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रूह में बसी है 1857 की गदर

Sat, 08 Aug 2015 11:53 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,हरदोई
ब्यूरो/अमर उजाला,हरदोई Updated Sat, 08 Aug 2015 11:53 PM IST
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Mutiny of 1857 resides in the soul

73 साल बाद नौ अगस्त को एक फिर से जिले के लोगों की

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जुबां पर अंग्रेजों भारत छोड़ो की कहानियां एवं जिले के शहीदों का वीरगाथाएं तैरती नजर आएंगी। कई संगठनों द्वारा नौ अगस्त क्रांति दिवस के रूप में मनाई जाएगी और जिले के  क्रांतिकारियों व शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए नमन किया जाएगा।

अंग्रेजों की दमन की याद दिलाने को माधौगंज के उत्तर दिशा में तीन किमी दूर छोटा सा गांव रूइया काफी है। यहां 1857 की याद दिलाता एक छोटा सा टीला है, जो तीन ओर झील से घिरा रूइया दुर्ग या रूमगढ़ नाम से प्रसिद्ध है। राजा नरपति सिंह ने अंग्रेजी शासन को ललकारते हुए डेढ़ वर्ष तक युद्ध किया और जिले को अंग्रेजी शासन से मुक्त रखा था।

तत्कालीन जिला मुख्यालय मल्लावां पर आठ जून 1857 को आक्रमण कर दिया। अंग्रेज अफसरों एवं सिपाहियों के काल के गाल तक पहुंचा दिया। जिले का डिप्टी कमिश्नर डब्ल्यू सी चैपर भागने में सफल हो गया था। इसके बाद अंग्र्रेजों की कुदृष्टि राजा नरपति सिंह पर पड़ी। तय किया गया कि नरपति नंबर एक के शत्रु है, लिहाजा उन्हें रास्ते से हटाना होगा।

अंग्रेजी सेना ने राजा नरपति सिंह पर चार आक्रमण किए। प्रथम 15 अप्रैल 1858 रूइया दुर्ग पर, दूसरा 22 अप्रैल 1858 रामगंगा किनारे सिरसा ग्राम पर, तीसरा 28 अक्तूबर को पुन रूइया दुर्ग पर, चौथा नौ नवंबर 1858 को मिनौली पर। इसके बाद जिले में नरपति सिंह को छोड़ सभी राजा, नवाब, जमीदार अंग्रेजों के अनुयायी हो गए।

राजा नरपति व अंग्रेजों में युद्ध जारी रहा। एक ओर अंग्रेजों की बड़ी तोपों से सजी लगभग 20 हजार सेना तथा इधर किले में छिपे एक हजार से कम सैनिकों ने ऐसी लड़ाई लड़ी कि अंग्रेजों की बटालियन पूरी तरह नेस्तनाबूद हो गई। उनमें पांच अंग्रेज ब्रिगेडियर, लेफ्टीनेंट और 55 अंग्रेज सैनिक घायल हो गए।

मरे अफसरों में विक्टोरिया का ममेरा भाई ब्रिगेडियर एड्रियन होप भी थे। अफसरों की पक्की कब्रें माधौगंज चौराहे पर बनाई गई थी। इसके बाद अंग्रेजी शासन हिल गया था।

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