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हाथरस : कहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता नदारद तो कहीं नौनिहालों को भोजन तक नहीं

Tue, 05 Oct 2021 11:54 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 05 Oct 2021 11:54 PM IST
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Hathras: Somewhere the Anganwadi worker is absent and there is no food for the newbies
हाथरस : नगला धर्मा के आंगनबाड़ी केंद्र पर रखी टंकी और कूड़े की ट्रॉली और झाड़ू। संवाद - फोटो : HATHRAS
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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सरकार की योजना आंगनबाड़ी केंद्रों को प्री प्राइमरी के रूप में संचालित करने की है, जिससे निजी स्कूलों के प्री ग्रुप माड्यूल की बराबरी की जा सके। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय में बढ़ोतरी की गई है और उन्हें स्मार्ट फोन भी दिए गए हैं, लेकिन धरातल पर आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति इसके विपरीत है। मंगलवार को जब अमर उजाला की टीम ने आंगनबाड़ी केंद्रों का हाल देखा तो स्थिति बदहाल दिखी। मुरसान के नगला धर्मा का आंगनबाड़ी केंद्र वहीं सरकारी प्राथमिक स्कूल के एक कमरे में संचालित है। वहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में आमना बेगम तैनात हैं।
केंद्र पर आमना बेगम मौजूद नहीं मिलीं, जबकि सहायिका मोहरश्री मौजूद थीं। आंगनबाड़ी केंद्र पर कूड़ा उठाने की ट्राली और झाड़ू रखी थी। वहां अन्य कबाड़ा भी भरा था। पूछने पर खुद आंगनबाड़ी सहायिका ने बताया कि आमना बेगम पिछले महीने छह अगस्त को आई थीं और फिर एक माह बाद आज आई हैं। आज भी वह कुछ पोषाहार रखकर चली गई हैं। वह इस गांव की रहने वाली भी नहीं हैं और निकट के गांव खरगू की रहने वाली हैं। उनका यह भी कहना था कि इस केंद्र की कार्यकर्ता पर कई और केंद्रों के भी चार्ज हैं, इसलिए वह यहां पर्याप्त समय नहीं दे पातीं। बच्चे काफी समय से इस केंद्र पर नहीं आ रहे हैं।
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सहायिका का कहना था कि सुविधाएं न होने की वजह से गांव के लोग भी अब बच्चों को यहां नहीं भेजते। वह उन्हें गांव के ही निजी स्कूलों में भेज देते है। कुछ अन्य लोगों ने भी यही कहा कि महीनों यह आंगनबाड़ी केंद्र नहीं खुलता और कार्यकर्ता नहीं आतीं। इसकी वजह से यहां इस केंद्र का कोई मायने ही नहीं हैं। वैसे भी यहां बिजली की सुविधा नहीं है। इससे थोड़ी दूर गांव पटाखास स्थित आंगनबाड़ी केंद्र पर आठ-दस बच्चे मौजूद थे। वहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मुन्नी देवी और सहायिका मौजूद थीं। कुछ बच्चों को वह अक्षर ज्ञान दे रही थीं।
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पूछने पर दोनों ने बताया कि उनके केंद्र पर 61 बच्चे पंजीकृत हैं, लेकिन केंद्र पर केवल सात-आठ ही आ पाते हैं। दोनों इसी गांव की रहने वाली हैं। सहायिका बच्चों को घर से लाती हैं। केंद्र पर बच्चों के बैठने के लिए टाट पट्टी तक नहीं है। और तो और बच्चों को खाने में भी कुछ नहीं मिल रहा। उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में संचालित इस केंद्र में भी बिजली नहीं थी और वहां भी हाल बेहाल था। संवाद
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