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‘तीसरी आंख’ का हो इलाज तो शहर को देखे
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हरदोई। क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क (सीसीटीएन) के जरिए उत्तर प्रदेश में शुरू हुई स्मार्ट पुलिस व्यवस्था में जिले में बनाया गया कंट्रोल रूम और व्यवस्थाएं पूरी तरह से धड़ाम हो चुकी हैं।
दरअसल योजना के तहत शहर को कैमरे की नजर में रखने के साथ ही कस्बों और गांवों तक नेटवर्क बनाया जाना था, लेकिन योजना के परवान चढ़ने से पहले ही उसे ही नजर लग गई।
योजना के तहत जिन स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे, वो सभी कमोबेश खराब हो चुके है या फिर उन तक कनेक्टिविटी ही नहीं पहुंच रही है। इसके बाद भी जिम्मेदार इस ओर बेखबर बने हुए हैं।
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करीब सात वर्ष पूर्व जिले में सीसीटीएन की शुरुआत हुई थी। इस नेटवर्क के लिए पुलिस लाइन में सेटेलाइट आधारित कंट्रोल रूम स्थापित किया गया था।
स्मार्ट पुलिसिंग व्यवस्था के तौर पर उस समय बेहद चर्चा में रही इस व्यवस्था को लेकर निजी स्तर पर भी लोगों में जागरुकता आई थी और तमाम बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों एवं उद्यम सहित घरों में सीसीटीवी कैमरों को लेकर क्रेज बढ़ा था।
लोगों को लगा कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से कैमरे की नजर रखने की यह तकनीक पुलिस के लिए ही नहीं पब्लिक के लिए भी जिम्मेदारी का कार्य है। उस समय प्रमुख रूप से नुमाइश चौराहा, बड़ा चौराहा, लखनऊ चुंगी, सिनेमा चौराहा पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे।
ये सभी कैमरे इस तरह से लगाए गए थे कि चौराहों के चारों ओर कई एंगलों में करीब 50 मीटर तक एरिया जद में रहे। इसका फायदा यह था कि इन क्षेत्रों के आसपास से होने वाली आवाजाही कैमरों में कैद होती रहती थी।
इस रिकार्डिंग का उपयोग कभी कोई घटना होने पर या फिर किसी अन्य मामले में वाहन आदि सहित ट्रैसिंग में काम आती थी। योजना का उद्देश्य भी यही था कि प्रमुख क्षेत्र कैमरे की जद में रहें।
सीसीटीएन के तहत शहर के अन्य चौराहों के साथ कस्बों एवं गांवों तक कैमरे की नजर को रखने की तैयारी थी, लेकिन योजना पूरी तरह से परवान चढ़ने से पहले ही धड़ाम हो गई। जिन स्थानों पर कैमरों की नजर थी, वो कैमरे भी बीते कुछ वर्षों से बंद हो गए हैं।
केस-एक
पिछले माह में नुमाइश चौराहे के निकट स्थित बस अड्डे के पास एक पुलिस कर्मी की पत्नी का टप्पेबाजों ने पर्स पार कर दिया था। पुलिस अब तक टप्पेबाजी करने वालों का हुलिया तक पता नहीं लगा सकी है।
केस-दो
पिछले महीने सिनेमा रोड के निकट उचक्कों ने एक महिला का पर्स छीन लिया था। देर शाम हुई इस घटना को लेकर पुलिस को भनक तक नहीं लगी, जबकि पड़ोस में ही पुलिस सहायता केंद्र बना हुआ है।
केस-तीन
कुछ दिन पूर्व नघेटा रोड पर एक रिटायर्ड बैंक कर्मी की पत्नी का टप्पेबाजों ने पर्स आदि पार कर दिया। इस मामले में पुलिस ने अभी तक कुछ भी पता नहीं कर सकी है।
कैमरे काम करें तो हो पुलिस को सहूलियत
शहर के उक्त तीन मामले एक बानगी हैं और उन चौराहों के आसपास के हैं, जहां पर कभी सीसीटीवी कैमरों की नजर रहती थी।
लोगों का मानना है कि यदि कैमरे काम कर रहे होते, तो पुलिस को मामलों को सुलझाने में काफी मदद मिल सकती थी। इसके साथ ही आरोपियों को भी दबोचा जा सकता था।
वह इस ओर जानकारी करने के साथ नियमानुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित कराएंगे। जहां-जहां के कैमरे खराब हैं, उनको ठीक कराया जाएगा।
- राजेश द्विवेदी, पुलिस अधीक्षक
सात साल पहले लगे थे 16 सीसीटीवी कैमरे
सात वर्ष पूर्व शहर के प्रमुख चौराहों पर करीब 16 कैमरे लगाए गए थे। सीसीटीएन के तहत शासन द्वारा अधिकृत की गई फर्म की ओर से यहां कैमरों की स्थापना के साथ ही कंट्रोल रूम आदि के तकनीकी कार्य कराए गए थे।
इस योजना के तहत शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर भी कैमरों को लगाया जाना था। व्यवस्था तो काफी सराही गई थी, मगर बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकी। आलम यह है कि कैमरे की नजर के स्मार्ट सिस्टम को ही नजर लग गई।
