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...यहां दागदार सब हैं कोई पारसा नहीं
ब्यूरो/अमर उजाला,हरदोई
Updated Tue, 18 Aug 2015 12:34 AM IST
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मोहल्ला लोहानी में राकिब पिहानवी की याद में आयोजित
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मुशायरा में शायरों ने जिंदगी के कई पहलुओं को शायरी बनाकर पेश किया। रात
के आखिरी हिस्से तक स्रोता शेरो शायरी का लुत्फ उठाते रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ हुजूर मोहम्मद सल्ल. की शान में नाते पाक से हुआ। इसके बाद शुरू हुए गीत-गजल के दौर में साबिर शाहाबादी ने देशभक्ति गीत सुना तालियां लूटीं। सुल्तान अख्तर ने कहा ‘मैं अकेला इस जहां में बुरा आदमी नहीं, यहां दागदार सब हैं कोई पारसा नहीं’।
पयाम मोहम्मदवी ने जंग-ए-आजादी में उलमा-ए-देवबंद के किरदार का बयान करते हुए कहा ‘देना पड़ा लहू भी वतन के लिए अगर, तो गरदने कटा गए उलमा-ए-देवबंद’। शायर सलमान जफर ने नेक सलाह दी ‘मजहब पे बहस करते हुए ये भी सोच लो, रिश्तों पे भी पड़ सकता है तकरार का साया’।
जमाल शाहनवाज ने एकता को बढ़ावा देने का पैगाम दिया। बेकल पिहानवी के इस शेर पर उन्हें बेपनाह दाद मिली ‘जब से मेरी निगाह से वो दूर हो गया, दिल का सुकून दिल से बहुत दूर हो गया’। लईक पिहानवी के इन मिसरों पर तालियां बजीं ‘जनाजा अक्ल का कांधेे पे अपने खुद उठाए, भटक रहा हूं मैं भीड़ में दानिशवरों की’।
इजहार शाहाबादी का यह शेर बेहद पसंद किया गया ‘सुनाऊंगा मैं सबको दास्ताने गम ये सोचा था, किसी ने आके होंठों पर हमारे उंगलियां रख दीं’। एमएफ कैफी ने राकिब पिहानवी की साहित्य सेवाओं पर रोशनी डाली। कहा कि उनकी याद में मुशायरे का यह सिलसिला जारी रहेगा।
सगीर अंसारी ने भी शेर पढ़े। इस मौके पर चांद देहलियावी, हैरत पिहानवी, डा. नईम शाहाबादी अनजान देहलियावी, बैजनाथ गौरखपुरी, साबिर शाहाबादी आदि ने भी शेर सुनाएं। आयोजन में तुफैल अंसारी, शकील, फरीद, सुहैल, अनस व जुबैर अंसारी आदि ने व्यवस्थाएं देखीं। अध्यक्षता सपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष हफीज मंसूरी ने की।
कार्यक्रम का शुभारंभ हुजूर मोहम्मद सल्ल. की शान में नाते पाक से हुआ। इसके बाद शुरू हुए गीत-गजल के दौर में साबिर शाहाबादी ने देशभक्ति गीत सुना तालियां लूटीं। सुल्तान अख्तर ने कहा ‘मैं अकेला इस जहां में बुरा आदमी नहीं, यहां दागदार सब हैं कोई पारसा नहीं’।
पयाम मोहम्मदवी ने जंग-ए-आजादी में उलमा-ए-देवबंद के किरदार का बयान करते हुए कहा ‘देना पड़ा लहू भी वतन के लिए अगर, तो गरदने कटा गए उलमा-ए-देवबंद’। शायर सलमान जफर ने नेक सलाह दी ‘मजहब पे बहस करते हुए ये भी सोच लो, रिश्तों पे भी पड़ सकता है तकरार का साया’।
जमाल शाहनवाज ने एकता को बढ़ावा देने का पैगाम दिया। बेकल पिहानवी के इस शेर पर उन्हें बेपनाह दाद मिली ‘जब से मेरी निगाह से वो दूर हो गया, दिल का सुकून दिल से बहुत दूर हो गया’। लईक पिहानवी के इन मिसरों पर तालियां बजीं ‘जनाजा अक्ल का कांधेे पे अपने खुद उठाए, भटक रहा हूं मैं भीड़ में दानिशवरों की’।
इजहार शाहाबादी का यह शेर बेहद पसंद किया गया ‘सुनाऊंगा मैं सबको दास्ताने गम ये सोचा था, किसी ने आके होंठों पर हमारे उंगलियां रख दीं’। एमएफ कैफी ने राकिब पिहानवी की साहित्य सेवाओं पर रोशनी डाली। कहा कि उनकी याद में मुशायरे का यह सिलसिला जारी रहेगा।
सगीर अंसारी ने भी शेर पढ़े। इस मौके पर चांद देहलियावी, हैरत पिहानवी, डा. नईम शाहाबादी अनजान देहलियावी, बैजनाथ गौरखपुरी, साबिर शाहाबादी आदि ने भी शेर सुनाएं। आयोजन में तुफैल अंसारी, शकील, फरीद, सुहैल, अनस व जुबैर अंसारी आदि ने व्यवस्थाएं देखीं। अध्यक्षता सपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष हफीज मंसूरी ने की।