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हाथरस : दल बदल का खेल, कोई हुआ पास तो कोई हुआ फेल
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
जिले में भी चुनाव के समय अक्सर नेता दल बदलते रहे हैं। यह बात अलग है कि जिले के कुछ नेताओं के लिए दल बदलना घाटे का सौदा साबित हुआ है तो कुछ नेताओं की किस्मत दल बदलने से चमकी भी है। कई नेता पाला बदलकर चुनाव जीत चुके हैं तो दल बदलकर चुनाव लड़ने वाले कई नेताओं को जनता नकार चुकी है। वैसे इस बार भी कई नेताओं ने दल बदला है और चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
बात यदि सदर विधायक हरीशंकर माहौर की करें तो सदर विधायक लगातार तीन बार भाजपा से विधायक चुने गए। वह वर्ष 1991, 1993, 1996 में भाजपा से सासनी सीट से निर्वाचित हुए। उसके बाद जब पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो माहौर ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था। कांग्रेस से चुनाव लड़कर माहौर को सफलता नहीं मिली और वह चुनाव हार गए थे। तदुपरांत उनकी भाजपा में घर वापसी हुई और तब वह चौथी बार वर्ष 2017 में भाजपा से ही विधायक चुने गए। जिले में लगातार पांच बार विधायक रहे पूर्व ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय वर्ष 1993 में भाजपा की हाथरस सीट से टिकट के प्रबल दावेदार थे, लेकिन जब उन्हें टिकट नहीं मिला तो वह निर्दलीय चुनाव लडे़।
उस समय वह तीसरे स्थान पर रहे। बाद में बसपा में शामिल होने बाद उनकी किस्मत चमकी और वह लगातार पांच बार बसपा से विधायक चुने गए। ऊर्जा व परिवहन मंत्री भी बने। इस बार उन्होंने भी बसपा को छोड़कर भाजपा का दामन थामा है। इसी तरह वर्ष 2007 और वर्ष 2012 में बसपा से चौधरी गेंदालाल विधायक बने, लेकिन जब वह दल बदल कर पिछला चुनाव वर्ष 2017 में राष्ट्रीय लोकदल से लड़े तो उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
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सिकंदराराऊ सीट से वर्ष 1996 और वर्ष 2007 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर विधानसभा में पहुंचे यशपाल सिंह चौहान ने वर्ष 2012 में जब दल बदला और सपा में शामिल होकर सपा से चुनाव लड़ा तो उन्हें भी मात खानी पड़ी। सादाबाद सीट पर डॉ. अनिल चौधरी वर्ष 2002 में सपा उम्मीदवार के रूप में जब चुनाव लड़े तो वह रालोद के प्रताप चौधरी के सामने चंद वोटोें से चुनाव हार गए, लेकिन इसके बाद वर्ष 2007 में जब वह रालोद में शामिल हो गए तो रालोद उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल हुई। इसी प्रकार वर्ष 2002 में सादाबाद सीट से रालोद से जीत हासिल करने वाले प्रताप चौधरी ने अगले चुनाव वर्ष 2007 में पाला बदला और वह कांग्रेस में चले गए। तब कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन उन्हें शिकस्त खानी पड़ी।
सादाबाद सीट से ही वर्ष 2001 में हुए उपचुनाव में रामसरन आर्य उर्फ लहटू ताऊ ने रालोद से चुनाव जीत लिया था। उन्होंने जब वर्ष 2002 के चुनाव में दल बदला, लेकिन उन्हें जीत हासिल नहीं हुई। दल बदल की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वर्ष 2007 में रालोद से हाथरस सीट से चुनाव लड़कर दूसरे स्थान पर आने वाले देवेंद्र अग्रवाल ने दल बदलकर जब सपा का दामन थामा और सादाबाद से वर्ष 2012 का चुनाव लड़ा तो उन्हें जीत हासिल हुई। जिले की राजनीति में कई और उदाहरण भी हैं। ऐसे में कुछ नेता दल बदलने के बाद विधायक नहीं बन सके तो कुछ अपना पिछला चुनाव हार गए, लेकिन जब दल बदला तो उस चुनाव को वह जीत गए। संवाद
