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हाथरस : पिछले बोर्ड में बहुमत लाने वाली बसपा को इस बार मिलीं केवल दो सीट
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
कभी पंचायत चुनाव में अपना परचम फहराने वाली बसपा की इस चुनाव में बेहद दुर्गति हुई है। पार्टी में चुनाव के दौरान उठापटक और निष्कासन चलता रहा। सूची बदली जाती रही। ऐनवक्त तक यही चलता रहा कि कौन पार्टी का असली प्रत्याशी है और कौन नकली। इसका परिणाम यह हुआ कि पिछले बोर्ड में बहुमत लाने वाली बसपा को इस बार केवल दो सीटें ही मिली हैं।
पंचायत चुनाव में बसपा ने हर बार इस जिले में शानदार प्रदर्शन किया है। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय भी इसकी मुख्य वजह रहे हैं। पिछली बार भी 25 में से बसपा समर्थित 13 प्रत्याशी जीते थे और सबसे पहले बसपा समर्थित विनोद उपाध्याय ही जिला पंचायत अध्यक्ष बने थे। इससे पहले सीमा उपाध्याय, रामवती बघेल, वीरेंद्र सिंह कुशवाहा भी बसपा के समर्थित उम्मीदवार के रूप में ही जिला पंचायत अध्यक्ष बने, लेकिन इस बार रामवीर उपाध्याय बसपा में नहीं हैं तो पार्टी को नुकसान हुआ।
वहीं पार्टी में ऐन वक्त तक आपस में खींचतान भी मचती रही। चुनाव से चार दिन पहले तक तीन जिलाध्यक्ष बदले गए। प्रत्याशियों के नाम तक बदले गए। लोग यही नहीं समझ पाए कि आखिर बसपा का समर्थित उम्मीदवार कौन है। ऐसे में पार्टी को महज वार्ड नंबर आठ और वार्ड संख्या 20 से जीत मिली है। वहां पार्टी समर्थित आरती जीत हासिल कर सकीं। अन्य स्थानों पर पार्टी परास्त हो गई। कई स्थानों पर तो टक्कर में भी नहीं रही।
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मुझे ऐन वक्त पर हाईकमान ने पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाया। उससे पहले पार्टी के जिलाध्यक्षों ने ऐसे लोगों की सूची जारी कर दी, जिनका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं था। ऐसे में पार्टी के समर्थित प्रत्याशियों के सामने अनाधिकृत प्रत्याशी भी झंडा और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करते रहे। जनता भ्रमित हो गई और इसकी वजह से पार्टी की केवल दो सीटें आई हैं। इसके लिए मुझसे पुराने जिला स्तरीय कुछ पदाधिकारी जिम्मेदार हैं।
-महेशबाबू कुशवाहा, जिलाध्यक्ष बसपा
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कभी पंचायत चुनाव में अपना परचम फहराने वाली बसपा की इस चुनाव में बेहद दुर्गति हुई है। पार्टी में चुनाव के दौरान उठापटक और निष्कासन चलता रहा। सूची बदली जाती रही। ऐनवक्त तक यही चलता रहा कि कौन पार्टी का असली प्रत्याशी है और कौन नकली। इसका परिणाम यह हुआ कि पिछले बोर्ड में बहुमत लाने वाली बसपा को इस बार केवल दो सीटें ही मिली हैं।
पंचायत चुनाव में बसपा ने हर बार इस जिले में शानदार प्रदर्शन किया है। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय भी इसकी मुख्य वजह रहे हैं। पिछली बार भी 25 में से बसपा समर्थित 13 प्रत्याशी जीते थे और सबसे पहले बसपा समर्थित विनोद उपाध्याय ही जिला पंचायत अध्यक्ष बने थे। इससे पहले सीमा उपाध्याय, रामवती बघेल, वीरेंद्र सिंह कुशवाहा भी बसपा के समर्थित उम्मीदवार के रूप में ही जिला पंचायत अध्यक्ष बने, लेकिन इस बार रामवीर उपाध्याय बसपा में नहीं हैं तो पार्टी को नुकसान हुआ।
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वहीं पार्टी में ऐन वक्त तक आपस में खींचतान भी मचती रही। चुनाव से चार दिन पहले तक तीन जिलाध्यक्ष बदले गए। प्रत्याशियों के नाम तक बदले गए। लोग यही नहीं समझ पाए कि आखिर बसपा का समर्थित उम्मीदवार कौन है। ऐसे में पार्टी को महज वार्ड नंबर आठ और वार्ड संख्या 20 से जीत मिली है। वहां पार्टी समर्थित आरती जीत हासिल कर सकीं। अन्य स्थानों पर पार्टी परास्त हो गई। कई स्थानों पर तो टक्कर में भी नहीं रही।
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मुझे ऐन वक्त पर हाईकमान ने पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाया। उससे पहले पार्टी के जिलाध्यक्षों ने ऐसे लोगों की सूची जारी कर दी, जिनका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं था। ऐसे में पार्टी के समर्थित प्रत्याशियों के सामने अनाधिकृत प्रत्याशी भी झंडा और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करते रहे। जनता भ्रमित हो गई और इसकी वजह से पार्टी की केवल दो सीटें आई हैं। इसके लिए मुझसे पुराने जिला स्तरीय कुछ पदाधिकारी जिम्मेदार हैं।
-महेशबाबू कुशवाहा, जिलाध्यक्ष बसपा