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हाथरस : काव्य मंचों पर रहता था बाबा निर्भय हाथरसी का जलवा

Wed, 13 Jul 2022 12:19 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 13 Jul 2022 12:19 AM IST
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Hathras: Baba Nirbhay Hathrasi used to live on poetry platforms
हाथरस : बाबा निर्भय हाथरसी का फाइल फोटो। संवाद - फोटो : HATHRAS
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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गुरुपूर्णिमा के दिन बाबा निर्भय हाथरसी की पुण्यतिथि है। दुनिया से अलविदा हुए बाबा निर्भय हाथरसी को 23 वर्ष हो गए। सरकार ने भले ही उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं दिया, लेकिन लोगों के दिलों में निर्भय हाथरसी अपनी कविताओं की बदौलत हमेशा जिंदा रहेंगे। आशु कविता के माध्यम से श्रोताओं को बांधे रखने की अनूठी कला बाबा निर्भय हाथरसी के पास थी। यही कारण था कि काव्य मंचों पर बाबा का जलवा कायम रहता था।
बताते हैं कि मंच पर बाबा निर्भय धाराप्रवाह काव्य पाठ करते थे। कितना भी विशाल मंच हो, उन्होंने कभी कागज या डायरी हाथ में लेकर काव्य पाठ नहीं किया। घंटों कविताएं पढ़ीं। उनकी कविताओं पर तालियां भी खूब गूंजती थीं। बाबा निर्भय को यह नहीं पता रहता था कि आखिर उन्होंने कौन सी कविता पढ़ी। जनता एक और की आवाज लगाती थी तो बाबा जनता की इस मांग को पूरा करते थे। सादाबाद के गांव एदलपुर में संवत 1987 में देवोत्थान एकादशी पर निर्भय हाथरसी का जन्म उनकी ननिहाल में हुआ था। उनका बचपन का नाम देवीदास था। उनके पिता गणेशीलाल उर्दू के शायर थे।
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एक बार वह शहर के दिल्ली वाला मोहल्ला में देवीदास कुएं में गिर गए थे और सही सलामत बाहर आ गए। तभी से उनके नाम के साथ निर्भय जुड़ गया। उन्होंने भगवा वस्त्र धारण किए। तंत्र विद्या के भी वह ज्ञानी थे। हिंदी, उर्दू भाषा का उन्हें पूरा ज्ञान था। उन्होंने दर्जनों कविताएं लिखीं। दैनिक व साप्ताहिक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। कई बार चुनावों में भी किस्मत आजमाई, लेकिन किसी चुनाव में उन्हें जीत हासिल नहीं हुई। राम मंदिर आंदोलन के समय उनकी जय-जय बजरंगी, हर-हर महादेव कविता खूब गूंजी। गुरुपूर्णिमा के दिन वर्ष 1999 में बाबा इस दुनिया से विदा हो गए। संवाद
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हिंदी के पुजारी बाबा निर्भय हाथरसी शब्द शिल्पी और रससिद्ध कवि थे। काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले बाबा निर्भय अपनी हाजिर जवाबी और आशु कविता के लिए हमेशा यादों में बने रहेंगे। बाबा काव्य मंचों पर वट वृक्ष कवि तो थे वह कुशल लेखक और पत्रकार भी थे। शहरवासियों को हमेशा उनकी याद आती है।

-विद्यासागर विकल, साहित्यकार
बाबा निर्भय हाथरसी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह जिस मंच पर काव्य पाठ करते थे, उनकी कविता आम जन मानस से जुड़ी होती थी। मंच से ही वह श्रोताओं की नब्ज भांप लेते थे कि वह क्या सुनना चाहते हैं। बाबा वास्तव में आशु कवि थे। बिना किसी डायरी के घंटों तक काव्य पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध रखने की जो कला बाबा निर्भय में थी, वह शायद ही किसी और कवि में हो।
-गोपाल चतुर्वेदी, साहित्यकार
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