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हाथरस : मौसम बदलने से किसानों को सता रहा आलू की फसल बर्बाद होने का डर

Wed, 19 Jan 2022 12:03 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 19 Jan 2022 12:03 AM IST
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Hathras: Due to changing weather, farmers are afraid of ruining the potato crop
हाथरस : आलू की फसल में रोग की जानकारी लेते कृषि वैज्ञानिक। विज्ञप्ति - फोटो : HATHRAS
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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जिले में आलू की खेती बड़े पैमाने पर होती है। मौसम में हुए बदलाव से आलू में झुलसा रोग लगने की आशंका बढ़ गई है। इसे लेकर किसान काफी परेशान हैं। जिला कृषि अधिकारी ने किसानों को फसल को इस रोग से बचाने के लिए जरूरी सलाह दी है।
जिला कृषि अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि जिस तरह का मौसम पिछले दो तीन दिन से चल रहा है, उसमें आलू की फसल पर बीमारियों का प्रकोप होने की संभावना बढ़ गई है। यदि इस तरह का मौसम कुछ दिन और रहा तो आलू की फसल में तना सड़न, पिछैती झुलसा रोग के प्रकोप की आशंका बढ़ जाएगी। जिन किसानों ने आलू के बीज को दवाई से शोधन कर नहीं बोया है, उन खेतों में प्रकोप अधिक दिखाई देगा। ऐसे में पूरी फसल नष्ट होने की आशंका है। आलू की फसल में बीमारी के दो प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ने से पहले ही रसायन का छिड़काव करें। तने में सड़न होने के लक्षण पौधों के तने के उस भाग पर दिखाई देते हैं, जो भाग भूमि के संपर्क में रहता है। वहां सबसे पहले प्रकोप होता है। तना काला होकर सड़ जाता है। तने के आगे का भाग नष्ट हो जाता है।
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जिस फसल पर रोग का प्रकोप होता है, उन खेतों से दुर्गंध आती है। पिछैती झुलसा रोग पहले पत्तियों, डंठलों, कंदों और तनों पर लगता है। इस बीमारी के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों पर छोटे, हल्के पीले, हरे अनियमित आकार के धब्बों के रूप में दिखाई देते है। यह शीघ्र ही बढ़कर नीले धब्बे बनाते हैं या भूरे बैगनी धब्बे दिखाई देते हैं। बाद में पत्तियों के निचले भाग पर इन धब्बों के चारों ओर अंगूठीनुमा सफेद फफूंदी आ जाती है। रोकथाम में देर होने पर यह फफूंद कंद तक पहुंच जाती है और सड़न पैदा कर देती है। अधिक प्रकोप होने पर पूरा पौधा झुलस जाता है।
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उन्होेंने कहा है कि बीमारी के लिए अनुकूल मौसम होने पर सिंचाई बंद कर दें और 75 प्रतिशत पत्तियां नष्ट होने पर डंठलों को काटकर खेत से बाहर गड्ढे में दबा दें। लक्षण दिखाई देने से पूर्व स्टेप्टोसाइक्लीन और कापर ऑक्सी क्लोराइड या मैकोजेब 75 प्रतिशत (0.5 से 1.5 ग्राम और 1 से 1.500 किग्रा) को 750.1000 लीटर पानी में घोल कर एक हेक्टयर में आठ से 10 के अंतर पर तीन से चार छिड़काव करें। झुलसा का भयंकर प्रकोप होने पर मेटालेक्सिल युक्त दवाओं के 0.25 प्रतिशत घोल का 1 से 2 छिड़काव करें या टाइकोडर्मा और स्यूडोमोनास जैविक रसायन (दोनों की 1+1 किग्रा मात्रा को) पानी में घोलकर एक एकड़ में छिड़काव करें। संवाद
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