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Hardoi News: मन में थी लगन, सहयोग को मिला मिशन, तो नीरू ने बदल ली खुद की तकदीर
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फोटो-40-अपने कारखाने में सहयोगियों के साथ काम करती नीरू। स्रोत स्वयं
बेहंदर। कछौना विकास खंड के टिकारी में रहने वालीं नीरू सिंह कपड़ों की सिलाई करना जानती थीं। परिचित महिलाओं के जरिए उन्हें छोटा मोटा काम मिल जाता था। अब से लगभग आठ साल पहले आजीविका मिशन के बारे में उन्हें पता चला। मिशन से जुड़ने के बाद उन्हें प्रशिक्षण मिला और फिर स्वरोजगार के लिए सहायता भी। अब उनके साथ 25 महिलाएं सिलाई का काम कर रही हैं। दावा है कि माह में औसतन 20 हजार रुपये की बचत भी उन्हें होती है।
नीरू सिंह की आर्थिक स्थिति कुछ साल पहले तक ठीक नहीं थी। यही वजह थी कि उन्हें गांव में ही सिलाई के छोटे मोटे काम करने पड़ते थे। उनके अंदर हुनर भी था और लगन भी। बस सही मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा था। नीरू बताती हैं कि वर्ष 2018 में राष्ट्रीय आजीविका मिशन के बारे में पता चला। मिशन के अधिकारियों की मदद से उन्होंने स्वयं सहायता समूह का गठन किया। समूह में इस समय 12 सदस्य हैं। कार्य की शुरूआत दस हजार रुपये से की थी।
तब वह कपड़ों की सामान्य सिलाई करती थीं। बाद में प्रशिक्षण मिला, तो हुनर और निखरा, अब वह लेडीज कपड़ों के साथ ही स्कूल बैग, लेडीज बैग, शॉपिंग बैग भी तैयार करती हैं। उनके साथ इन दिनों 25 महिलाएं यह कार्य करने में लगी हैं। आर्थिक स्थिति के बदलाव का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि अब उनके दोनों बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ते हैं, जो पहले सपने जैसा था। नीरू बताती हैं कि उनके और उनकी सहयोगियों के बनाए बैग की न्यूनतम कीमत 90 रुपये है, लेकिन यह ब्रांडेड बैग को पीछे छोड़ने लायक हाेते हैं।
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नीरू सिंह की आर्थिक स्थिति कुछ साल पहले तक ठीक नहीं थी। यही वजह थी कि उन्हें गांव में ही सिलाई के छोटे मोटे काम करने पड़ते थे। उनके अंदर हुनर भी था और लगन भी। बस सही मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा था। नीरू बताती हैं कि वर्ष 2018 में राष्ट्रीय आजीविका मिशन के बारे में पता चला। मिशन के अधिकारियों की मदद से उन्होंने स्वयं सहायता समूह का गठन किया। समूह में इस समय 12 सदस्य हैं। कार्य की शुरूआत दस हजार रुपये से की थी।
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तब वह कपड़ों की सामान्य सिलाई करती थीं। बाद में प्रशिक्षण मिला, तो हुनर और निखरा, अब वह लेडीज कपड़ों के साथ ही स्कूल बैग, लेडीज बैग, शॉपिंग बैग भी तैयार करती हैं। उनके साथ इन दिनों 25 महिलाएं यह कार्य करने में लगी हैं। आर्थिक स्थिति के बदलाव का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि अब उनके दोनों बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ते हैं, जो पहले सपने जैसा था। नीरू बताती हैं कि उनके और उनकी सहयोगियों के बनाए बैग की न्यूनतम कीमत 90 रुपये है, लेकिन यह ब्रांडेड बैग को पीछे छोड़ने लायक हाेते हैं।
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