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सुविधाओं की कमी से सिकुड़ गया कॉटन उद्योग
Hathras
Updated Sat, 08 Mar 2014 05:30 AM IST
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हाथरस। कॉटन और उससे जुड़ा उद्योग यहां दम तोड़ता जा रहा है। किसी समय में इस शहर में चार कॉटन मिल थे और हजारों लोग इन मिलों से जुड़े थे, लेकिन उसके बाद यह उद्योग यहां पिछड़ता चला गया। कभी इन मिलों में ट्रेनें जाती थीं, लेकिन अब यहां न ट्रांसपोर्टेशन के साधन हैं और न ही पर्याप्त बिजली उद्यमियों को मिलती है। हालत यह है कि कॉटन से जुड़े कारोबारी कॉटन यार्न, हैंडलूम, पावरलूम के कारोबारी इस उद्योग को समेटने में लगे हैं।
कई बड़े कॉटन मिल थे शहर में
कानपुर के बाद उद्योगों के मामले में दूसरा स्थान रखने वाली हाथरस नगरी का कॉटन उद्योग काफी मशहूर था। इसकी वजह यह थी कि यहां आसपास कपास की खेती होती थी। कपास से कॉटन मिलों में रूई बनती थी और फिर रूई का तरह-तरह से प्रयोग होता था। शहर में नया मिल, पुराना मिल, बिजली कॉटन मिल आदि प्रमुख मिल थे। कुछ मिल जब बंद हो गए थे तो उसके बाद घाटे से उबारने के लिए सरकार के हथकरघा निगम ने बिजली कॉटन मिल को टेकओवर भी कर लिया, फिर भी यह मिल घाटे में चलता रहा। आखिर में डेढ़ दशक पहले इसमें ताले लग गए।
विदेशों में भी होता है माल का निर्यात
इस दौरान यहां उद्यमियों ने अपनी फैक्ट्रियां डालना शुरू कर दिया। कॉटन यार्न, हैंडलूम और पावरलूम की फैक्ट्रियों की यहां शुरुआत हो गई। रूई को मंगाकर यहां धागा तैयार होता है। पावरलूम फैक्ट्रियों में धागों से खेस और चादर सहित अन्य तरह के कपड़े आदि तैयार होते हैं। हैंडलूम फैक्ट्रियों में गलीचा, दरी, बाथमेट्स आदि तैयार होता है। हैंडलूम की कई बड़ी फैक्ट्रियां यहां हैं और यहां से माल का निर्यात भी कई देशों को होता है।
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बिजली संकट और ट्रंासपोर्टेशन का अभाव
कॉटन यार्न, पावरलूम आदि फैक्ट्रियों में कच्चा माल पानीपत, दिल्ली सहित अन्य इलाकों से आता है। पावरलूम माल की देश की काफी इलाकों में खपत है, जबकि काटन यार्न भी शहर और दूर-दूर की फैक्ट्रियों को भेजा जाता है। इस समय इस उद्योग पर कई समस्याएं हावी हैं। मुख्य समस्या बिजली की कटौती और ट्रांसपोर्टेशन की सुविधा का अभाव है। लेबर की कमी भी यह उद्योग झेल रहा है। यहां बाहर से लेबर आती नहीं है और यहां की लेबर बड़े शहरों में पलायन कर रही है।
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कई बड़े कॉटन मिल थे शहर में
कानपुर के बाद उद्योगों के मामले में दूसरा स्थान रखने वाली हाथरस नगरी का कॉटन उद्योग काफी मशहूर था। इसकी वजह यह थी कि यहां आसपास कपास की खेती होती थी। कपास से कॉटन मिलों में रूई बनती थी और फिर रूई का तरह-तरह से प्रयोग होता था। शहर में नया मिल, पुराना मिल, बिजली कॉटन मिल आदि प्रमुख मिल थे। कुछ मिल जब बंद हो गए थे तो उसके बाद घाटे से उबारने के लिए सरकार के हथकरघा निगम ने बिजली कॉटन मिल को टेकओवर भी कर लिया, फिर भी यह मिल घाटे में चलता रहा। आखिर में डेढ़ दशक पहले इसमें ताले लग गए।
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विदेशों में भी होता है माल का निर्यात
इस दौरान यहां उद्यमियों ने अपनी फैक्ट्रियां डालना शुरू कर दिया। कॉटन यार्न, हैंडलूम और पावरलूम की फैक्ट्रियों की यहां शुरुआत हो गई। रूई को मंगाकर यहां धागा तैयार होता है। पावरलूम फैक्ट्रियों में धागों से खेस और चादर सहित अन्य तरह के कपड़े आदि तैयार होते हैं। हैंडलूम फैक्ट्रियों में गलीचा, दरी, बाथमेट्स आदि तैयार होता है। हैंडलूम की कई बड़ी फैक्ट्रियां यहां हैं और यहां से माल का निर्यात भी कई देशों को होता है।
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बिजली संकट और ट्रंासपोर्टेशन का अभाव
कॉटन यार्न, पावरलूम आदि फैक्ट्रियों में कच्चा माल पानीपत, दिल्ली सहित अन्य इलाकों से आता है। पावरलूम माल की देश की काफी इलाकों में खपत है, जबकि काटन यार्न भी शहर और दूर-दूर की फैक्ट्रियों को भेजा जाता है। इस समय इस उद्योग पर कई समस्याएं हावी हैं। मुख्य समस्या बिजली की कटौती और ट्रांसपोर्टेशन की सुविधा का अभाव है। लेबर की कमी भी यह उद्योग झेल रहा है। यहां बाहर से लेबर आती नहीं है और यहां की लेबर बड़े शहरों में पलायन कर रही है।