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हाथरस : बसपा के सामने इस बार साख बचाए रखने की होगी चुनौती
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हाथरस : बसपा जिलाध्यक्ष महेशबाबू कुशवाहा। संवाद
- फोटो : HATHRAS
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने तैयारी तेज कर दी हैं। बसपा भी इसमें लगी है। कभी सोशल इंजीनियरिंग के सहारे प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने वाली बसपा के सामने इस बार अपनी साख बचाए रखने की चुनौती होगी। बसपा पिछले चुनाव में महज सादाबाद सीट ही जीत पाई थी। हालांकि बसपा के नेता दावा कर रहे हैं कि पार्टी जिले में तीनों सीटें जीतेगी।
चुनावी इतिहास पर एक नजर डालें तो बसपा ने जिले में अपनी दमदार मौजूदगी का अहसास वर्ष 1993 के चुनाव में कराया था। तब सपा-बसपा गठबंधन के तहत इस सीट से बसपा के उम्मीदवार हिलाल अहमद कुरैशी मैदान में उतरे थे। वह केवल 900 वोटों से भाजपा प्रत्याशी राजवीर सिंह पहलवान से हार गए थे। इसके बाद बसपा इस जिले में एक ताकत बनकर उभरी। हाथरस विधानसभा सीट पर वर्ष 1996 में बसपा के रामवीर उपाध्याय ने जीत हासिल की। वह तत्कालीन सरकार में ऊर्जा और परिवहन मंत्री भी रहे। उसके बाद उन्होंने लगातार दो बार वर्ष 2002, वर्ष 2007 में भी यह सीट जीती। वह बसपा की सरकारों में कबीना मंत्री बने।
उनके साथ ही वर्ष 2007 में सासनी (सुरक्षित) सीट से गेंदालाल चौधरी ने बसपा प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की। तदुपरांत जब सासनी सीट समाप्त कर दी गई और हाथरस की सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित कर दी गई तो वर्ष 2012 में गेंदालाल चौधरी बसपा उम्मीदवार के रूप में इस सीट से चुनाव लड़े और जीते। इस तरह हाथरस सीट से बसपा ने लगातार चार बार जीत हासिल की। पिछली बार वर्ष 2017 में बसपा ने अपना उम्मीदवार बदल दिया। बसपा ने बृजमोहन राही को उम्मीदवार बनाया।
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राही को इस चुनाव में भाजपा के हरीशंकर माहौर ने करीब 70 हजार वोटों से परास्त कर दिया। सिकंदराराऊ सीट से बसपा ने केवल एक बार वर्ष 2012 में जीत हासिल की। तब रामवीर उपाध्याय ने वहां से चुनाव लड़ा था और सपा के उम्मीदवार यशपाल सिंह चौहान को कड़े मुकाबले में हराया था। सादाबाद से भी बसपा को एक बार ही जीत नसीब हुई है। पिछला चुनाव रामवीर उपाध्याय ने बसपा उम्मीदवार के रूप में सादाबाद से लड़ा। पिछले चुनाव में भाजपा की आंधी चल रही थी। इसके बावजूद रामवीर ने बसपा प्रत्याशी के रूप में रालोद प्रत्याशी डॉ.अनिल चौधरी को मात दी थी। ऐसे में यदि देखा जाए तो बसपा हाथरस के चार बार और सिकंदराराऊ व सादाबाद से एक-एक बार जीत हासिल कर चुकी है। संवाद
तो रामवीर के बिना ही बसपा को लड़ना होगा चुनाव
हाथरस। इस बार परिस्थिति बदली हुई हैं। बसपा की सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर हमेशा खरे उतरने वाले प्रदेश के कद्दावर नेता रामवीर उपाध्याय बसपा से करीब दो साल से निलंबित चल रहे हैं। उन पर बसपा आलाकमान ने लोकसभा चुनाव में भाजपा का समर्थन करने का आरोप लगाया था और पार्टी से निलंबित कर दिया था। इस दौरान रामवीर उपाध्याय का पूरा परिवार भाजपा में शामिल हो चुका है। रामवीर का रुझान भी भाजपा की ओर ही है। उनकी पत्नी भाजपा के समर्थन से जिला पंचायत अध्यक्ष भी बन चुकी हैं। ऐसे में यह माना जा रहा है कि बसपा को इस बार रामवीर के बिना ही जिले में चुनाव लड़ना होगा। ऐसे में उसकी डगर कठिन हो सकती है। संवाद
पार्टी पूरे दमखम से विधानसभा चुनाव लड़ेगी और तीनों सीटें जीतेगी। इसके लिए पार्टी ने काफी समय से तैयारी कर रखी है। प्रत्याशी भी आला नेतृत्व जल्द घोषित कर देगा। रामवीर उपाध्याय बसपा से निलंबित चल रहे हैं। उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।
