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हाथरस : पुलिस कर्मियों को पढ़ाया गया टीबी रोग से बचने का पाठ
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हाथरस : पुलिस लाइन में आयोजित कार्यशाला में मौजूद पुलिसकर्मी।
- फोटो : HATHRAS
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
हाथरस पुलिस फैमिली वेलफेयर एसोसिएशन ‘वामा सारथी’ के बैनर तले जिला चिकित्सालय के डॉक्टरों की टीम द्वारा पुलिस लाइन में टीबी रोग के प्रति जागरूकता के लिए कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस मौके पर पुलिस कर्मियों को टीबी रोग से बचाव के लिए जागरूक किया गया।
डॉक्टरों ने पुलिसकर्मियों को बताया कि टीबी एक घातक संक्रामक बीमारी है, जो माइक्रोबैक्टीरिया (माइकोबैक्टीरियम तपेदिक) की वजह से होती है। टीबी (तपेदिक/क्षय रोग) आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है। साथ ही साथ यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित करता है। टीबी एक ऐसी खतरनाक बीमारी है, जिससे बचाव करना बहुत जरूरी है। डीटीओ डॉ. एएस वशिष्ठ ने बताया कि यह रोग किसी पीड़ित व्यक्ति के खांसने/छींकने या किसी अन्य प्रकार से हवा के माध्यम से पानी/लार की बूंदों से तेजी से फैलता है।
इस कारण इसको छुआछूत की बीमारी भी कहते हैं। इसका संक्रमण ज्यादातर स्पर्शोन्मुख और भीतरी होता है, लेकिन 10 में से एक रोगी भीतरी संक्रमण, अंतत: सक्रिय रोग में बदल जाते हैं। इनको अगर बिना उपचार किए छोड़ दिया जाए तो ऐसे संक्रमित लोगों में से 50 फीसदी से अधिक की मृत्यु हो जाती है। इसके लक्षण दो सप्ताह से अधिक खांसी आना, बलगम व बलगम में खून आना, बुखार आना, रात को पसीना आना, वजन कम होना व भूख न लगना आदि हैं। कार्यशाला में प्रतिसार निरीक्षक बिहारी सिंह यादव, स्वाथ्यकर्मी व पुलिसकर्मी मौजूद रहे।
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हाथरस पुलिस फैमिली वेलफेयर एसोसिएशन ‘वामा सारथी’ के बैनर तले जिला चिकित्सालय के डॉक्टरों की टीम द्वारा पुलिस लाइन में टीबी रोग के प्रति जागरूकता के लिए कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस मौके पर पुलिस कर्मियों को टीबी रोग से बचाव के लिए जागरूक किया गया।
डॉक्टरों ने पुलिसकर्मियों को बताया कि टीबी एक घातक संक्रामक बीमारी है, जो माइक्रोबैक्टीरिया (माइकोबैक्टीरियम तपेदिक) की वजह से होती है। टीबी (तपेदिक/क्षय रोग) आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है। साथ ही साथ यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित करता है। टीबी एक ऐसी खतरनाक बीमारी है, जिससे बचाव करना बहुत जरूरी है। डीटीओ डॉ. एएस वशिष्ठ ने बताया कि यह रोग किसी पीड़ित व्यक्ति के खांसने/छींकने या किसी अन्य प्रकार से हवा के माध्यम से पानी/लार की बूंदों से तेजी से फैलता है।
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इस कारण इसको छुआछूत की बीमारी भी कहते हैं। इसका संक्रमण ज्यादातर स्पर्शोन्मुख और भीतरी होता है, लेकिन 10 में से एक रोगी भीतरी संक्रमण, अंतत: सक्रिय रोग में बदल जाते हैं। इनको अगर बिना उपचार किए छोड़ दिया जाए तो ऐसे संक्रमित लोगों में से 50 फीसदी से अधिक की मृत्यु हो जाती है। इसके लक्षण दो सप्ताह से अधिक खांसी आना, बलगम व बलगम में खून आना, बुखार आना, रात को पसीना आना, वजन कम होना व भूख न लगना आदि हैं। कार्यशाला में प्रतिसार निरीक्षक बिहारी सिंह यादव, स्वाथ्यकर्मी व पुलिसकर्मी मौजूद रहे।
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