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इमदाद का मोहताज शहीद का परिवार
अमर उजाला, हाथ्ारस
Updated Wed, 27 Jul 2016 12:38 AM IST
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शहीदों के चित्र पर माल्यार्पण करते ब्रिगेडियर मनोचा
- फोटो : अमर उजाला
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हाथरस। कारगिल युद्ध और उसके दौरान चले कई ऑपरेशन में जिले के रणबांकुरों ने कुर्बानी दीं, लेकिन बात यदि शासन-प्रशासन की करें तो कारगिल युद्ध के उपरांत कई ऑपरेशन में देश के लिए शहीद होने वाले इन जवानों के परिजनों को शासन और प्रशासन दोनों ही भूल गए।
आपरेशन रक्षक में अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद जहूर खां का परिवार इसका उदाहरण हैें। शहीद के परिवार के लोगों की मानें तो उन्हें सरकारी मदद के नाम पर कुछ नहीं मिला। यही कारण है कि जहूर खां का परिवार बेहद आर्थिक तंगी में अपनी गुजर-बसर कर रहा है।
उनके दो बेटे मजदूरी कर रहे हैं और भाई रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पाल रहा है। किसी बेटे को सरकारी नौकरी तक नहीं मिली है।
कारगिल युद्ध के उपरांत ऑपरेशन रक्षक में यहां मोहल्ला नई दिल्ली निवासी जहूर खां शहीद हो गए थे। वह 4 ग्रेनेडियर में हवलदार के पद पर तैनात थे और मूल रूप से गांव मीतई के रहने वाले थे। 17 अक्तूबर, 2002 को ऑपरेशन रक्षक में वह शहीद हुए थे।
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शहीद जहूर खान की पत्नी हाजरा बेगम छह बच्चों की मां हैं। उनकी पत्नी का कहना है कि जिस समय उनके पति देश के लिए शहीद हुए, उस समय तो बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई थीं, लेकिन उसके बाद आज तक इस परिवार को कोई सरकारी इमदाद नहीं मिली।
हाजरा बेगम ने अधिकारियों के कार्यालयों पर चक्कर भी लगाए, फिर भी किसी लड़के को सरकारी नौकरी नहीं मिली और न ही सरकारी सहायता। शहीद का परिवार अभी भी केंद्र और राज्य सरकारों से सहायता की उम्मीद लगाए बैठा है। उन्होंने बताया कि शहीद के दो बेटे दिल्ली में मजदूरी करते हैं और चार पढ़ रहे हैं।
14 साल बाद आज तक किसी परिजन को सरकारी नौकरी तक नहीं मिली। शहीद जहूर के बड़े भाई फरीद खान का कहना था कि उन्हें सरकार की सहायता से खेती योग्य जमीन उपलब्ध कराई जाए या परिवार के किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिले।
मीतई स्थित शहीद के स्मारक को संरक्षण मिले और उसका सौंदर्यीकरण कराया जाए। केंद्र और राज्य सरकार से भी सहायता मिले।
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आपरेशन रक्षक में अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद जहूर खां का परिवार इसका उदाहरण हैें। शहीद के परिवार के लोगों की मानें तो उन्हें सरकारी मदद के नाम पर कुछ नहीं मिला। यही कारण है कि जहूर खां का परिवार बेहद आर्थिक तंगी में अपनी गुजर-बसर कर रहा है।
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उनके दो बेटे मजदूरी कर रहे हैं और भाई रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पाल रहा है। किसी बेटे को सरकारी नौकरी तक नहीं मिली है।
कारगिल युद्ध के उपरांत ऑपरेशन रक्षक में यहां मोहल्ला नई दिल्ली निवासी जहूर खां शहीद हो गए थे। वह 4 ग्रेनेडियर में हवलदार के पद पर तैनात थे और मूल रूप से गांव मीतई के रहने वाले थे। 17 अक्तूबर, 2002 को ऑपरेशन रक्षक में वह शहीद हुए थे।
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शहीद जहूर खान की पत्नी हाजरा बेगम छह बच्चों की मां हैं। उनकी पत्नी का कहना है कि जिस समय उनके पति देश के लिए शहीद हुए, उस समय तो बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई थीं, लेकिन उसके बाद आज तक इस परिवार को कोई सरकारी इमदाद नहीं मिली।
हाजरा बेगम ने अधिकारियों के कार्यालयों पर चक्कर भी लगाए, फिर भी किसी लड़के को सरकारी नौकरी नहीं मिली और न ही सरकारी सहायता। शहीद का परिवार अभी भी केंद्र और राज्य सरकारों से सहायता की उम्मीद लगाए बैठा है। उन्होंने बताया कि शहीद के दो बेटे दिल्ली में मजदूरी करते हैं और चार पढ़ रहे हैं।
14 साल बाद आज तक किसी परिजन को सरकारी नौकरी तक नहीं मिली। शहीद जहूर के बड़े भाई फरीद खान का कहना था कि उन्हें सरकार की सहायता से खेती योग्य जमीन उपलब्ध कराई जाए या परिवार के किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिले।
मीतई स्थित शहीद के स्मारक को संरक्षण मिले और उसका सौंदर्यीकरण कराया जाए। केंद्र और राज्य सरकार से भी सहायता मिले।