-महेशबाबू कुशवाहा, जिलाध्यक्ष बसपा
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आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने तैयारी तेज कर दी हैं। बसपा भी इसमें लगी है। कभी सोशल इंजीनियरिंग के सहारे प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने वाली बसपा के सामने इस बार अपनी साख बचाए रखने की चुनौती होगी। बसपा पिछले चुनाव में महज सादाबाद सीट ही जीत पाई थी। हालांकि बसपा के नेता दावा कर रहे हैं कि पार्टी जिले में तीनों सीटें जीतेगी।
चुनावी इतिहास पर एक नजर डालें तो बसपा ने जिले में अपनी दमदार मौजूदगी का अहसास वर्ष 1993 के चुनाव में कराया था। तब सपा-बसपा गठबंधन के तहत इस सीट से बसपा के उम्मीदवार हिलाल अहमद कुरैशी मैदान में उतरे थे। वह केवल 900 वोटों से भाजपा प्रत्याशी राजवीर सिंह पहलवान से हार गए थे। इसके बाद बसपा इस जिले में एक ताकत बनकर उभरी। हाथरस विधानसभा सीट पर वर्ष 1996 में बसपा के रामवीर उपाध्याय ने जीत हासिल की। वह तत्कालीन सरकार में ऊर्जा और परिवहन मंत्री भी रहे। उसके बाद उन्होंने लगातार दो बार वर्ष 2002, वर्ष 2007 में भी यह सीट जीती। वह बसपा की सरकारों में कबीना मंत्री बने।
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उनके साथ ही वर्ष 2007 में सासनी (सुरक्षित) सीट से गेंदालाल चौधरी ने बसपा प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की। तदुपरांत जब सासनी सीट समाप्त कर दी गई और हाथरस की सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित कर दी गई तो वर्ष 2012 में गेंदालाल चौधरी बसपा उम्मीदवार के रूप में इस सीट से चुनाव लड़े और जीते। इस तरह हाथरस सीट से बसपा ने लगातार चार बार जीत हासिल की। पिछली बार वर्ष 2017 में बसपा ने अपना उम्मीदवार बदल दिया। बसपा ने बृजमोहन राही को उम्मीदवार बनाया।
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राही को इस चुनाव में भाजपा के हरीशंकर माहौर ने करीब 70 हजार वोटों से परास्त कर दिया। सिकंदराराऊ सीट से बसपा ने केवल एक बार वर्ष 2012 में जीत हासिल की। तब रामवीर उपाध्याय ने वहां से चुनाव लड़ा था और सपा के उम्मीदवार यशपाल सिंह चौहान को कड़े मुकाबले में हराया था। सादाबाद से भी बसपा को एक बार ही जीत नसीब हुई है। पिछला चुनाव रामवीर उपाध्याय ने बसपा उम्मीदवार के रूप में सादाबाद से लड़ा। पिछले चुनाव में भाजपा की आंधी चल रही थी। इसके बावजूद रामवीर ने बसपा प्रत्याशी के रूप में रालोद प्रत्याशी डॉ.अनिल चौधरी को मात दी थी। ऐसे में यदि देखा जाए तो बसपा हाथरस के चार बार और सिकंदराराऊ व सादाबाद से एक-एक बार जीत हासिल कर चुकी है। संवाद
तो रामवीर के बिना ही बसपा को लड़ना होगा चुनाव
हाथरस। इस बार परिस्थिति बदली हुई हैं। बसपा की सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर हमेशा खरे उतरने वाले प्रदेश के कद्दावर नेता रामवीर उपाध्याय बसपा से करीब दो साल से निलंबित चल रहे हैं। उन पर बसपा आलाकमान ने लोकसभा चुनाव में भाजपा का समर्थन करने का आरोप लगाया था और पार्टी से निलंबित कर दिया था। इस दौरान रामवीर उपाध्याय का पूरा परिवार भाजपा में शामिल हो चुका है। रामवीर का रुझान भी भाजपा की ओर ही है। उनकी पत्नी भाजपा के समर्थन से जिला पंचायत अध्यक्ष भी बन चुकी हैं। ऐसे में यह माना जा रहा है कि बसपा को इस बार रामवीर के बिना ही जिले में चुनाव लड़ना होगा। ऐसे में उसकी डगर कठिन हो सकती है। संवाद
पार्टी पूरे दमखम से विधानसभा चुनाव लड़ेगी और तीनों सीटें जीतेगी। इसके लिए पार्टी ने काफी समय से तैयारी कर रखी है। प्रत्याशी भी आला नेतृत्व जल्द घोषित कर देगा। रामवीर उपाध्याय बसपा से निलंबित चल रहे हैं। उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।
-महेशबाबू कुशवाहा, जिलाध्यक्ष बसपा