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Hathras News: डरते-डरते की शुरुआत, मुनाफे ने खोला आलू किसानों की तरक्की का रास्ता

Sat, 30 May 2026 01:08 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 30 May 2026 01:08 AM IST
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A Hesitant Start: Profits Pave the Way for Potato Farmers' Prosperity
कैरिश्मा आलू का ढेर। स्रोत : स्वयं - फोटो : Self
कृषि जगत में बदलाव की बयार बह रही है। हाथरस के किसान अब पारंपरिक आलू की बजाय नई किस्मों की ओर बढ़ रहे हैं। शुरू में डर और संकोच के बीच आलू की विदेशी किस्में कैरिश्मा और विनर की बुवाई करने वाले किसानों के लिए यह किस्में मुनाफे का सौदा बन गई है। होटल उद्योग, चिप्स कंपनियों और फ्रोजन फूड यूनिट्स में इनकी लगातार मांग बनी हुई है। स्टार्च फैक्टरियां और बड़े थोक बाजार भी इनकी खरीद में रुचि दिखा रहे हैं।
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उद्यान विभाग के अनुसार 50 बीघा में कैरिश्मा और 150 बीघा में विनर की खेती की जा रही है। प्रगतिशील किसान विपिन चौधरी ने बताया कि कैरिश्मा और विनर होटल उद्योग क्षेत्र के कड़े मानकों को पूरी तरह से पूरा करती हैं। उन्होंने बताया कि भविष्य उसी किसान का है जो बाजार की जरूरत समझकर खेती करेगा।
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किसान गंभीर सिंह ने बताया कि शुरुआत में डरते-डरते सीमित क्षेत्र में कैरिश्मा आलू का प्रयोग किया था। उन्हें उम्मीद से बेहतर परिणाम मिले, जिससे उत्साहित होकर वह खेती का दायरा बढ़ा रहे हैं। जिला उद्यान अधिकारी सुनील कुमार ने बताया कि आलू की नई-नई किस्में किसान बो रहे हैं। अब जल्द ही नई-नई प्रजातियां आलू की अन्य जनपदों व प्रदेश के बाहर तक जाएंगी।
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समय के साथ बदल रहे किसान
कुछ वर्षों पहले तक किसान घरेलू खपत और सामान्य मंडी व्यापार के लिए आलू उगाते थे। एलआर और चिप्सोना जैसी किस्में कंपनियों की पसंद थीं। अब प्रसंस्करण क्षेत्र की तकनीक और मांग में व्यापक बदलाव आया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां और खाद्य श्रृंखलाएं अधिक शुष्क तत्व और कम पानी वाली किस्मों को प्राथमिकता दे रही हैं। यह बदलाव किसानों के लिए निर्यात के नए द्वार खोल रहा है। किसान नई-नई किस्मों की खेती को अपना रहे हैं।




कैरिश्मा आलू की विशेषताएं
यह एक लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाली गैर-जीएमओ प्रजाति है। इसे नीदरलैंड के पारंपरिक बीजों से विकसित कर भारतीय जलवायु के अनुकूल ढाला गया है। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स लगभग 53 होता है, जो आम आलू से काफी कम है। यह शरीर में ब्लड शुगर को तेजी से नहीं बढ़ाता, जिससे यह मधुमेह रोगियों के लिए सुरक्षित है। कम स्टार्च के कारण यह खाने में कम मीठा और स्वादिष्ट होता है। यह उबालने, बेक करने, भूनने या एयर-फ्राई करने पर अपना आकार नहीं खोता।




विनर की विशेषताएं
आलू की इस किस्म की उत्पादन क्षमता पारंपरिक किस्मों की तुलना में 25 फीसदी से 30 फीसदी अधिक होती है। इसकी औसत पैदावार 350 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक देखी गई है। यह मध्यम से पछेती श्रेणी की फसल है, जो लगभग 90 से 110 दिनों में तैयार होती है। इसमें कई वायरसों के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता पाई जाती है।





भारत में विकसित किस्में भी प्रतिद्वंद्विता में
आलू अनुसंधान संस्थान ने कैरिश्मा के विकल्प के तौर पर कुफरी चिप्सोना श्रृंखला की चार किस्में विकसित की है। इनमें भी शुगर की मात्रा बहुत कम और ड्राई मैटर (21% से अधिक) ज्यादा होता है, इसके अलावा चिप भारत प्रजाति भी विकसित की गई है। विनर के विकल्प के तौर पर कुफरी पुखराज हाथरस बेल्ट में बहुत लोकप्रिय है। यह बहुत कम समय 70 से 80 दिन में तैयार होकर बंपर पैदावार देती है, जिससे किसान अगली फसल जल्दी ले सकते हैं। इसके अलावा कुफरी ख्याति, कुफरी तेजस किस्में भी तैयार की गई है।
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