{"_id":"6555a2f04f11d4dffdf968a12f9da23e","slug":"when-the-lingam-was-chalva-ripper-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"जब शिवलिंग में चलवा दिया था आरा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जब शिवलिंग में चलवा दिया था आरा
ब्यूरो/अमर उजाला,हरदोई
Updated Sun, 09 Aug 2015 11:57 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सोलहवीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब की बर्बरता
विज्ञापन
का शिकार बना 200 साल पुराना क्षेत्र का सुप्रसिद्ध सुनासीर नाथ मंदिर अब
सुंदरीकरण की ओर से अग्रसर है। वर्तमान में मंदिर कमेटी और लोगों के सहयोग
से मंदिर में निर्माण कार्य चल रहा। अब मंदिर ने विशाल रूप धारण कर लिया
है।
मंदिर में सोमवार को क्षेत्र के अलावा गैर जिलों के लाखों श्रद्धालु गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मल्लावां कसबे से चार किमी दूर दक्षिण दिशा में देवराज इंद्र द्वारा स्थापित सुनासीर नाथ मंदिर कुछ समय पहले तक मुगल बादशाह औरंगजेब की बर्बरता की कहानी बयां करता रहा, पर आज मंदिर एक भव्य मंदिर का रूप ले चुका है।
श्रावण मास में सोमवार को जिले के अलावा लखनऊ, कानपुर, उन्नाव, बाराबंकी, कन्नौज, सीतापुर से बड़ी तादाद में श्रद्धालु यहां आकर भगवान शिव का पूजन अर्चन करते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई मन्नत जरूर पूरी होती है। मंदिर के प्राचीन इतिहास पर नजर दौड़ाए तो 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब अपनी फौज और तलवारों के दम पर हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करते हुए यहां गंगा की तराई में आ पहुंचा।
बादशाह की स्वर्णजणित इस मंदिर पर नियत खराब हो गई वह इसे लूटकर तोड़ना चाहता था। इसकी भनक लगने पर गौराखेड़ा के शूरवीरों का मुगल बादशाह से सामना हो गया। दोनों ओर से तलवारें म्यान से बाहर निकल आई और इस युद्ध में भारी खून खराबा होने के साथ सैकड़ों सैनिक मारे गए, पर संसाधन सीमित होने से गौराखेड़ा के शूरवीर मुगल बादशाह के आगे टिक नहीं पाए।
उसके बाद मंदिर के पास पहुंचने पर मुगल बादशाह को मढ़िया के गोस्वामियों का विरोध झेलना पड़ा, पर यहां भी जीत मुगल बादशाह की ही हुई और बादशाह मंदिर को लूटने लगा। उसने सबसे पहले मंदिर में लगे दो क्विंटल के सोने का कलश उतरवा लिया।
फर्श में जड़ी सोने की गिन्नियां व सोने के घंटे लूटकर फौज को मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया, जिस पर मंदिर पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद सैनिक शिवलिंग को खोदने लगे। जब वह इसमें सफल नहीं हुए तो बादशाह ने शिवलिंग को बीच से चीरने का आदेश दिया।
इस पर सैनिकों ने आरे से शिवलिंग को काटने की कोशिश की, तो शिवलिंग से स्वत: दूध की धारा निकलने लगी। यह देख सैनिकों ने आरा चलाना बंद कर दिया। इसी बीच दैवी प्रकोप से प्रकट असंख्य बरैया, ततैया ने बादशाह की फौज पर हमला बोल दिया, जिस पर सैनिक भाग खड़े हुए।
बरैया व ततैयों ने शुक्लापुर गांव तक फौज का पीछा किया। तब जाकर बादशाह व सैनिकों के प्राण बचे। उसी समय से शुक्लापुर गांव को सुकरौला कहा जाने लगा। शिवलिंग पर आरे का निशान आज भी देखा जा सकता है। कालांतर में ध्वस्त मंदिर का पुनर्निर्माण भगवंत नगर निवासी मिश्रा परिवार ने कराया है।
