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Hathras News: कागजों में कंचन, जमीन पर कचरा, शोपीस बने आरआरसी केंद्र
Sun, 05 Apr 2026 01:42 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Sun, 05 Apr 2026 01:42 AM IST
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कूड़ा से कंचन केंद्र का फोटो। संवाद
हाथरस/सादाबाद/बिसावर। स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांवों को कचरा मुक्त बनाने की योजना सादाबाद तहसील में दम तोड़ती नजर आ रही है। पंचायती राज विभाग जहां 104 में से 72 रिसोर्स रिकवरी सेंटर (आरआरसी) के क्रियाशील होने का दावा कर रहा है, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है।
जिन केंद्रों को कचरे से कंचन बनाना था, वे खुद कचरे और उपेक्षा के शिकार हो चुके हैं। कई केंद्रों पर महीनों से ताले लटके हैं, तो कहीं मशीनों की जगह घास और जंगली झाड़ियां उग आई हैं। नतीजतन, गांवों का कूड़ा सड़कों किनारे डंप किया जा रहा है, जिससे आवागमन तक प्रभावित हो रहा है।
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद न तो कचरे का निस्तारण हो पा रहा है और न ही ग्राम पंचायतों को इससे कोई आय हो रही है। कचरा निस्तारण केंद्र खुद निस्तारण की बाट जोह रहे हैं, यह हालात बयां करने के लिए काफी है। डीपीआरओ राकेश बाबू का कहना है कि सभी केंद्रों को क्रियाशील कराने की प्रक्रिया जारी है और जल्द ही कूड़े का निस्तारण शुरू कराया जाएगा।
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छह गांव में कहानी सिर्फ एक
केस-1: थरौरा (ब्लॉक सहपऊ) : करीब दो साल पहले बना केंद्र आज तक कचरा देखने को तरस रहा है। वर्मी कम्पोस्ट के लिए बने खांचे खाली पड़े हैं।
केस-2: करकौली (सादाबाद) : आठ लाख रुपये की लागत से बना केंद्र निष्क्रिय। कचरा अब भी सड़कों पर ही डंप हो रहा है।
केस-3: गुतहरा : केंद्र का उपयोग शुरू ही नहीं हुआ। परिसर में बने शौचालय भी क्षतिग्रस्त, देखरेख नदारद।
केस-4: कजरौठी (बिसावर) : केंद्र पर ताला, अंदर कचरे की जगह बग्गी खड़ी होती है। आज तक वर्मी कम्पोस्ट नहीं बना।
केस-5: मड़नई : चारों ओर गंदगी, केंद्र कभी क्रियाशील नहीं हुआ। गांव का कचरा सड़कों पर पड़ा रहता है।
केस-6: नगला ध्यान (कुरसंडा) : लाखों की लागत से बना केंद्र खुद कचरे में तब्दील होता जा रहा है।
बॉक्स : कहां अटका कचरे से कंचन का सपना
. केंद्रों का संचालन ठप
. कचरा संग्रहण व्यवस्था कमजोर
. निगरानी और मेंटेनेंस की कमी
. ग्राम पंचायत स्तर पर जवाबदेही का अभाव
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जिन केंद्रों को कचरे से कंचन बनाना था, वे खुद कचरे और उपेक्षा के शिकार हो चुके हैं। कई केंद्रों पर महीनों से ताले लटके हैं, तो कहीं मशीनों की जगह घास और जंगली झाड़ियां उग आई हैं। नतीजतन, गांवों का कूड़ा सड़कों किनारे डंप किया जा रहा है, जिससे आवागमन तक प्रभावित हो रहा है।
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करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद न तो कचरे का निस्तारण हो पा रहा है और न ही ग्राम पंचायतों को इससे कोई आय हो रही है। कचरा निस्तारण केंद्र खुद निस्तारण की बाट जोह रहे हैं, यह हालात बयां करने के लिए काफी है। डीपीआरओ राकेश बाबू का कहना है कि सभी केंद्रों को क्रियाशील कराने की प्रक्रिया जारी है और जल्द ही कूड़े का निस्तारण शुरू कराया जाएगा।
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छह गांव में कहानी सिर्फ एक
केस-1: थरौरा (ब्लॉक सहपऊ) : करीब दो साल पहले बना केंद्र आज तक कचरा देखने को तरस रहा है। वर्मी कम्पोस्ट के लिए बने खांचे खाली पड़े हैं।
केस-2: करकौली (सादाबाद) : आठ लाख रुपये की लागत से बना केंद्र निष्क्रिय। कचरा अब भी सड़कों पर ही डंप हो रहा है।
केस-3: गुतहरा : केंद्र का उपयोग शुरू ही नहीं हुआ। परिसर में बने शौचालय भी क्षतिग्रस्त, देखरेख नदारद।
केस-4: कजरौठी (बिसावर) : केंद्र पर ताला, अंदर कचरे की जगह बग्गी खड़ी होती है। आज तक वर्मी कम्पोस्ट नहीं बना।
केस-5: मड़नई : चारों ओर गंदगी, केंद्र कभी क्रियाशील नहीं हुआ। गांव का कचरा सड़कों पर पड़ा रहता है।
केस-6: नगला ध्यान (कुरसंडा) : लाखों की लागत से बना केंद्र खुद कचरे में तब्दील होता जा रहा है।
बॉक्स : कहां अटका कचरे से कंचन का सपना
. केंद्रों का संचालन ठप
. कचरा संग्रहण व्यवस्था कमजोर
. निगरानी और मेंटेनेंस की कमी
. ग्राम पंचायत स्तर पर जवाबदेही का अभाव