तीन करोड़ की आतिशबाजी राख
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खास बात यह रही कि इस बार आतिशबाजी बाजार में चीन के पटाखे न के बराबर ही दिखाई दिए। जो दिखे भी, वह पिछले साल के बचे हुए स्टॉक का हिस्सा थे। रकम निकालने की खातिर विक्रेताओं ने इन्हें अपनी दुकान पर सजाया और बेचने में भी सफल रहे। शहर में बागला कॉलेज के मैदान पर आतिशबाजी की करीब तीन दर्जन दुकानें लगी थीं। इसी तरह सादाबाद, सिकंदराराऊ, सासनी, हसायन, मेंडू, मुरसान, सहपऊ और पुरदिलनगर में भी आतिशबाजी की दुकानें लगाई गई थीं।
हर जगह 15 से 20 दुकानें आतिशबाजी बाजार में लगीं। दिवाली पर सुबह से ही इन दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ लगी रही और रात होते-होते उनका पूरा स्टॉक निपट गया। इस बार आतिशबाजी का पूरा कारोबार भारतीय ब्रांडेड आतिशबाजी के ही भरोसे रहा। 90 फीसदी तक चीन के माल से कारोबारियों ने परहेज किया। ग्राहकों ने भी चीन के पटाखों की मांग नहीं की।
पहले दिन आतिशबाजी की बिक्री काफी कम रही, लेकिन बाद में स्थिति में सुधार आया। अब तक ज्यादातर स्टॉक बिक गया। छोटे-मोटे आइटम ही रह गए हैं।
- प्रदर्शन शर्मा, अतिशबाजी विक्रेता
अबकी बार देसी आतिशबाजी का ज्यादा क्रेज रहा है। लोगों ने चीन के पटाखों का बहिष्कार किया। हमने भी चीन के आइटम न के बराबर ही बेचे हैं। क्योंकि देश ने एक राय होकर चीन के सामानों का बहिष्कार किया है।
- रवि पाठक, आतिशबाजी विक्रेता
- दिवाली पर पटाखे चलाने का रिवाज हम वर्षों से निभाते आ रहे हैं। साल में एक मौका आता है। इसे कैसे चूक सकते हैं, इसलिए खूब पटाखे खरीदे और धूम-धड़ाका भी किया। अबकी बार खूब आनंद लिया।
- गोल्डी, ग्राहक
दिवाली पर इस बार करोड़ों के पटाखे चले। खूब धूम-धड़ाका हुआ। पटाखे घर लाने के लिए आपने जरूर कुछ कीमत चुकाई होगी लेकिन क्या आपको पता है कि आपके पटाखों के कारण पर्यावरण को इस बार भी सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक इस बार दिवाली पर जिले में शोर तय मानकों से दो गुना ज्यादा रहा वहीं वायु प्रदूषण का स्तर मानकों से ढाई गुना ज्यादा पाया गया। पटाखे के कचरे से जल स्त्रोतों के प्रदूषित होने का भी खतरा रहता है। बोर्ड के अवर अभियंता उमेश चंद्र गुप्ता के मुताबिक सामान्य तौर पर दिन में 55 डेसीबल और रात के समय 45 डेसीबल शोर सामान्य माना जाता है। इससे ज्यादा शोर होने पर इसे ध्वनि प्रदूषण मान लिया जाता है।
दिवाली के समय यह दिन में 90 और रात के समय 95 डेसीबल तक पहुंच जाता है। वहीं वायु में सौ पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) एसपीएम (सस्पेंडेट पर्टिक्यूलर मैटर) तक सूक्ष्म कणों की मौजूदगी को सामान्य माना जाता है। दिवाली पर जिले में इसका स्तर 240 पीपीएम तक माना गया है। प्रदूषण का यह स्तर लोगों में तमाम बीमारियों का कारण भी बन सकता है। सबसे अहम बात यह है कि सेहत को नुकसान पहुंचाने के साथ ही साथ पर्यावरण को भी इसका खामियाजा झेलना होता है। जेई उमेश कुमार गुप्ता के मुताबिक एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण और दिवाली पर वहां हुई बेतहाशा आतिशबाजी का असर धीरे-धीरे आसपास जिलों के वायुमंडल पर पड़ेगा।
वह दिन भी ज्यादा दूर नहीं जब अलीगढ़ और हाथरस जैसे जिलों की फिजा भी एनसीआर के धुएं से जहरीली हो निकलेगी। हालांकि यह जानना भी जरूरी है कि हाथरस में प्रदूषण मापने का कोई यंत्र नहीं लगा है। उमेश कुमार गुप्ता के मुताबिक यह माना जाता है कि सभी शहरों के रिहाइशी इलाकों और कॉलोनियों में होने वाला शोर समान होता है। इसलिए अलीगढ़ में रिहाइशी इलाकों और कॉलोनियों में शोर का जो स्तर है, उसे ही हाथरस के रिहाइशी इलाकों में शोर के बराबर माना गया है।
अलीगढ़ में दिवाली पर वायु प्रदूषण तीन गुना तक बढ़ जाता है। चूंकि हाथरस आबादी के हिसाब से छोटा जिला है, इसलिए वहां इस स्तर को ढाई गुना तक मान लिया जाता है। गुप्ता ने यह भी बताया कि वह हाथरस में प्रदूषण मापक यंत्र लगवाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। उनकी कोशिश शहर के प्रमुख चौराहों के आसपास होने वाले प्रदूषण को मापने की है।