। इनके सौंदर्यीकरण का काम भी शुरू हुआ, लेकिन यह काम अभी अधर में है। इतना ही नहीं किला परिसर से अवैध कब्जे भी नहीं हटाए गए। यह किला शहर की पहचान भी है। वर्ष 1817 में अंग्रेजों ने राजा दयाराम के इस किले पर हमला किया था। तीन दिन तक भीषण युद्ध हुआ था। तोपखाने में आग लग गई थी। इसके उपरांत राजा दयाराम के किला छोड़ दिया था। इसका दूसरा महत्व मेला श्रीदाऊजी महाराज के आयोजन की वजह से भी है। वर्ष 1912 में हाथरस किला पर लगने वाले ऐतिहासिक लक्खी मेले की शुरुआत हुई थी।
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भादों महीने में देवछठ से 15 दिन से ज्यादा समय तक लगने वाले मेले की पहचान बृज क्षेत्र के लक्खी मेले के रूप में है। आज यह धरोहर अतिक्रमण और अवैध कब्जे का शिकार हो रही है। किला खाई में बस्ती बसने से किला परिसर सिकुड़ता जा रहा है। इसे पुरातत्व विभाग ने पुरातन महत्व का स्थल घोषित कर रखा है। पर्यटक स्थल भी इसे बना रखा है। इसके सौंदर्यीकरण के लिए भी कुछ कार्य हुए हैं, लेकिन ज्यादातर कार्य अधर में हैं। इस स्थल पर अवैध कब्जे चिन्हित तो कई बार किए गए, लेकिन हटाए नहीं गए। ऐसे में यह कब्जे लगातार बढ़ते चले गए। इस शहर व आसपास के इलाकों कई प्राचीन मंदिर हैं, जोकि यहां की संस्कृति को संजोए हुए है। मुरसान का किला भी काफी प्राचीन है। वह भी पुराना इतिहास समेटे हुए है।
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जिले के दो पेड़ भी हैं विरासत में शामिल
दो साल पहले शासन स्तर से पुरानी धरोहर को संजाने के लिए रिपोर्ट मांगी गई थी। इस पर वन विभाग ने अपनी रिपोर्ट भेजी थी। हसायन के अंडौली ग्राम पंचायत ढाई सौ वर्ष पुराना बरगद का पेड़ है। सहपऊ के बाबली ग्राम पंचायत बाबली रजबहे के किनारे 100 पुराना पेड़ है। यहां पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजन होता है। शासन से आई टीम के द्वारा इनकी जांच की गई है। अभी तक शासन स्तर से कोई निर्देश नहीं आया है। इस कारण पेड़ आज भी उसी हालत में हैं। प्रभागीय वनाधिकारी डॉ. सीपी सिंह का कहना है कि 100 साल वाले पौधों को विरासत के रूप में संजोने के लिए शासन से टीम आई थी। टीम ने सर्वे किया था। इन पौधों को संजोने के लिए शासन स्तर से जैसा आदेश आएगा, उस पर अमल किया जाएगा।
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