{"_id":"6a5e88ec63910039dd012bb8","slug":"devotees-will-swing-kanha-in-cradles-made-in-hathras-hathras-news-c-56-1-hts1003-151640-2026-07-21","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hathras News: हाथरस में बने पालनों में कान्हा को झुलाएंगे भक्त","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hathras News: हाथरस में बने पालनों में कान्हा को झुलाएंगे भक्त
Tue, 21 Jul 2026 02:15 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Tue, 21 Jul 2026 02:15 AM IST
विज्ञापन
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के त्योहार से पहले शहर के कारीगर भगवान श्रीकृष्ण के लिए पीतल के आकर्षक पालने और झूले तैयार करने में जुटे हैं। हाथों से की गई महीन नक्काशी और पारंपरिक डिजाइन वाले ये पालने न केवल ब्रज क्षेत्र, बल्कि महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में भेजे जा रहे हैं।
कारोबारियों के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस बार मांग में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। हाथरस लंबे समय से पीतल और धातु हस्तशिल्प के लिए जाना जाता है। यहां तैयार होने वाले कान्हा के झूले अपनी मजबूत बनावट, आकर्षक नक्काशी और पारंपरिक डिजाइन के कारण बाजार में अलग पहचान रखते हैं।
जन्माष्टमी से करीब डेढ़ माह पहले ही इन्हें तैयार करने का काम शुरू हो जाता है और त्योहार से लगभग 15 दिन पहले तक अधिकांश माल दूर-दराज के शहरों में भेज दिया जाता है। शहर के बर्फखाना, गली वृंदावन, रेवाड़पुरा, चमन गली, ढकपुरा और वाटर वर्क्स क्षेत्र में कांस्यकार समाज के कई परिवार इस सीजनल कारोबार से जुड़े हुए हैं।
विज्ञापन
घरों और छोटी-छोटी कार्यशालाओं में कारीगर सुबह से देर रात तक पालनों को आकार देने, नक्काशी करने, पॉलिश करने और पैकिंग करने में व्यस्त हैं। कारोबारियों के अनुसार इस बार 200 ग्राम से लेकर सवा किलो तक वजन वाले पीतल के पालनों की मांग सबसे अधिक है।
पालनों पर मोर, बांसुरी, कमल, बेल-बूटों और पारंपरिक धार्मिक आकृतियों की नक्काशी की जा रही है। कई झूलों में रंगीन स्टोन, घंटियां और सजावटी चेन भी लगाई जा रही हैं, जिनसे उनकी खूबसूरती और बढ़ जाती है।
एक से दो दिन का लगता है समय
कारीगरों के अनुसार एक पालना तैयार करने में उसके आकार और डिजाइन के अनुसार कई घंटे से लेकर एक-दो दिन तक का समय लग जाता है। पहले धातु को ढालकर आकार दिया जाता है, फिर हाथ से नक्काशी, पॉलिश और फिनिशिंग का काम किया जाता है। यही हस्तनिर्मित कला हाथरस के पालनों को बाजार में अलग पहचान दिलाती है।
200 से 2000 रुपये तक बाजार में कीमत
थोक बाजार में पालनों की कीमत वजन और डिजाइन के अनुसार तय होती है, जबकि खुदरा बाजार में इनकी कीमत करीब 200 रुपये से लेकर 2000 रुपये या उससे अधिक तक पहुंच रही है। विशेष नक्काशी और बड़े आकार के पालनों की मांग मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में अधिक रहती है।
एक हजार लोगों को मिल रहा रोजगार
जन्माष्टमी का सीजन हाथरस के मेटल हैंडीक्राफ्ट कारोबार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान कारीगरों, पॉलिश करने वाले श्रमिकों, पैकिंग कर्मियों और व्यापारियों सहित करीब एक हजार लोगों को रोजगार मिलता है।
पिछले करीब एक माह से हमारे यहां पालना तैयार किए जा रहे हैं। जन्माष्टमी पर देशभर के मंदिरों और घरों में ठाकुरजी को इन्हीं पालनों में विराजमान कर झुलाया जाता है। इस समय पूरा परिवार इस कार्य में जुटा हुआ है।