उधर, मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष सेठ सत्य नारायण, राधेमोहन गुप्ता, नंद किशोर आदि ने बताया कि पहले मंदिर 70 बीघा जमीन में था, पर भूमाफिया की कब्जेदारी से मंदिर की कुछ ही जमीन शेष बची है। फिर भी मंदिर को भव्यता देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।
मंदिर में सोमवार को क्षेत्र के अलावा गैर जिलों के लाखों श्रद्धालु गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मल्लावां कसबे से चार किमी दूर दक्षिण दिशा में देवराज इंद्र द्वारा स्थापित सुनासीर नाथ मंदिर कुछ समय पहले तक मुगल बादशाह औरंगजेब की बर्बरता की कहानी बयां करता रहा, पर आज मंदिर एक भव्य मंदिर का रूप ले चुका है।
श्रावण मास में सोमवार को जिले के अलावा लखनऊ, कानपुर, उन्नाव, बाराबंकी, कन्नौज, सीतापुर से बड़ी तादाद में श्रद्धालु यहां आकर भगवान शिव का पूजन अर्चन करते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई मन्नत जरूर पूरी होती है। मंदिर के प्राचीन इतिहास पर नजर दौड़ाए तो 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब अपनी फौज और तलवारों के दम पर हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करते हुए यहां गंगा की तराई में आ पहुंचा।
बादशाह की स्वर्णजणित इस मंदिर पर नियत खराब हो गई वह इसे लूटकर तोड़ना चाहता था। इसकी भनक लगने पर गौराखेड़ा के शूरवीरों का मुगल बादशाह से सामना हो गया। दोनों ओर से तलवारें म्यान से बाहर निकल आई और इस युद्ध में भारी खून खराबा होने के साथ सैकड़ों सैनिक मारे गए, पर संसाधन सीमित होने से गौराखेड़ा के शूरवीर मुगल बादशाह के आगे टिक नहीं पाए।
उसके बाद मंदिर के पास पहुंचने पर मुगल बादशाह को मढ़िया के गोस्वामियों का विरोध झेलना पड़ा, पर यहां भी जीत मुगल बादशाह की ही हुई और बादशाह मंदिर को लूटने लगा। उसने सबसे पहले मंदिर में लगे दो क्विंटल के सोने का कलश उतरवा लिया।
फर्श में जड़ी सोने की गिन्नियां व सोने के घंटे लूटकर फौज को मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया, जिस पर मंदिर पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद सैनिक शिवलिंग को खोदने लगे। जब वह इसमें सफल नहीं हुए तो बादशाह ने शिवलिंग को बीच से चीरने का आदेश दिया।
इस पर सैनिकों ने आरे से शिवलिंग को काटने की कोशिश की, तो शिवलिंग से स्वत: दूध की धारा निकलने लगी। यह देख सैनिकों ने आरा चलाना बंद कर दिया। इसी बीच दैवी प्रकोप से प्रकट असंख्य बरैया, ततैया ने बादशाह की फौज पर हमला बोल दिया, जिस पर सैनिक भाग खड़े हुए।
बरैया व ततैयों ने शुक्लापुर गांव तक फौज का पीछा किया। तब जाकर बादशाह व सैनिकों के प्राण बचे। उसी समय से शुक्लापुर गांव को सुकरौला कहा जाने लगा। शिवलिंग पर आरे का निशान आज भी देखा जा सकता है। कालांतर में ध्वस्त मंदिर का पुनर्निर्माण भगवंत नगर निवासी मिश्रा परिवार ने कराया है।
उधर, मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष सेठ सत्य नारायण, राधेमोहन गुप्ता, नंद किशोर आदि ने बताया कि पहले मंदिर 70 बीघा जमीन में था, पर भूमाफिया की कब्जेदारी से मंदिर की कुछ ही जमीन शेष बची है। फिर भी मंदिर को भव्यता देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।