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...मगर इस रावण के आराध्य तो हैं प्रभु श्रीराम
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रावण की लीला का मंचन करने वाले मुकेश कुमार। संवाद
- फोटो : HARDOI
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हरदोई। रामलीला के मंचन में तीन दशक से रावण की भूमिका निभा रहे मुकेश कुमार यूं तो भगवान श्रीराम को अपना आराध्य मानते हैं और उनकी ही पूजा करते हैं। लेकिन रामलीला मंचन में वह लंकापति रावण का किरदार निभाते हैं। हां! वह अपने आराध्य का नाम लेकर ही मंच पर उतरते हैं।
इन दिनों शाहाबाद की पौराणिक रामलीला पठकाना में चल रही है। यहां रामलीला में श्री गिरिराज बालकृष्ण लीला संस्थान महरौली, गोवर्धन मथुरा के कलाकार मंचन कर रहे हैं। अब रावण वध की लीला का मंचन निकट है। रामलीला में रावण की भूमिका का मंचन राजस्थान के करौली निवासी मुकेश कुमार करते हैं।
मुकेश बताते हैं कि रामलीला के मंचन से ही वह परिवार का भरण-पोषण करते हैं। लगभग तीन दशक से देश के अलग-अलग शहरों में अलग-अलग संस्थानों से जुड़कर रामलीला में रावण की भूमिका का मंचन करते हैं। लगभग तीन दशक से मुकेश रावण का किरदार जरूर निभा रहे हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उनके आराध्य प्रभु श्रीराम ही हैं। बातचीत में वह कहते हैं कि प्रभु राम उनके ईष्ट हैं। लीला का मंचन करने के लिए मंच पर जाने से पहले भी भगवान राम का नाम लेते हैं।
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नारायण से युद्ध ही है मोक्ष का रास्ता
भगवान श्रीराम से रावण के प्रतीक के रुप में युद्ध के दौरान अंतर मन में उमड़ने वाली भावनाओं को लेकर मुकेश ने बताया कि रावण का किरदार करने से इंसान का भाव खत्म नहीं होता, लेकिन लड़ते समय दिमाग में यह जरूर होता है कि नारायण से युद्ध हो रहा है तो मोक्ष का रास्ता भी तय है। इसीलिए युद्ध में लड़ते समय प्रसन्नता रहती है कि अब मोक्ष जरूर मिलेगा।
मिलती है अभिमान की सजा, यह किस काम का...
मुकेश कुमार कहते हैं कि जब रावण का पात्र निभाते हुए राम के हाथों मृत्यु (मोक्ष) मिलती है तो लगता है कि अभिमान, अहंकार की सजा मिल गई। किसी को अहंकारी और अभिमानी नहीं होने देना चाहिए। अहंकार और अभिमान भगवान का भोजन है। जीवन के आखिरी वक्त में लगता है कि अभिमान आखिर किस काम का।
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इन दिनों शाहाबाद की पौराणिक रामलीला पठकाना में चल रही है। यहां रामलीला में श्री गिरिराज बालकृष्ण लीला संस्थान महरौली, गोवर्धन मथुरा के कलाकार मंचन कर रहे हैं। अब रावण वध की लीला का मंचन निकट है। रामलीला में रावण की भूमिका का मंचन राजस्थान के करौली निवासी मुकेश कुमार करते हैं।
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मुकेश बताते हैं कि रामलीला के मंचन से ही वह परिवार का भरण-पोषण करते हैं। लगभग तीन दशक से देश के अलग-अलग शहरों में अलग-अलग संस्थानों से जुड़कर रामलीला में रावण की भूमिका का मंचन करते हैं। लगभग तीन दशक से मुकेश रावण का किरदार जरूर निभा रहे हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उनके आराध्य प्रभु श्रीराम ही हैं। बातचीत में वह कहते हैं कि प्रभु राम उनके ईष्ट हैं। लीला का मंचन करने के लिए मंच पर जाने से पहले भी भगवान राम का नाम लेते हैं।
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नारायण से युद्ध ही है मोक्ष का रास्ता
भगवान श्रीराम से रावण के प्रतीक के रुप में युद्ध के दौरान अंतर मन में उमड़ने वाली भावनाओं को लेकर मुकेश ने बताया कि रावण का किरदार करने से इंसान का भाव खत्म नहीं होता, लेकिन लड़ते समय दिमाग में यह जरूर होता है कि नारायण से युद्ध हो रहा है तो मोक्ष का रास्ता भी तय है। इसीलिए युद्ध में लड़ते समय प्रसन्नता रहती है कि अब मोक्ष जरूर मिलेगा।
मिलती है अभिमान की सजा, यह किस काम का...
मुकेश कुमार कहते हैं कि जब रावण का पात्र निभाते हुए राम के हाथों मृत्यु (मोक्ष) मिलती है तो लगता है कि अभिमान, अहंकार की सजा मिल गई। किसी को अहंकारी और अभिमानी नहीं होने देना चाहिए। अहंकार और अभिमान भगवान का भोजन है। जीवन के आखिरी वक्त में लगता है कि अभिमान आखिर किस काम का।