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हर्रैया पड़ाव पर हरिभक्त, जय-जय सीताराम
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भरावन। 88 हजार ऋषि मुनियों की तपोस्थली नैमिषारण्य से बृहस्पतिवार को शुरू हुई 84 कोसी परिक्रमा अपने दूसरे पड़ाव पर हर्रैया पहुंची।
हर्रैया में गोमती नदी के पुल के पास स्वागत द्वार पर संत महात्माओं का एसडीएम, सीओ, एसएचओ ने माला पहनाकर स्वागत किया। स्थानीय लोगों ने यात्रा में चल रहे साधु-संतों पर पुष्प वर्षा की।
परिक्रमा में विक्की बाबा, जटाधारी बाबा, बंदूक धारी बाबा, नागा बाबा, किन्नर साधु सहित छोटी उम्र के बच्चे आकर्षण का केंद्र बने रहे। वहीं, परिक्रमा में बुजुर्गों से लेकर दिव्यांगजनों ने भी भाग लिया।
शुक्रवार की सुबह 84 कोसी परिक्रमा जिले के हर्रैया पड़ाव पहुंच गई। परिक्रमा के दूसरे पड़ाव हर्रैया पर सुबह 4 बजे से ही साधु-संत व श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गय्रा।
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दोपहर 12 बजे पहला आश्रम के संत नहक्कू दास सिल्वर कलर के रथ पर व लाल कलर के रथ पर बनगढ़ के महंत संतोष दास खाकी हर्रैया पड़ाव पर पहुंच गए।
तमाम भक्तों ने गोमती में डुबकी लगाई और श्री हरि का जप करते हुए जयजय सीताराम के जयघोष से वातावरण भक्तिमय कर दिया। परिक्रमा में शामिल श्रद्धालुओं की बोल सीताराम के उद्घोष व जगह जगह आयोजित भागवतों से भक्ति की रसधार बहने लगी।
हर्रैया गांव के ग्रामीणों ने परिक्रमा में शामिल लोगों का स्वागत किया। परिक्रमा में शामिल करीब ढाई लाख श्रद्धालुओं ने तीन किलोमीटर की परिधि में आने वाले बाग व खुले मैदान सहित सड़क किनारे कुटिया बनाकर एक रात का आशियाना बनाया हुआ है।
प्रशासन द्वारा पानी के टैंकर, मोबाइल टॉयलेट, मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट, दवा स्टाल, मेला पुलिस चौकी, ख़ोया पाया कार्यालय की व्यवस्था की गई थी।
स्कंद पुराण में है परिक्रमा का महत्व
स्कंद पुराण में उल्लेखित किया गया कि 84 कोसी परिक्रमा यात्रा मानव के समस्त पापों को नष्ट कर उसे 84 लाख योनियों के जन्म मरण के चक्र से मुक्ति दिलाती है।
पुराण के मुताबिक, ये यात्रा सबसे पहले भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने की थी। भगवान श्रीराम ने भी ब्रह्मदोष से मुक्ति पाने के लिए अयोध्यावासियों के साथ परिक्रमा की थी।
यही वजह है कि परिक्रमा को रामादल भी कहा जाता है। पूरी परिक्रमा में जो श्रद्धालु भाग नहीं ले पाते हैं वो परिक्रमा के पूर्ण के आखिरी पांच दिन मिश्रिख तीर्थ में चलने वाली परिक्रमा में भागीदार बनकर पुण्य अर्जित करते हैं।
बाबाओं संग सब बोले, हरिबोल
हरदोई के दलेलपुर निवासी अटल दास त्यागी बाबा 48 वर्षों से परिक्रमा में शामिल हो रहे हैं। शुक्रवार को हर्रैया पुल पर त्यागी बाबा अपनी जटाओं के साथ आकर्षण का केंद्र रहे।
बनगढ़ आश्रम से पधारे बब्बू दास खाकी जटाओं को खोलकर हाथ में बंदूक लेकर बम भोले का उद्घोष कर रहे थे। रमिया लखीमपुर से आए दिव्यांग सर्वेश लोगों को पछाड़ते हुए राम की धुन में आगे ही बढ़ते जा रहे थे।