-प्रवीण कुमार वर्मा, निर्माता
सबसे अधिक माल मथुरा और वृंदावन भेजा जाता है, लेकिन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों से भी लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं। कई व्यापारी पहले से ही बुकिंग करा चुके हैं और निर्धारित समय पर आपूर्ति की जा रही है।
-रजत वर्मा, निर्माता
विज्ञापन
कारोबारियों के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस बार मांग में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। हाथरस लंबे समय से पीतल और धातु हस्तशिल्प के लिए जाना जाता है। यहां तैयार होने वाले कान्हा के झूले अपनी मजबूत बनावट, आकर्षक नक्काशी और पारंपरिक डिजाइन के कारण बाजार में अलग पहचान रखते हैं।
विज्ञापन
जन्माष्टमी से करीब डेढ़ माह पहले ही इन्हें तैयार करने का काम शुरू हो जाता है और त्योहार से लगभग 15 दिन पहले तक अधिकांश माल दूर-दराज के शहरों में भेज दिया जाता है। शहर के बर्फखाना, गली वृंदावन, रेवाड़पुरा, चमन गली, ढकपुरा और वाटर वर्क्स क्षेत्र में कांस्यकार समाज के कई परिवार इस सीजनल कारोबार से जुड़े हुए हैं।
विज्ञापन
घरों और छोटी-छोटी कार्यशालाओं में कारीगर सुबह से देर रात तक पालनों को आकार देने, नक्काशी करने, पॉलिश करने और पैकिंग करने में व्यस्त हैं। कारोबारियों के अनुसार इस बार 200 ग्राम से लेकर सवा किलो तक वजन वाले पीतल के पालनों की मांग सबसे अधिक है।
पालनों पर मोर, बांसुरी, कमल, बेल-बूटों और पारंपरिक धार्मिक आकृतियों की नक्काशी की जा रही है। कई झूलों में रंगीन स्टोन, घंटियां और सजावटी चेन भी लगाई जा रही हैं, जिनसे उनकी खूबसूरती और बढ़ जाती है।
एक से दो दिन का लगता है समय
कारीगरों के अनुसार एक पालना तैयार करने में उसके आकार और डिजाइन के अनुसार कई घंटे से लेकर एक-दो दिन तक का समय लग जाता है। पहले धातु को ढालकर आकार दिया जाता है, फिर हाथ से नक्काशी, पॉलिश और फिनिशिंग का काम किया जाता है। यही हस्तनिर्मित कला हाथरस के पालनों को बाजार में अलग पहचान दिलाती है।
200 से 2000 रुपये तक बाजार में कीमत
थोक बाजार में पालनों की कीमत वजन और डिजाइन के अनुसार तय होती है, जबकि खुदरा बाजार में इनकी कीमत करीब 200 रुपये से लेकर 2000 रुपये या उससे अधिक तक पहुंच रही है। विशेष नक्काशी और बड़े आकार के पालनों की मांग मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में अधिक रहती है।
एक हजार लोगों को मिल रहा रोजगार
जन्माष्टमी का सीजन हाथरस के मेटल हैंडीक्राफ्ट कारोबार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान कारीगरों, पॉलिश करने वाले श्रमिकों, पैकिंग कर्मियों और व्यापारियों सहित करीब एक हजार लोगों को रोजगार मिलता है।
पिछले करीब एक माह से हमारे यहां पालना तैयार किए जा रहे हैं। जन्माष्टमी पर देशभर के मंदिरों और घरों में ठाकुरजी को इन्हीं पालनों में विराजमान कर झुलाया जाता है। इस समय पूरा परिवार इस कार्य में जुटा हुआ है।
-प्रवीण कुमार वर्मा, निर्माता
सबसे अधिक माल मथुरा और वृंदावन भेजा जाता है, लेकिन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों से भी लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं। कई व्यापारी पहले से ही बुकिंग करा चुके हैं और निर्धारित समय पर आपूर्ति की जा रही है।
-रजत वर्मा, निर्माता