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बेटियां जब चहकती हैं, फूलों सी महकती हैं

Thu, 02 Mar 2017 11:57 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, हरदोई
अमर उजाला ब्यूरो, हरदोई Updated Thu, 02 Mar 2017 11:57 PM IST
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When daughters are chirping, flowers are small Mahkti
काव्य पाठ करतीं कवयित्री कविता किरण। - फोटो : amarujala

हरदोई। ऐतिहासिक नुमाइश मेले में शुरू रामलीला महोत्सव में बुधवार रात कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन मां, ममता और मातृभूमि पर केंद्रित रहा। कवियों ने रचनाओं के माध्यम से मां, ममता का महत्व बताने के साथ भ्रूण हत्या पर चिंता जताई और मातृभूमि के लिए जीने-मरने की नसीहत दी। अंत में अध्यक्ष ने काव्य की पिचकारी से ऐसे रंग बरसाए की पूरा का पूरा पंडाल फागुन की खुमारी में सराबोर हो गया। 

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ऐतिहासिक नुमाइश मेले के रामलीला पंडाल में बुधवार रात करीब 10 बजे दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री मुकेश अग्रवाल ने दीप प्रज्जवलित कर कवि सम्मेलन का शुभारंभ किया। कविता किरण ने शब्दों की पुष्पमाला से मां सरस्वती का वंदन किया। इसके बाद कोलकाता के श्यामल मजूमदार ने बेटियां जब चहकती हैं, फूलों सी महकती हैं, कविता से बेटियों का महत्व बताया तो जो गलियों में लुच्चे लफंगे न होते तो कच्ची उमर में सगाई होती पंक्तियों ने लड़कियों के प्रति दूषित मानसिकता पर चिंता जताई। 
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उन्नाव से आए रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि नकली अंगुरी तक बेची गई, प्रभु ऐस झमेला तौ झेलि ना पैहों। बैल तुम्हरि सवारी हवै, गदहा पर नाथ कहां चढ़ि पैहो....कहते ही पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मैनपुरी से आए बलराम श्रीवास्तव ने सुकोमल भावनाओं बिन वो नटनागर नहीं आता, किसी सरिता के द्वारे पर कभी सागर नहीं आता...सुनकर लोग वाह वाह कह उठे।
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राजस्थान से आईं डॉ. कविता किरन ने वत्सला से वज्र में ढल जाऊंगी, मैं नहीं हिमकण हूं गल जाऊंगी। दंभ के आकाश को छल जाऊंगी, मैं नहीं हिमकण हूं गल जाऊंगी....सुनकर श्रोता तालियां बजाने को विवश हो गए। कवि श्यामल ने रचनाओं के माध्यम से ऐसे व्यंग्य वाण छोड़े जिनको सुनकर हंसने को विवश हो गए। उन्होंने सुनाया कि जो सियासत में अंधी कमाई न होती, तो चेहरे पर उनकी रौनक न होती।

कुत्ता जो उनका गटर में न गिरता तो सीवर की जल्दी सफाई न होती। पसीने की कीमत जो दुनिया समझती तो किसानों ने फांसी लगाई न होती...गाकर सभी को सोचने पर भी विवश किया। प्रतापगढ़ से आई मीरा तिवारी ने बड़ा बनना है तो अपना बड़ा किरदार कर लेना, गमों में गैर के खुद को भी तो हकदार कर लेना...सुनाकर खूब तालियां बटोरी।

शाहजहांपुर से आए पंकज पलाश ने अपनी गजल कहकर खूब तालियां बटोरीं। उन्होंने सितम को प्यार का जज्बा सितमगर काट देता है, ये वो हीरा है लोहा हो या पत्थर काट देता है। वो इक बच्चा हमारे मुल्क की तस्वीर है सच्ची, बिना कपड़ों के जो मारे दिसंबर काट देता है...गाकर सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया। संचालक अभिराम पाठक ने भगत सिंह की फांसी के समय का वर्णन किया।

एक दिन पहले फांसी देने पर कहा कि न्यायमूर्ति खुद कहता था न्याय नहीं ये मिथ्या है, तुम कहते तो फांसी है मैं कहता हूं हत्या है। फांसी देने वाले जल्लाद के बारे में कहा ...पहली लगा है जैसे मर्द खड़ा है सूली पर...। हरदोई के किशोर कवि सिद्धार्थ दीक्षित और कवयित्री अनुपम सिंह ने काव्य पाठ किया। अध्यक्षता कर रहे रामेंद्र त्रिपाठी ने कहा कि हवा जब तेज चलती है तो पन्ने मोड़ जाती है, बुढ़ापा साथ देता है जवानी छोड़ जाती है।


लचीले सुर में गाएं बांस, मछरिया खुद ही कहे की फांस, और कांटा करते इनकार तो समझा आई बसंती बयार। सहित श्रंगार की कई कविताएं सुनाईं। रामेंद्र की कविताओं ने ऐसा समा बांधा की सुबह पांच बजे तक श्रोता जमे रहे। पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष उमेश अग्रवाल भी मौजूद रहे। मेला आयोजक राम प्रकाश शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत किया।

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