इटावा से ट्राई साइकिल पर सवार होकर परिक्रमा में शामिल होने आए विश्राम बाबा राशन लेकर आगे ही बढ़ते जा रहे थे, वहीं महाकाल की नगरी उज्जैन से पधारे गोरधन लाल बाबा गोमती के किनारे भक्तों के साथ कान्हा की भक्ति में रमते हुए मिले।
हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैयालाल की
84 कोसी परिक्रमा में बाबा नंहक्कू दास व परिक्रमा सचिव महंत संतोष दास खाकी रथ पर सवार होकर पहुंचे तो नैमिषारण्य से विक्की दास बाबा विक्की पर सवार होकर पहुंचे।
नैमिषारण्य से पालकी में रामानुज महाराज व हाथी पर सवार होकर नागेंद्र दास पहुंचे, वहीं कई बाबा लग्जरी वाहनों व बस पर सवार होकर पहुंचे। वाहनों की साज-सज्जा आकर्षण का केंद्र बनी रही।
उत्तराखंड, एमपी, नेपाल तक से आएं संत
84 कोसी परिक्रमा में इर्द गिर्द के इलाकों को छोड़कर उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, नेपाल, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार सहित कई प्रांतों के साधु-संत परिक्रमा में शामिल हुए। अधिकतर पड़ोसी राज्यों के संत सैकड़ों लोगों के साथ परिक्रमा में शामिल हुए।
वहीं भिंड मध्य प्रदेश से पधारे पूरन लाल गुप्ता परिक्रमा के साथ ही पड़ावों पर भंडारे का आयोजन कर रहे, तो कई भक्त लंगर लगाकर परिक्रमार्थियों की भूख मिटा रहे हैं।
वृंदावन से पधारे किन्नर साधु
84 कोसी परिक्रमा में वृंदावन से पधारे किन्नर साधु सखी किशोरी व राम सखी राम नाम का गुणगान कर नाचते हुए परिक्रमा के हर्रैया पड़ाव पर पहुंचे।
वहीं, कुतुबनगर से 70 वर्ष की श्याम के साथ उनकी दो पोतियां प्रियांशी व हिमांशी, लखीमपुर से रिंकू, सीतापुर से निर्मल, बाराबंकी से शिवा समेत कई श्रद्धालुओं के जयकारे से गोमती नदी में भी कोलाहल होने लगा।
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हर्रैया में गोमती नदी के पुल के पास स्वागत द्वार पर संत महात्माओं का एसडीएम, सीओ, एसएचओ ने माला पहनाकर स्वागत किया। स्थानीय लोगों ने यात्रा में चल रहे साधु-संतों पर पुष्प वर्षा की।
परिक्रमा में विक्की बाबा, जटाधारी बाबा, बंदूक धारी बाबा, नागा बाबा, किन्नर साधु सहित छोटी उम्र के बच्चे आकर्षण का केंद्र बने रहे। वहीं, परिक्रमा में बुजुर्गों से लेकर दिव्यांगजनों ने भी भाग लिया।
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शुक्रवार की सुबह 84 कोसी परिक्रमा जिले के हर्रैया पड़ाव पहुंच गई। परिक्रमा के दूसरे पड़ाव हर्रैया पर सुबह 4 बजे से ही साधु-संत व श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गय्रा।
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दोपहर 12 बजे पहला आश्रम के संत नहक्कू दास सिल्वर कलर के रथ पर व लाल कलर के रथ पर बनगढ़ के महंत संतोष दास खाकी हर्रैया पड़ाव पर पहुंच गए।
तमाम भक्तों ने गोमती में डुबकी लगाई और श्री हरि का जप करते हुए जयजय सीताराम के जयघोष से वातावरण भक्तिमय कर दिया। परिक्रमा में शामिल श्रद्धालुओं की बोल सीताराम के उद्घोष व जगह जगह आयोजित भागवतों से भक्ति की रसधार बहने लगी।
हर्रैया गांव के ग्रामीणों ने परिक्रमा में शामिल लोगों का स्वागत किया। परिक्रमा में शामिल करीब ढाई लाख श्रद्धालुओं ने तीन किलोमीटर की परिधि में आने वाले बाग व खुले मैदान सहित सड़क किनारे कुटिया बनाकर एक रात का आशियाना बनाया हुआ है।
