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Independence Day 2022: कुंवरजीलाल आर्य ने 12 वर्ष की उम्र में कोड़े खाए, फिर भी नहीं छोड़ा आजादी का इरादा
Mon, 15 Aug 2022 08:17 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
Published by: अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 15 Aug 2022 08:17 AM IST
सार
कोड़ों की सजा ने कुंवरजीलाल आर्य के इरादे और मजबूत कर दिए। उनके पौत्र ने बताया कि दादाजी हमसे कहते थे यह आजादी बड़ी कुर्बानियों एवं कष्ट झेलकर मिली है। इसे संभालकर रखना।
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कुंवरजीलाल का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सहपऊ क्षेत्र के गांव पीहुरा निवासी कुंवरजीलाल आर्य ने छोटी उम्र से ही देश को स्वतंत्र कराने के लिए चल रहे आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। कुंवरजीलाल के पौत्र राहुल शर्मा ने बताया कि जब उनके दादाजी की उम्र 12 वर्ष थी। तब उन्होंने एक अंग्रेज अफसर के सामने भारत माता की जय एवं अंग्रेजी शासन के खिलाफ नारे लगाए। इसके लिए उनको गिरफ्तार कर लिया गया और 20 कोड़ों की सजा सुनाई गई।
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महात्मा गांधी के साथ अपने पिता बौहरे पन्नालाल शर्मा उनके प्रेरणा स्रोत रहे थे। कोड़ों की सजा ने उनके इरादे और मजबूत कर दिए। एक बार कस्बा के सुनहरीलाल आजाद एवं उनके साथ अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने ट्रेन से दिल्ली जा रहे एक अंग्रेज अफसर को भयभीत करने के लिए दूर संचार व्यवस्था को भंग कर दिया और ट्रेन को रोक लिया। इसके लिए उनको गिरफ्तार कर लिया गया। उनको छह माह के कारावास और 200 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।
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इसके बाद दूसरी बार उनको दो माह की जेल हुई और वह मथुरा जेल में बंद रहे। इस दौरान न्यायालय में पेशी के लिए जाते हुए वह फरार हो गए। उनका फरारी जीवन काफी कष्टमय बीता। नाते रिश्तेदारों ने अंग्रेजों के डर से पनाह देने से मना कर दिया। कई दिनों तक उनको भूखा रहना पड़ा तो कहीं गाजर खाकर पूरा दिन गुजारा।
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इसके बाद उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। पौत्र ने बताया कि दादाजी हमसे कहते थे यह आजादी बड़ी कुर्बानियों एवं कष्ट झेलकर मिली है। इसे संभालकर रखना। वर्ष 1972 में उनको मिला ताम्रपत्र भी कहीं खो गया। 94 वर्ष की अवस्था में वर्ष 2018 में उनका निधन हो गया। देश स्वतंत्र होने के बाद भी वह समाजसेवा करते रहे। उन्होंने गांव में एक इंटर कॉलेज की भी स्थापना की। संवाद