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प्यास से मर रहे हिरन, कैसे सही रहे पर्यावरण
हाथरस/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 04 Jun 2016 11:47 PM IST
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जंगल में विचरण करते हिरन
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो हाथरस
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सिकंदराराऊ/हाथरस। सिकंदराराऊ के जंगलों में विचर रहे दुर्लभ काले, लाल और सफेद हिरन तपती गर्मी में प्यास से तड़प रहे हैं, लेकिन कई बार आगाह करने के बावजूद वन विभाग इनके चारे-पानी और सुरक्षा इंतजामों को लेकर नहीं चेता है। विभाग ने इन्हें पानी पिलाने के लिए ग्रामीणों के सहयोग से ट्रॉली चलवाकर माइनर में पानी तो भरवाया, लेकिन यह नाकाफी रहा। अब फिर से हिरन चारे-पानी के लिए कुदरत के भरोसे हैं। यही नहीं विधायक रामवीर उपाध्याय ने भी इन बेजुबानों को पानी पिलाने के लिए अपना वादा नहीं निभाया है। नतीजा, भूख-प्यास और गर्मी की तपिश से ये बेजुबां दम तोड़ रहे हैं। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर एक बार फिर सरकारी तंत्र इनकी हिफाजत के लिए किसी ठोस कदम की आस की जा रही है।
दुर्लभ हिरन आज भी क्षेत्र के गांव शहादतपुर के बबूल के जंगल में एक-एक बूंद पानी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। वन विभाग के पास इनके लिये पानी का इंतजाम करने के लिए न तो बजट है और न ही समय। गांव के बाहर रात्रि में चल रहे टयूबवेल पर यह बेजुबां अपनी प्यास बुझा रहे हैं। माइनर में पानी नहीं होने से पूरे दिन धूल उड़ती रहती है। अगर यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं, जब यहां हिरनों का नाम-ओ-निशां मिट जाएगा।
इन प्रजातियों के हिरन हैं मौजूद
बता दें कि शहादतपुर के इर्द-गिर्द दर्जनों गांवों में सैकड़ों की तादाद में दुर्लभ हिरन हैं, जिनमें ब्लैक बग, चीतल, कस्तूरी हिरन, दुर्लभ सफेद हिरन मस्क डीयर समेत अनेक प्रजातियां हैं। ग्रामीणों के संरक्षण देने, पानी तथा हरी घास बबूल के जंगल इनका आशियाना बन गए हैं। विगत पांच वर्षों में इनकी तादाद गुणात्मक रूप से बढ़ गई। सबसे चर्चित यहां सफेद हिरन की मौजूदगी है। हिमालय की तलहटी में पाए जाने वाला मस्क डीयर यहां की गर्म जलवायु में आश्चर्यजनक रूप से पैदा हुआ है।
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बार-बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अवगत कराने के बावजूद हिरनों के चारे-पानी और सुरक्षा के लिए कुछ नहीं हुआ है। ग्रामीणों के सहयोग से पिछले दिनों वन विभाग ने सिर्फ एक हजार रुपये खर्च करके ट्रॉली चलवाकर माइनर में पानी भरवाया, लेकिन वह नाकाफी रहा। हम फिर भी इनकी सलामती की कोशिश जारी रखे हुए हैं।
-वीरपाल सिंह, अध्यक्ष वन्य जीव संरक्षण समिति
विभाग ने संरक्षित में बोरिंग कराके वहां पानी का इंतजाम करा दिया है। सुरक्षा के लिए वहां पेट्रोलिंग भी कराई जा रही है। हिरनों की संख्या बढ़ रही है।
एके कश्यप, डीएफओ हाथरस
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दुर्लभ हिरन आज भी क्षेत्र के गांव शहादतपुर के बबूल के जंगल में एक-एक बूंद पानी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। वन विभाग के पास इनके लिये पानी का इंतजाम करने के लिए न तो बजट है और न ही समय। गांव के बाहर रात्रि में चल रहे टयूबवेल पर यह बेजुबां अपनी प्यास बुझा रहे हैं। माइनर में पानी नहीं होने से पूरे दिन धूल उड़ती रहती है। अगर यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं, जब यहां हिरनों का नाम-ओ-निशां मिट जाएगा।
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इन प्रजातियों के हिरन हैं मौजूद
बता दें कि शहादतपुर के इर्द-गिर्द दर्जनों गांवों में सैकड़ों की तादाद में दुर्लभ हिरन हैं, जिनमें ब्लैक बग, चीतल, कस्तूरी हिरन, दुर्लभ सफेद हिरन मस्क डीयर समेत अनेक प्रजातियां हैं। ग्रामीणों के संरक्षण देने, पानी तथा हरी घास बबूल के जंगल इनका आशियाना बन गए हैं। विगत पांच वर्षों में इनकी तादाद गुणात्मक रूप से बढ़ गई। सबसे चर्चित यहां सफेद हिरन की मौजूदगी है। हिमालय की तलहटी में पाए जाने वाला मस्क डीयर यहां की गर्म जलवायु में आश्चर्यजनक रूप से पैदा हुआ है।
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बार-बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अवगत कराने के बावजूद हिरनों के चारे-पानी और सुरक्षा के लिए कुछ नहीं हुआ है। ग्रामीणों के सहयोग से पिछले दिनों वन विभाग ने सिर्फ एक हजार रुपये खर्च करके ट्रॉली चलवाकर माइनर में पानी भरवाया, लेकिन वह नाकाफी रहा। हम फिर भी इनकी सलामती की कोशिश जारी रखे हुए हैं।
-वीरपाल सिंह, अध्यक्ष वन्य जीव संरक्षण समिति
विभाग ने संरक्षित में बोरिंग कराके वहां पानी का इंतजाम करा दिया है। सुरक्षा के लिए वहां पेट्रोलिंग भी कराई जा रही है। हिरनों की संख्या बढ़ रही है।
एके कश्यप, डीएफओ हाथरस