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Hathras News: आयकर रिटर्न जमा कराने में जुटे सीए और अधिवक्ता
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प्रतीकात्मक चित्र।
- फोटो : Archive
वर्ष 2026-27 के आयकर रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तिथि नजदीक आ रही है। चार्टर्ड अकाउंटेंट और कर अधिवक्ता कारोबारियों व नौकरीपेशा लोगों की आयकर विवरणी तैयार करने में जुट गए हैं। कार्यालयों में दस्तावेजों की जांच, आय-व्यय का मिलान और रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया चल रही है।
इस वर्ष आयकर विभाग ने अलग-अलग श्रेणी के करदाताओं के लिए अलग-अलग अंतिम तिथियां निर्धारित की हैं। वेतनभोगी तथा गैर-व्यावसायिक आय वाले करदाताओं को 31 जुलाई तक आयकर विवरणी दाखिल करनी है। वहीं व्यवसाय से आय अर्जित करने वाले करदाताओं को 31 अगस्त तक का समय दिया गया है। जिन कारोबारियों के खाते आयकर अधिनियम की धारा 44-एबी के तहत ऑडिट के दायरे में आते हैं, उन्हें 31 अक्तूबर तक रिटर्न दाखिल करना होगा।
समय सीमा के बाद रिटर्न दाखिल करने पर पांच लाख रुपये तक की आय वालों को एक हजार रुपये तथा इससे अधिक आय वालों को पांच हजार रुपये तक विलंब शुल्क देना पड़ सकता है।
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चार्टर्ड अकाउंटेंट लोकेश अग्रवाल ने बताया कि इस बार नई कर व्यवस्था डिफॉल्ट है। प्रत्येक करदाता को अपनी आय और उपलब्ध छूटों का आकलन करने के बाद ही नई या पुरानी कर व्यवस्था का चयन करना चाहिए। चार्टर्ड अकाउंटेंट मनीष टालीवाल ने बताया कि कारोबारियों को जीएसटी, टीडीएस, बैंक खातों और अन्य वित्तीय अभिलेखों का मिलान करने के बाद ही आयकर विवरणी दाखिल करनी चाहिए।
नई और पुरानी कर व्यवस्था को समझें
आकलन वर्ष 2026-27 के लिए आयकर विवरणी भरते समय नई कर व्यवस्था स्वतः लागू मानी जाएगी। यदि करदाता कोई विकल्प नहीं चुनता है तो उसका रिटर्न नई व्यवस्था के अनुसार माना जाएगा। जिन लोगों के पास अधिक कर छूट के दावे नहीं हैं, उनके लिए नई व्यवस्था लाभदायक है। वहीं जिनके पास निवेश, बीमा, गृह ऋण सहित विभिन्न छूट के विकल्प हैं, उन्हें दोनों व्यवस्थाओं की तुलना कर निर्णय लेना चाहिए।
पुरानी व्यवस्था में छूट का लाभ
पुरानी कर व्यवस्था में ढाई लाख रुपये तक की आय पर कोई कर नहीं है। पांच लाख रुपये तक की कर योग्य आय पर धारा 87-ए के तहत 12,500 रुपये तक की कर छूट मिलती है। इस व्यवस्था में धारा 80-सी, 80-डी, गृह किराया भत्ता तथा अन्य कई निवेश आधारित छूटों का लाभ मिलता है। जिन करदाताओं के पास पर्याप्त निवेश हैं, वे पुरानी व्यवस्था का विकल्प चुनकर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
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इस वर्ष आयकर विभाग ने अलग-अलग श्रेणी के करदाताओं के लिए अलग-अलग अंतिम तिथियां निर्धारित की हैं। वेतनभोगी तथा गैर-व्यावसायिक आय वाले करदाताओं को 31 जुलाई तक आयकर विवरणी दाखिल करनी है। वहीं व्यवसाय से आय अर्जित करने वाले करदाताओं को 31 अगस्त तक का समय दिया गया है। जिन कारोबारियों के खाते आयकर अधिनियम की धारा 44-एबी के तहत ऑडिट के दायरे में आते हैं, उन्हें 31 अक्तूबर तक रिटर्न दाखिल करना होगा।
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समय सीमा के बाद रिटर्न दाखिल करने पर पांच लाख रुपये तक की आय वालों को एक हजार रुपये तथा इससे अधिक आय वालों को पांच हजार रुपये तक विलंब शुल्क देना पड़ सकता है।
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चार्टर्ड अकाउंटेंट लोकेश अग्रवाल ने बताया कि इस बार नई कर व्यवस्था डिफॉल्ट है। प्रत्येक करदाता को अपनी आय और उपलब्ध छूटों का आकलन करने के बाद ही नई या पुरानी कर व्यवस्था का चयन करना चाहिए। चार्टर्ड अकाउंटेंट मनीष टालीवाल ने बताया कि कारोबारियों को जीएसटी, टीडीएस, बैंक खातों और अन्य वित्तीय अभिलेखों का मिलान करने के बाद ही आयकर विवरणी दाखिल करनी चाहिए।
नई और पुरानी कर व्यवस्था को समझें
आकलन वर्ष 2026-27 के लिए आयकर विवरणी भरते समय नई कर व्यवस्था स्वतः लागू मानी जाएगी। यदि करदाता कोई विकल्प नहीं चुनता है तो उसका रिटर्न नई व्यवस्था के अनुसार माना जाएगा। जिन लोगों के पास अधिक कर छूट के दावे नहीं हैं, उनके लिए नई व्यवस्था लाभदायक है। वहीं जिनके पास निवेश, बीमा, गृह ऋण सहित विभिन्न छूट के विकल्प हैं, उन्हें दोनों व्यवस्थाओं की तुलना कर निर्णय लेना चाहिए।
पुरानी व्यवस्था में छूट का लाभ
पुरानी कर व्यवस्था में ढाई लाख रुपये तक की आय पर कोई कर नहीं है। पांच लाख रुपये तक की कर योग्य आय पर धारा 87-ए के तहत 12,500 रुपये तक की कर छूट मिलती है। इस व्यवस्था में धारा 80-सी, 80-डी, गृह किराया भत्ता तथा अन्य कई निवेश आधारित छूटों का लाभ मिलता है। जिन करदाताओं के पास पर्याप्त निवेश हैं, वे पुरानी व्यवस्था का विकल्प चुनकर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।