शासन की ओर से इस ओर कोई अपडेट नहीं आया तो जिला स्तर पर भी कुछ नहीं किया जा सका। पिछले लंबे समय से यह व्यवस्था ठप है।
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दरअसल योजना के तहत शहर को कैमरे की नजर में रखने के साथ ही कस्बों और गांवों तक नेटवर्क बनाया जाना था, लेकिन योजना के परवान चढ़ने से पहले ही उसे ही नजर लग गई।
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योजना के तहत जिन स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे, वो सभी कमोबेश खराब हो चुके है या फिर उन तक कनेक्टिविटी ही नहीं पहुंच रही है। इसके बाद भी जिम्मेदार इस ओर बेखबर बने हुए हैं।
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करीब सात वर्ष पूर्व जिले में सीसीटीएन की शुरुआत हुई थी। इस नेटवर्क के लिए पुलिस लाइन में सेटेलाइट आधारित कंट्रोल रूम स्थापित किया गया था।
स्मार्ट पुलिसिंग व्यवस्था के तौर पर उस समय बेहद चर्चा में रही इस व्यवस्था को लेकर निजी स्तर पर भी लोगों में जागरुकता आई थी और तमाम बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों एवं उद्यम सहित घरों में सीसीटीवी कैमरों को लेकर क्रेज बढ़ा था।
लोगों को लगा कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से कैमरे की नजर रखने की यह तकनीक पुलिस के लिए ही नहीं पब्लिक के लिए भी जिम्मेदारी का कार्य है। उस समय प्रमुख रूप से नुमाइश चौराहा, बड़ा चौराहा, लखनऊ चुंगी, सिनेमा चौराहा पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे।
ये सभी कैमरे इस तरह से लगाए गए थे कि चौराहों के चारों ओर कई एंगलों में करीब 50 मीटर तक एरिया जद में रहे। इसका फायदा यह था कि इन क्षेत्रों के आसपास से होने वाली आवाजाही कैमरों में कैद होती रहती थी।
इस रिकार्डिंग का उपयोग कभी कोई घटना होने पर या फिर किसी अन्य मामले में वाहन आदि सहित ट्रैसिंग में काम आती थी। योजना का उद्देश्य भी यही था कि प्रमुख क्षेत्र कैमरे की जद में रहें।
सीसीटीएन के तहत शहर के अन्य चौराहों के साथ कस्बों एवं गांवों तक कैमरे की नजर को रखने की तैयारी थी, लेकिन योजना पूरी तरह से परवान चढ़ने से पहले ही धड़ाम हो गई। जिन स्थानों पर कैमरों की नजर थी, वो कैमरे भी बीते कुछ वर्षों से बंद हो गए हैं।
केस-एक
पिछले माह में नुमाइश चौराहे के निकट स्थित बस अड्डे के पास एक पुलिस कर्मी की पत्नी का टप्पेबाजों ने पर्स पार कर दिया था। पुलिस अब तक टप्पेबाजी करने वालों का हुलिया तक पता नहीं लगा सकी है।
केस-दो
पिछले महीने सिनेमा रोड के निकट उचक्कों ने एक महिला का पर्स छीन लिया था। देर शाम हुई इस घटना को लेकर पुलिस को भनक तक नहीं लगी, जबकि पड़ोस में ही पुलिस सहायता केंद्र बना हुआ है।
केस-तीन
कुछ दिन पूर्व नघेटा रोड पर एक रिटायर्ड बैंक कर्मी की पत्नी का टप्पेबाजों ने पर्स आदि पार कर दिया। इस मामले में पुलिस ने अभी तक कुछ भी पता नहीं कर सकी है।
कैमरे काम करें तो हो पुलिस को सहूलियत
शहर के उक्त तीन मामले एक बानगी हैं और उन चौराहों के आसपास के हैं, जहां पर कभी सीसीटीवी कैमरों की नजर रहती थी।
लोगों का मानना है कि यदि कैमरे काम कर रहे होते, तो पुलिस को मामलों को सुलझाने में काफी मदद मिल सकती थी। इसके साथ ही आरोपियों को भी दबोचा जा सकता था।
वह इस ओर जानकारी करने के साथ नियमानुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित कराएंगे। जहां-जहां के कैमरे खराब हैं, उनको ठीक कराया जाएगा।
- राजेश द्विवेदी, पुलिस अधीक्षक
सात साल पहले लगे थे 16 सीसीटीवी कैमरे
सात वर्ष पूर्व शहर के प्रमुख चौराहों पर करीब 16 कैमरे लगाए गए थे। सीसीटीएन के तहत शासन द्वारा अधिकृत की गई फर्म की ओर से यहां कैमरों की स्थापना के साथ ही कंट्रोल रूम आदि के तकनीकी कार्य कराए गए थे।
इस योजना के तहत शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर भी कैमरों को लगाया जाना था। व्यवस्था तो काफी सराही गई थी, मगर बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकी। आलम यह है कि कैमरे की नजर के स्मार्ट सिस्टम को ही नजर लग गई।
शासन की ओर से इस ओर कोई अपडेट नहीं आया तो जिला स्तर पर भी कुछ नहीं किया जा सका। पिछले लंबे समय से यह व्यवस्था ठप है।