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जाति से ऊपर उठकर चुना विधायक
ब्यूूूराे, अमर उजाला, हाथ्ारस
Updated Wed, 18 Jan 2017 11:38 PM IST
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क्षत्रिय बहुल सिकंदराराऊ विधानसभा सीट पर मतदाताओं ने ज्यादातर क्षत्रिय प्रत्याशियों को विधानसभा पहुंचाया पर कई बार यहां जातीय समीकरणों को झुठलाकर प्रत्याशी अपनी शख्सियत के सहारे भी उम्मीदवार लखनऊ पहुंचने में कामयाब रहे। शुरू में यहां से चार मर्तबा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नेकराम शर्मा ने अपनी दमदार शख्सियत के आधार पर जीत हासिल की थी। इसके बाद तीन बार क्षत्रिय समाज के सुरेश प्रताप गांधी विधायक चुने गए।
दो बार क्षत्रिय समाज के ही यशपाल चौहान विधायक रह चुके हैं। दो बार यहां से अमर सिंह यादव विधायक रहे हैं तो वैश्य वर्ग के जगदीश गांधी, मुस्लिम समाज के फरजंद अली बेग और 2012 के चुनाव में ब्राह्मण समाज के रामवीर उपाध्याय भी चुनाव जीतने में सफल हो चुके हैं।
शुरू में यहां से चार बार लगातार नेकराम शर्मा 1952 से 1976 तक विधायक रहे। उनका तिलस्म वैश्य वर्ग के जगदीश गांधी ने 1969 में तोड़ा। जगदीश गांधी ने दलितों के पैर छूकर, उनके साथ खाना खाकर और हर किसी से हाथ मिलाकर छूआछूत के खिलाफ मुहिम छेड़ी। इसका फायदा उन्हें चुनाव में मिला और वह विधायक चुने गए।
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उसके पश्चात प्रदेश में भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) का उदय हुआ तथा उससे सूफियाना प्रवृत्ति के फरजंद अली बेग चुनाव लड़े। बेग का बेबाक व्यवहार और खड़ी बोली में बात करना जनता को खूब रास आया। सिकंदराराऊ की जनता ने बेग को विधायक बना दिया।
आपातकाल में हुए चुनाव में जनता पार्टी की लहर के चलते एक बार फिर क्षत्रिय समाज के नेम सिंह चौहान विधायक बने। उसके पश्चात सन 1980 में वीर बहादुर सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में चुनाव हुए तो पुष्पा चौहान विधायक बनीं। दोबारा बिरादरीवाद की हवा चली तो सुरेश प्रताप गांधी लगातार तीन मर्तबा 1985, 1989 और 1991 में विधायक चुने गए।
1993 में प्रदेश में मुलायम सिंह, कांशीराम और मायावती के नाम की हवा चलने लगी। सपा-बसपा गठबंधन से अलीगढ़ के नगला देवी निवासी अमर सिंह यादव जीत गए। इसके बाद युवा प्रत्याशी के रूप में भाजपा से 1996 में यशपाल सिंह चौहान विधायक बने। भाजपा सरकार के दौरान ब्लॉक प्रमुख चुनाव में हुए बवाल में अमरसिंह यादव पर एनएसए लगी।
वे 11 माह तक जेल में रहे। रिहा होने के पश्चात अमर सिंह को सहानुभूति का फायदा मिला और 2002 में वह निर्दलीय विधायक चुन लिए गए। 2007 मेें यशपाल सिंह चौहान पुन: भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और विधायक चुने गए। 2012 के चुनाव में यशपाल ने सपा का दामन थामा। उनका मुकाबला पूर्व मंत्री बसपा के रामवीर उपाध्याय से हुआ। उपाध्याय चुनाव जरूर जीत गए, लेकिन उन्हें इस जीत की खातिर नाकों चने चबाने पड़ गए। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई।
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दो बार क्षत्रिय समाज के ही यशपाल चौहान विधायक रह चुके हैं। दो बार यहां से अमर सिंह यादव विधायक रहे हैं तो वैश्य वर्ग के जगदीश गांधी, मुस्लिम समाज के फरजंद अली बेग और 2012 के चुनाव में ब्राह्मण समाज के रामवीर उपाध्याय भी चुनाव जीतने में सफल हो चुके हैं।
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शुरू में यहां से चार बार लगातार नेकराम शर्मा 1952 से 1976 तक विधायक रहे। उनका तिलस्म वैश्य वर्ग के जगदीश गांधी ने 1969 में तोड़ा। जगदीश गांधी ने दलितों के पैर छूकर, उनके साथ खाना खाकर और हर किसी से हाथ मिलाकर छूआछूत के खिलाफ मुहिम छेड़ी। इसका फायदा उन्हें चुनाव में मिला और वह विधायक चुने गए।
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उसके पश्चात प्रदेश में भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) का उदय हुआ तथा उससे सूफियाना प्रवृत्ति के फरजंद अली बेग चुनाव लड़े। बेग का बेबाक व्यवहार और खड़ी बोली में बात करना जनता को खूब रास आया। सिकंदराराऊ की जनता ने बेग को विधायक बना दिया।
आपातकाल में हुए चुनाव में जनता पार्टी की लहर के चलते एक बार फिर क्षत्रिय समाज के नेम सिंह चौहान विधायक बने। उसके पश्चात सन 1980 में वीर बहादुर सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में चुनाव हुए तो पुष्पा चौहान विधायक बनीं। दोबारा बिरादरीवाद की हवा चली तो सुरेश प्रताप गांधी लगातार तीन मर्तबा 1985, 1989 और 1991 में विधायक चुने गए।
1993 में प्रदेश में मुलायम सिंह, कांशीराम और मायावती के नाम की हवा चलने लगी। सपा-बसपा गठबंधन से अलीगढ़ के नगला देवी निवासी अमर सिंह यादव जीत गए। इसके बाद युवा प्रत्याशी के रूप में भाजपा से 1996 में यशपाल सिंह चौहान विधायक बने। भाजपा सरकार के दौरान ब्लॉक प्रमुख चुनाव में हुए बवाल में अमरसिंह यादव पर एनएसए लगी।
वे 11 माह तक जेल में रहे। रिहा होने के पश्चात अमर सिंह को सहानुभूति का फायदा मिला और 2002 में वह निर्दलीय विधायक चुन लिए गए। 2007 मेें यशपाल सिंह चौहान पुन: भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और विधायक चुने गए। 2012 के चुनाव में यशपाल ने सपा का दामन थामा। उनका मुकाबला पूर्व मंत्री बसपा के रामवीर उपाध्याय से हुआ। उपाध्याय चुनाव जरूर जीत गए, लेकिन उन्हें इस जीत की खातिर नाकों चने चबाने पड़ गए। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई।