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अंजुमन की धूपबत्ती से बिखर रहीं परिवारों में खुशी की सुगंध

Thu, 19 Dec 2019 06:36 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 19 Dec 2019 06:36 PM IST
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Life was bland by making incense sticks
फोटो-22- अंजुमन बेगम। - फोटो : HARDOI
कहते हैं कि कुछ कर गुजरने की चाह हो तो बाधाएं आसानी से पार हो जाती हैं और फिर अगर बात नारी शक्ति की हो तो उसके सामर्थ्य की कोई सीमा ही नहीं है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया बावन के तत्योरा गांव की कुछ महिलाओं ने। ये महिलाएं धूपबत्ती और अगरबत्ती बनाकर जीवन को महका रही हैं।
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शहर से लगभग छह किलोमीटर दूर इस गांव की अंजुमन बेगम के पति मोहम्मद सलीम के पास एक बिसुआ खेती भी नहीं है। परिवार के भरण पोषण के लिए वह कभी दूसरों के खेतों में काम करते हैं तो कभी बटाई पर काम करते हैं। जैसे तैसे घर चल रहा था कि तभी अंजुमन बेगम राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत समूह गठन कर प्रशिक्षण देने वाले कर्मचारियों के संपर्क में आईं।
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फिर उन्होंने अपने ही गांव की ही 10 महिलाओं का समूह बनाया। इन सभी को अगरबत्ती और धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। नि:शुल्क प्रशिक्षण हासिल करने के बाद अंजुमन बेगम ने अपने घर पर ही साल 2018 में धूपबत्ती और अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया। अंजुमन का कारोबार अब बढ़ चुका है। न सिर्फ हरदोई शहर बल्कि बावन, सांडी सहित कई जगहों पर उनके समूह द्वारा बनाई गई सामग्री बेची जाती है।
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अंजुमन बेगम बताती हैं कि अपने समूह के साथ हर रोज चार घंटे धूपबत्ती बनाने का काम करती हैं। चार घंटे में लगभग आठ किलो धूपबत्ती बन जाती है। कुछ महिलाएं धूपबत्ती बनाती हैं तो कुछ इनकी पैकिंग करती हैं।
बाजार में इसे बेचने के कार्य में अंजुमन का बेटा हिंदाल मदद करता है। बाजार में अपने उत्पाद दिखाने के लिए समूह की महिलाएं भी जाती हैं। आर्डर भी महिलाएं लेती हैं और माल की आपूर्ति हिंदाल करते हैं।
महिलाओं ने बताया कि एक किलो धूपबत्ती बाजार में बिकने पर 200 से 250 रुपये तक की बचत होती है। एक दिन में अगर आठ किलो धूपबत्ती बनती है तो बचत के लिए 1600 से 2000 रुपये तक का इंतजाम हो जाता है।
धूपबत्ती की बिक्री के लिए समूह का स्टॉल भी जगह-जगह लगता है। हिंदाल बताते हैं कि बीते मंगलवार को सवायजपुर के संपूर्ण समाधान दिवस में उन्होंने स्टॉल लगाया था। लगभग छह घंटे में उन्हें साढ़े सात सौ रुपये की कमाई हुई।
अंजुमन बेगम के स्वयं सहायता समूह का नाम हम साथ-साथ हैं। समूह में शामिल रुबैदा, अफसरी, रीना, शायदा, सरबरी, अनीता आदि बताती हैं कि सबकी परेशानियां लगभग एक जैसी थीं।

खेती थी नहीं और पति के साथ मजदूरी सिर्फ खेतों में ही की जा सकती है, लेकिन अंजुमन ने पहल की तो सब लोग साथ आ गए। फिर पता चला कि समूह का नाम भी देना है तो हम साथ-साथ हैं नाम तय हुआ। वाकई यहां सब साथ-साथ हैं।
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