प्रशासन द्वारा पानी के टैंकर, मोबाइल टॉयलेट, मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट, दवा स्टाल, मेला पुलिस चौकी, ख़ोया पाया कार्यालय की व्यवस्था की गई थी।
स्कंद पुराण में है परिक्रमा का महत्व
स्कंद पुराण में उल्लेखित किया गया कि 84 कोसी परिक्रमा यात्रा मानव के समस्त पापों को नष्ट कर उसे 84 लाख योनियों के जन्म मरण के चक्र से मुक्ति दिलाती है।
पुराण के मुताबिक, ये यात्रा सबसे पहले भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने की थी। भगवान श्रीराम ने भी ब्रह्मदोष से मुक्ति पाने के लिए अयोध्यावासियों के साथ परिक्रमा की थी।
यही वजह है कि परिक्रमा को रामादल भी कहा जाता है। पूरी परिक्रमा में जो श्रद्धालु भाग नहीं ले पाते हैं वो परिक्रमा के पूर्ण के आखिरी पांच दिन मिश्रिख तीर्थ में चलने वाली परिक्रमा में भागीदार बनकर पुण्य अर्जित करते हैं।
बाबाओं संग सब बोले, हरिबोल
हरदोई के दलेलपुर निवासी अटल दास त्यागी बाबा 48 वर्षों से परिक्रमा में शामिल हो रहे हैं। शुक्रवार को हर्रैया पुल पर त्यागी बाबा अपनी जटाओं के साथ आकर्षण का केंद्र रहे।
बनगढ़ आश्रम से पधारे बब्बू दास खाकी जटाओं को खोलकर हाथ में बंदूक लेकर बम भोले का उद्घोष कर रहे थे। रमिया लखीमपुर से आए दिव्यांग सर्वेश लोगों को पछाड़ते हुए राम की धुन में आगे ही बढ़ते जा रहे थे।
इटावा से ट्राई साइकिल पर सवार होकर परिक्रमा में शामिल होने आए विश्राम बाबा राशन लेकर आगे ही बढ़ते जा रहे थे, वहीं महाकाल की नगरी उज्जैन से पधारे गोरधन लाल बाबा गोमती के किनारे भक्तों के साथ कान्हा की भक्ति में रमते हुए मिले।
हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैयालाल की
84 कोसी परिक्रमा में बाबा नंहक्कू दास व परिक्रमा सचिव महंत संतोष दास खाकी रथ पर सवार होकर पहुंचे तो नैमिषारण्य से विक्की दास बाबा विक्की पर सवार होकर पहुंचे।
नैमिषारण्य से पालकी में रामानुज महाराज व हाथी पर सवार होकर नागेंद्र दास पहुंचे, वहीं कई बाबा लग्जरी वाहनों व बस पर सवार होकर पहुंचे। वाहनों की साज-सज्जा आकर्षण का केंद्र बनी रही।
उत्तराखंड, एमपी, नेपाल तक से आएं संत
84 कोसी परिक्रमा में इर्द गिर्द के इलाकों को छोड़कर उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, नेपाल, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार सहित कई प्रांतों के साधु-संत परिक्रमा में शामिल हुए। अधिकतर पड़ोसी राज्यों के संत सैकड़ों लोगों के साथ परिक्रमा में शामिल हुए।
वहीं भिंड मध्य प्रदेश से पधारे पूरन लाल गुप्ता परिक्रमा के साथ ही पड़ावों पर भंडारे का आयोजन कर रहे, तो कई भक्त लंगर लगाकर परिक्रमार्थियों की भूख मिटा रहे हैं।
वृंदावन से पधारे किन्नर साधु
84 कोसी परिक्रमा में वृंदावन से पधारे किन्नर साधु सखी किशोरी व राम सखी राम नाम का गुणगान कर नाचते हुए परिक्रमा के हर्रैया पड़ाव पर पहुंचे।
वहीं, कुतुबनगर से 70 वर्ष की श्याम के साथ उनकी दो पोतियां प्रियांशी व हिमांशी, लखीमपुर से रिंकू, सीतापुर से निर्मल, बाराबंकी से शिवा समेत कई श्रद्धालुओं के जयकारे से गोमती नदी में भी कोलाहल होने लगा।