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हाथरस : हाथरस सदर विधानसभा सीट पर सभी प्रमुख दलों की प्रतिष्ठा दांव पर

Mon, 07 Feb 2022 11:58 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 07 Feb 2022 11:58 PM IST
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Hathras: The reputation of all the major parties at stake in Hathras Sadar assembly seat
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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विधानसभा चुनाव में अब चंद दिन ही बचे हैं। बात यदि हाथरस विधानसभा सीट की करें तो इस सीट पर सभी प्रमुख दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। भाजपा इस सीट को फिर से जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन बसपा और सपा से उसे कड़ी चुनौती मिल रही है। अभी तक सपा ने इस सीट पर जीत का स्वाद नहीं चखा है। ऐसे में राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन के बाद सपा इस सीट पर इतिहास रचना चाह रही है तो बसपा भी सीट को जीतने के लिए एड़ी से लेकर चोटी तक जोर लगाए हुए है। कांग्रेस 37 साल से इस सीट पर अपना सूखा खत्म करने का प्रयास कर रही है।
हाथरस विधानसभा सीट का इतिहास देखें तो वर्ष 1952 से लेकर अभी तक इस सीट पर कांग्रेस ने सर्वाधिक छह बार जीत हासिल की है। वर्ष 1985 में आखिरी बार इस सीट पर कांग्रेस के नारायण हरि शर्मा चुनाव जीते थे। उसके बाद इस सीट पर आज तक कांग्रेस नहीं जीत पाई। इस सीट पर जनसंघ ने एक बार, जनता पार्टी ने दो बार, जनता दल ने भी दो बार जीत हासिल की।
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बसपा ने इस सीट पर लगातार चार बार जीत हासिल की। बसपा से रामवीर उपाध्याय इस सीट से वर्ष 1996, 2002 व 2007 में चुनाव जीते। इसके बाद वर्ष वर्ष 2012 में यह सीट बसपा के गेंदालाल चौधरी ने जीती, लेकिन पिछले चुनाव में बसपा के हाथ से यह सीट निकल गई। भाजपा ने पिछली बार 2017 में भाजपा ने यह सीट दूसरी बार जीती। वर्तमान विधायक हरीशंकर माहौर भाजपा से विधायक चुने गए। इससे पहले वर्ष 1993 में भाजपा से राजवीर सिंह पहलवान ने यह सीट जीती थी। इस बार भाजपा ने अपना प्रत्याशी बदल दिया है।
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सूत्रों की मानें तो पार्टी के अंदरूनी सर्वे पर वर्तमान विधायक हरीशंकर माहौर खरे नहीं उतरे और पार्टी ने आगरा की पूर्व मेयर अंजुला माहौर को प्रत्याशी बनाया है। सपा-रालोद गठबंधन के तहत यह सीट सपा के खाते में गई है। सपा ने यहां से बृजमोहन राही को मैदान में उतारा है। वह पिछला चुनाव इसी सीट से बसपा के टिकट पर लड़ चुके हैं और दूसरे स्थान पर आए थे। बसपा ने विजयगढ़ के नगर पंचायत अध्यक्ष संजीव कुमार काका पर दांव लगाया है तो कांग्रेस ने एक युवा कुलदीप कुमार को प्रत्याशी घोषित किया है। भाजपा इस सीट पर फिर से अपना कब्जा जमाना चाहती है, लेकिन बाहरी प्रत्याशी को टिकट देकर उसे अंदरूनी विरोध भी झेलना पड़ रहा है।

हालांकि शुरू में उठे भाजपा प्रत्याशी के विरोध के स्वर काफी शांत भी हो गए हैं और संगठन की मजबूती का लाभ प्रत्याशी को मिलने की आस है। सपा प्रत्याशी को उम्मीद है कि रालोद गठबंधन से उसकी जीत की नैया पार हो जाएगी। स्थानीय होना भी प्रत्याशी के लिए मददगार साबित होगा। बसपा को आस है कि यह उसके लिए पहले जिताऊ सीट रही है और उसे फिर इसी सीट पर सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सफलता मिलेगी। हालांकि पार्टी के पास इस चुनाव में रामवीर उपाध्याय जैसा मजबूत नेता नहीं है। वह भाजपा में जा चुके हैं। कांग्रेस इस सीट से पिछले 37 साल से जीत के लिए तरस रही है और उसे भी जीत की आस है। ऐसे में इस सीट पर रोचक मुकाबला होने की उम्मीद है। संवाद
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