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दो साल में 104 मरीजों की मौत, छह लावारिस
हाथरस/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 18 Jun 2016 11:42 PM IST
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हाथरस। यूनीवर्सल ह्यूमन राइट्स काउंसिल को आरटीआई के तहत मिली जानकारी ने जिला अस्पताल के संसाधन और वहां मौजूद चिकित्सा सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है। मिली जानकारी के मुताबिक पिछले दो सालों में अस्पताल में भर्ती होने वाले 104 मरीजों की मौत हो चुकी है, इनमें से छह मरीज लावारिस थे। हैरत की बात यह है कि हर साल अस्पताल में मरीजों की मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। साल 2014 में जहां कुल 39 मरीजों की मौत अस्पताल में हुई। वहीं साल 2015 में दम तोड़ने वाले मरीजों की संख्या 71 तक पहुंच गई।
सरकारी अस्पताल में उपचार के दौरान बरती जाने वाली लापरवाही और संसाधनों के अभाव से संपन्न तबके के लोग यहां इलाज से कन्नी काटते हैं। बावजूद इसके मुफ्त इलाज के कारण बड़ी संख्या में गरीब और बेसहारा लोग यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं। इमरजेंसी में आने वाले थोड़े गंभीर मरीजों को आगरा या अलीगढ़ रेफर कर दिया जाता है। ऐसा कम ही होता है जब मरीज को लंबे समय तक यहां भर्ती किया जाए। बावजूद इसके यहां हर साल बड़ी संख्या में मरीज दम तोड़ देते हैं। इस पर सवाल यह भी उठ रहा है कि हालत बिगड़ने पर मरीजों को हायर सेंटर के लिए रेफर क्यों नहीं किया जाता। दो साल में छह लावारिस मरीजों की मौत से यह साफ होता है कि उन्हें हायर सेंटर पर रेफर नहीं किया गया और गंभीर हालत में ही अस्पताल में मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। अस्पताल के सीएमएस डॉ. एमएल अग्रवाल का तर्क है कि लावारिस मरीजों को किसी तीमारदार या पुलिसकर्मी के साथ होने पर ही रेफर किया जा सकता है। डॉ. अग्रवाल के मुताबिक अस्पताल में 24 में से केवल 13 डॉक्टर ही तैनात हैं। हर साल मरीजों का बोझ बढ़ता जा रहा है। साल 2014 में जहां 5273 मरीज भर्ती हुए वहीं साल 2015 में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या 8538 थी। काउंसिल के राष्ट्रीय महासचिव प्रवीन वार्ष्णेय का कहना है कि अस्पताल प्रशासन ने कई बिंदुओं पर सूचना नहीं दी है। अस्पताल प्रशासन कई महत्वपूर्ण जानकारियों को छिपा रहा है।
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सरकारी अस्पताल में उपचार के दौरान बरती जाने वाली लापरवाही और संसाधनों के अभाव से संपन्न तबके के लोग यहां इलाज से कन्नी काटते हैं। बावजूद इसके मुफ्त इलाज के कारण बड़ी संख्या में गरीब और बेसहारा लोग यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं। इमरजेंसी में आने वाले थोड़े गंभीर मरीजों को आगरा या अलीगढ़ रेफर कर दिया जाता है। ऐसा कम ही होता है जब मरीज को लंबे समय तक यहां भर्ती किया जाए। बावजूद इसके यहां हर साल बड़ी संख्या में मरीज दम तोड़ देते हैं। इस पर सवाल यह भी उठ रहा है कि हालत बिगड़ने पर मरीजों को हायर सेंटर के लिए रेफर क्यों नहीं किया जाता। दो साल में छह लावारिस मरीजों की मौत से यह साफ होता है कि उन्हें हायर सेंटर पर रेफर नहीं किया गया और गंभीर हालत में ही अस्पताल में मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। अस्पताल के सीएमएस डॉ. एमएल अग्रवाल का तर्क है कि लावारिस मरीजों को किसी तीमारदार या पुलिसकर्मी के साथ होने पर ही रेफर किया जा सकता है। डॉ. अग्रवाल के मुताबिक अस्पताल में 24 में से केवल 13 डॉक्टर ही तैनात हैं। हर साल मरीजों का बोझ बढ़ता जा रहा है। साल 2014 में जहां 5273 मरीज भर्ती हुए वहीं साल 2015 में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या 8538 थी। काउंसिल के राष्ट्रीय महासचिव प्रवीन वार्ष्णेय का कहना है कि अस्पताल प्रशासन ने कई बिंदुओं पर सूचना नहीं दी है। अस्पताल प्रशासन कई महत्वपूर्ण जानकारियों को छिपा रहा है।
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