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जिले में भी चुनाव के समय अक्सर नेता दल बदलते रहे हैं। यह बात अलग है कि जिले के कुछ नेताओं के लिए दल बदलना घाटे का सौदा साबित हुआ है तो कुछ नेताओं की किस्मत दल बदलने से चमकी भी है। कई नेता पाला बदलकर चुनाव जीत चुके हैं तो दल बदलकर चुनाव लड़ने वाले कई नेताओं को जनता नकार चुकी है। वैसे इस बार भी कई नेताओं ने दल बदला है और चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
बात यदि सदर विधायक हरीशंकर माहौर की करें तो सदर विधायक लगातार तीन बार भाजपा से विधायक चुने गए। वह वर्ष 1991, 1993, 1996 में भाजपा से सासनी सीट से निर्वाचित हुए। उसके बाद जब पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो माहौर ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था। कांग्रेस से चुनाव लड़कर माहौर को सफलता नहीं मिली और वह चुनाव हार गए थे। तदुपरांत उनकी भाजपा में घर वापसी हुई और तब वह चौथी बार वर्ष 2017 में भाजपा से ही विधायक चुने गए। जिले में लगातार पांच बार विधायक रहे पूर्व ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय वर्ष 1993 में भाजपा की हाथरस सीट से टिकट के प्रबल दावेदार थे, लेकिन जब उन्हें टिकट नहीं मिला तो वह निर्दलीय चुनाव लडे़।
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उस समय वह तीसरे स्थान पर रहे। बाद में बसपा में शामिल होने बाद उनकी किस्मत चमकी और वह लगातार पांच बार बसपा से विधायक चुने गए। ऊर्जा व परिवहन मंत्री भी बने। इस बार उन्होंने भी बसपा को छोड़कर भाजपा का दामन थामा है। इसी तरह वर्ष 2007 और वर्ष 2012 में बसपा से चौधरी गेंदालाल विधायक बने, लेकिन जब वह दल बदल कर पिछला चुनाव वर्ष 2017 में राष्ट्रीय लोकदल से लड़े तो उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
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सिकंदराराऊ सीट से वर्ष 1996 और वर्ष 2007 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर विधानसभा में पहुंचे यशपाल सिंह चौहान ने वर्ष 2012 में जब दल बदला और सपा में शामिल होकर सपा से चुनाव लड़ा तो उन्हें भी मात खानी पड़ी। सादाबाद सीट पर डॉ. अनिल चौधरी वर्ष 2002 में सपा उम्मीदवार के रूप में जब चुनाव लड़े तो वह रालोद के प्रताप चौधरी के सामने चंद वोटोें से चुनाव हार गए, लेकिन इसके बाद वर्ष 2007 में जब वह रालोद में शामिल हो गए तो रालोद उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल हुई। इसी प्रकार वर्ष 2002 में सादाबाद सीट से रालोद से जीत हासिल करने वाले प्रताप चौधरी ने अगले चुनाव वर्ष 2007 में पाला बदला और वह कांग्रेस में चले गए। तब कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन उन्हें शिकस्त खानी पड़ी।
सादाबाद सीट से ही वर्ष 2001 में हुए उपचुनाव में रामसरन आर्य उर्फ लहटू ताऊ ने रालोद से चुनाव जीत लिया था। उन्होंने जब वर्ष 2002 के चुनाव में दल बदला, लेकिन उन्हें जीत हासिल नहीं हुई। दल बदल की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वर्ष 2007 में रालोद से हाथरस सीट से चुनाव लड़कर दूसरे स्थान पर आने वाले देवेंद्र अग्रवाल ने दल बदलकर जब सपा का दामन थामा और सादाबाद से वर्ष 2012 का चुनाव लड़ा तो उन्हें जीत हासिल हुई। जिले की राजनीति में कई और उदाहरण भी हैं। ऐसे में कुछ नेता दल बदलने के बाद विधायक नहीं बन सके तो कुछ अपना पिछला चुनाव हार गए, लेकिन जब दल बदला तो उस चुनाव को वह जीत गए। संवाद